भुतहा हवेली का रहस्य
भारत के एक छोटे से कस्बे में, जहाँ दिन में भी सन्नाटा पसरा रहता था, वहाँ एक पुरानी हवेली खड़ी थी। लोग उसे "शिवकुंज हवेली" कहते थे। कहते हैं कि उस हवेली में रात के समय अजीब आवाज़ें आती थीं—कभी किसी के रोने की, कभी पायल की छनक, और कभी दरवाज़ों के अपने आप खुलने-बंद होने की। गाँव के लोग उस हवेली से दूर रहते थे, क्योंकि उनका मानना था कि वहाँ आत्माएँ भटकती हैं।
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पहला अध्याय: हवेली की ओर कदम
राहुल, एक युवा लेखक, जो रहस्यमयी कहानियों की तलाश में रहता था, उस हवेली की ओर आकर्षित हुआ। उसने तय किया कि वह वहाँ जाकर सच्चाई का पता लगाएगा। गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया—
“बेटा, वहाँ मत जाना। जो भी गया, कभी लौटकर नहीं आया।”
लेकिन राहुल की जिज्ञासा डर से कहीं अधिक थी।
रात के समय, हाथ में लालटेन लिए, वह हवेली के विशाल दरवाज़े पर पहुँचा। दरवाज़ा जंग खाया हुआ था, लेकिन जैसे ही उसने उसे धक्का दिया, वह खुद-ब-खुद चरमराता हुआ खुल गया।
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दूसरा अध्याय: अंधेरे का आलिंगन
हवेली के भीतर घुप्प अंधेरा था। दीवारों पर जाले, टूटी खिड़कियाँ और फर्श पर बिखरे पुराने सामान। राहुल ने अपनी लालटेन ऊँची की तो देखा कि दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। उन चित्रों में एक ही परिवार के लोग थे—एक गंभीर चेहरे वाला ज़मींदार, उसकी पत्नी, और एक छोटी बच्ची।
अचानक, उसे लगा कि चित्रों की आँखें उसकी ओर देख रही हैं। उसने सिर झटककर सोचा कि यह उसका भ्रम है। लेकिन तभी हवेली के भीतर से पायल की हल्की छनक सुनाई दी।
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तीसरा अध्याय: अतीत की परछाइयाँ
राहुल ने हवेली के भीतर और गहराई में कदम रखा। एक कमरे में उसे पुरानी डायरी मिली। डायरी ज़मींदार की पत्नी की थी। उसमें लिखा था—
“मेरी बेटी अनामिका हर रात किसी से बातें करती है। वह कहती है कि हवेली में एक और बच्ची रहती है, जो उसे खेलों में बुलाती है। लेकिन हमें कोई बच्ची दिखाई नहीं देती। मुझे डर है कि यह कोई आत्मा है।”
राहुल ने डायरी पढ़ते-पढ़ते महसूस किया कि कमरे का तापमान अचानक गिर गया है। उसकी साँसें धुंधली होने लगीं। तभी उसे लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है। उसने पलटकर देखा—वहाँ एक छोटी बच्ची खड़ी थी, सफेद कपड़ों में, आँखें बिल्कुल खाली।
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चौथा अध्याय: अनामिका की आत्मा
बच्ची ने धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम यहाँ क्यों आए हो?”
राहुल काँप गया, लेकिन उसने साहस जुटाकर पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्ची ने उत्तर दिया—
“मैं अनामिका हूँ। इस हवेली में मेरी हत्या हुई थी। मेरे पिता ने मुझे मार डाला, क्योंकि मैं उस अदृश्य आत्मा से खेलती थी। उन्होंने सोचा कि मैं पागल हो गई हूँ।”
राहुल स्तब्ध रह गया। बच्ची की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे आँसू खून जैसे लाल थे।
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पाँचवाँ अध्याय: हवेली का श्राप
अनामिका ने बताया कि उसके पिता ने हवेली में कई निर्दोष लोगों की बलि दी थी। हवेली की नींव खून से सनी हुई थी। इसलिए यह हवेली श्रापित हो गई। जो भी इसमें प्रवेश करता है, वह आत्माओं के जाल में फँस जाता है।
राहुल ने पूछा—
“क्या तुम्हें मुक्ति चाहिए?”
अनामिका ने सिर हिलाया।
“हाँ, लेकिन मुक्ति तभी मिलेगी जब कोई मेरी सच्चाई दुनिया को बताए और हवेली की नींव में दबे शवों को उजागर करे।”
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छठा अध्याय: भयावह रात
राहुल ने तय किया कि वह अनामिका की मदद करेगा। लेकिन तभी हवेली में ज़ोरदार तूफ़ान उठ गया। दरवाज़े अपने आप बंद हो गए। दीवारों से खून टपकने लगा। चित्रों में दिख रहे चेहरे चीखने लगे।
राहुल ने लालटेन कसकर पकड़ी और बाहर निकलने की कोशिश की। लेकिन हर दरवाज़ा उसे उसी कमरे में वापस ले आता। हवेली जैसे जीवित हो गई थी और उसे निगलना चाहती थी।
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सातवाँ अध्याय: अंतिम संघर्ष
राहुल ने डायरी उठाई और उसमें लिखी बातों को ज़ोर से पढ़ना शुरू किया। जैसे ही उसने सच्चाई दोहराई, हवेली की दीवारें काँपने लगीं। अनामिका की आत्मा उसके सामने प्रकट हुई और मुस्कुराई।
“अब मैं मुक्त हूँ।”
उसके बाद हवेली में एक भयानक विस्फोट हुआ। खिड़कियाँ टूट गईं, दरवाज़े गिर पड़े, और हवेली राख में बदलने लगी।
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उपसंहार
सुबह जब गाँव वाले वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि हवेली पूरी तरह ढह चुकी है। राख के बीच राहुल बेहोश पड़ा था, लेकिन जीवित था। उसके हाथ में वही डायरी थी।
राहुल ने गाँव वालों को पूरी कहानी सुनाई। अनामिका की आत्मा को मुक्ति मिल चुकी थी, लेकिन हवेली का श्राप हमेशा के लिए मिटा नहीं था। गाँव वाले आज भी कहते हैं कि जब रात
गहरी होती है, तो राख के बीच से पायल की हल्की छनक सुनाई देती है।
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