Death Knocks: A New Terror on Every Page - 8 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 8

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मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 8

अतृप्त आत्मा का आह्वान: काले कुएँ का अभिशाप
राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच बसा 'कुलधरा' जैसा ही एक और गुमनाम गाँव था—भानपुर। इस गाँव के बीचों-बीच एक विशाल पत्थर का कुआँ था, जिसे ग्रामीण 'काला कुआँ' कहते थे। उस कुएँ के चारों ओर लोहे की मोटी जंजीरें लिपटी हुई थीं और उस पर बड़े-बड़े ताले जड़े थे। गाँव के बुजुर्गों का सख्त आदेश था: "सूरज ढलने के बाद कुएँ की परछाईं भी शरीर पर नहीं पड़नी चाहिए।"
आर्यन, जो एक मशहूर 'पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर' (Paranormal Investigator) था, अपने तीन दोस्तों—समीर, सानिया और कबीर—के साथ भानपुर पहुँचा। आर्यन का मकसद इस पुराने कुएँ के पीछे के 'मिथक' को तोड़ना था।
रहस्यमयी शुरुआत
गाँव में कदम रखते ही उन्हें एक अजीब सी भारीपन का अहसास हुआ। हवा में एक कड़वाहट थी, जैसे कुछ जल रहा हो। गाँव के मुखिया, रहमत चाचा ने उन्हें चेतावनी दी:
"बेटा, यहाँ की मिट्टी में सिर्फ रेत नहीं, चीखें दबी हैं। उस कुएँ को मत छेड़ना। उसमें वह कैद है जो मरकर भी खत्म नहीं हुआ।"
आर्यन ने मुस्कुराते हुए अपना ईएमएफ (EMF) मीटर दिखाया और कहा, "चाचा, डर सिर्फ ऊर्जा का एक रूप है। हम यहाँ सच जानने आए हैं।"
रात का पहला पहर: जंजीरों की खनक
रात के 11:00 बजे थे। चारों ओर सन्नाटा इतना गहरा था कि उनके कदमों की चाप भी गूँज रही थी। आर्यन और उसकी टीम कुएँ के पास पहुँचे। समीर ने जैसे ही कुएँ पर हाथ रखा, उसे लगा जैसे किसी ने बर्फ जैसा ठंडा हाथ उसके हाथ पर रख दिया हो।
अचानक, कुएँ के चारों ओर लिपटी भारी जंजीरें अपने आप हिलने लगीं। झन... झन... झन...। हवा का एक तेज झोंका आया और कुएँ के ऊपर लगा एक पुराना ताला टूटकर नीचे गिर गया। सानिया के हाथ में मौजूद थर्मल कैमरा अचानक लाल हो गया। स्क्रीन पर एक आकृति दिख रही थी—एक औरत की आकृति जो कुएँ के ऊपर बैठी थी, लेकिन नग्न आँखों से वहाँ कोई नहीं था।
आर्यन ने रिकॉर्डर ऑन किया: "यहाँ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड बहुत ज्यादा है। तापमान तेजी से गिरकर 5^{circ}C हो गया है।"
कुएँ का इतिहास: एक दर्दनाक सच
तभी कबीर को कुएँ के पास की झाड़ियों में एक पुरानी डायरी मिली। टॉर्च की रोशनी में उन्होंने पढ़ा कि 18वीं सदी में इस गाँव में 'रतन सिंह' नाम का एक क्रूर जमींदार था। उसने एक युवती, 'मंजरी', को जबरन हासिल करना चाहा। जब मंजरी ने मना किया, तो उसने उसे इसी कुएँ में जिंदा फेंक दिया और ऊपर से पत्थर भरवा दिए। मरते वक्त मंजरी ने श्राप दिया था कि इस गाँव का पानी खून बन जाएगा और कोई भी रात के अंधेरे में यहाँ जीवित नहीं बचेगा।
जैसे ही कबीर ने आखिरी शब्द पढ़ा, कुएँ के अंदर से एक भयानक हँसी गूँजी। वह हँसी इंसान की नहीं थी; उसमें नफरत और सदियों की प्यास थी।
रात का दूसरा पहर: सायों का हमला
अचानक, समीर चिल्लाया। उसकी गर्दन पर लाल निशान उभर आए थे, जैसे किसी ने उसे कसकर पकड़ा हो। उसे कोई अदृश्य ताकत कुएँ की ओर खींच रही थी।
"समीर! पैर जमाए रखो!" आर्यन चिल्लाया। उन्होंने समीर को पीछे खींचा, लेकिन तभी सानिया ने देखा कि पास के पुराने बरगद के पेड़ से दर्जनों काले साये नीचे उतर रहे थे। वे साये नहीं थे, वे उन लोगों की आत्माएँ थीं जिन्हें उस कुएँ ने निगल लिया था।
हवा में एक गूँज उठी— "प्यास... हमें प्यास लगी है..."
तभी कुएँ से काला पानी उबलकर बाहर आने लगा। वह पानी नहीं था, बल्कि वह गाढ़ा काला तरल था जिसकी गंध मरे हुए मांस जैसी थी। आर्यन ने अपनी टॉर्च जलाई, पर रोशनी जैसे उन सायों के अंदर समा जा रही थी।
अंतिम संघर्ष: मौत का घेरा
रात के 3:00 बज चुके थे। टीम ने भागने की कोशिश की, लेकिन गाँव के रास्ते गायब हो चुके थे। वे जहाँ भी जाते, घूम-फिरकर वापस उसी काले कुएँ के सामने आ जाते। 'स्पेस-टाइम लूप' जैसा कुछ घटित हो रहा था।
मंजरी की आत्मा अब पूरी तरह प्रकट हो चुकी थी। उसकी आँखें नहीं थीं, बस दो काले गड्ढे थे जिनसे खून बह रहा था। उसके पैर जमीन से ऊपर थे और उसके बाल नागिनों की तरह लहरा रहे थे।
उसने कबीर की ओर इशारा किया और एक झटके में कबीर का शरीर हवा में उछला और कुएँ की मुंडेर से जा टकराया। आर्यन ने अपनी सुरक्षा के लिए लाए गए 'नमक के घेरे' को बनाने की कोशिश की, पर हवा इतनी तेज थी कि नमक उड़ गया।
मंजरी की आवाज गूँजी: "तुमने मुझे जगाया है... अब तुम मेरी प्यास बुझाओगे।"
आर्यन को समझ आया कि मंजरी को केवल एक चीज शांत कर सकती थी—उस जमींदार के वंश का अंत। उसने डायरी के आखिरी पन्ने पर देखा कि समीर के गले में वही लॉकेट था जो जमींदार रतन सिंह का था। समीर अनजाने में उसी वंश का आखिरी चिराग था।
सुबह का सन्नाटा और रहस्य
जब सूरज की पहली किरण भानपुर की धरती पर पड़ी, तो गाँव बिल्कुल सामान्य था। रहमत चाचा कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ सन्नाटा था। न समीर था, न सानिया, न कबीर।
वहाँ केवल आर्यन बैठा था, जिसकी आँखें पत्थर की तरह सफेद हो चुकी थीं। वह बस एक ही बात दोहरा रहा था— "वह प्यासी है... वह अभी भी प्यासी है।"
कुएँ की जंजीरें अब पहले से भी ज्यादा मजबूत थीं, और एक नया ताला वहाँ लगा हुआ था। पुलिस की जाँच में आर्यन के कैमरे मिले, पर उनमें केवल सफेद धुंध थी। समीर और बाकी दोस्तों का कहीं पता नहीं चला।
गाँव के लोग कहते हैं कि आज भी अमावस की रात को कुएँ के अंदर से तीन नई आवाजें सुनाई देती हैं—जो मदद के लिए पुकारती हैं। लेकिन भानपुर की दहलीज पार करने की हिम्मत अब किसी में नहीं है।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि इतिहास के कुछ पन्ने बंद ही रहने चाहिए। जिज्ञासा अच्छी है, लेकिन जब वह मर्यादा लांघती है, तो परिणाम 'काला कुआँ' जैसा ही होता है।