एपिसोड 1 — "रात 3:12 बजे की दस्तक"
— इस सीरीज के हर एपिसोड में आपको मिलेगी एक
बिल्कुल नई और रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी।
👻 एपिसोड 1: रात 3:12 बजे की दस्तक
रात का सन्नाटा इतना गहरा था कि आरव को अपनी ही धमनियों में दौड़ते खून की आवाज़ सुनाई दे रही थी। घड़ी की सुइयां एक-दूसरे पर रेंग रही थीं। कमरे की खिड़की से आती चाँदनी दीवारों पर लंबी और टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयाँ उकेर रही थी, जो किसी के हाथ की उंगलियों जैसी लग रही थीं।
तभी— ठक... ठक... ठक...
आरव का शरीर पत्थर का हो गया। आवाज़ दरवाज़े से नहीं, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके सिरहाने खड़े होकर लकड़ी के फ्रेम को पीट रहा हो। उसने काँपते हाथों से तकिये के पास रखा मोबाइल उठाया। नीली रोशनी ने उसके डरे हुए चेहरे को चमका दिया।
समय: 3:12 AM
आरव का गला सूखकर काँटा हो गया था। उसे याद आया कि यह घर तो शहर के शोर से दूर एक सुनसान इलाके में है। इतनी रात को कौन आएगा? वह बिस्तर से नीचे उतरा। नंगे पैर जब ठंडे फर्श पर पड़े, तो उसे एक अजीब सी सनसनी महसूस हुई—जैसे फर्श ठंडा नहीं, बल्कि किसी लाश की खाल जैसा बर्फीला हो।
उसने दरवाज़े के पास जाकर अपना कान लगा दिया। बाहर से भारी-भारी साँसें लेने की आवाज़ आ रही थी।
“क... कौन है?” उसकी आवाज़ खुद उसे ही पराई लगी।
कोई जवाब नहीं। फिर से वही— ठक... ठक... ठक! इस बार प्रहार इतना तेज़ था कि दरवाज़ा जैसे हिल उठा।
आरव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े की आँख (peephole) में झाँका। बाहर सन्नाटा था। पीली स्ट्रीट लाइट में खाली बरामदा साफ़ दिख रहा था। कोई नहीं था। उसने चैन की साँस ली और जैसे ही पीछे मुड़ा, उसके कानों के ठीक पीछे एक बर्फीली फुसफुसाहट सुनाई दी:
“इतनी जल्दी भूल गए आरव...?”
आरव की चीख गले में ही फंस गई। उसके कमरे के कोने में, जहाँ अंधेरा सबसे घना था, एक साया खड़ा था। वह साया धीरे-धीरे रोशनी की तरफ बढ़ा। सफ़ेद साड़ी, जो जगह-जगह से जली हुई और काली थी। उसके लंबे बाल उसके चेहरे पर झूल रहे थे।
जैसे ही उस साये ने अपना सिर उठाया, आरव की रूह काँप उठी। वह चेहरा मांस का टुकड़ा नहीं, बल्कि कोयले जैसा जला हुआ ढाँचा था। आँखों की जगह दो गहरे गड्ढे थे, जिनमें से गाढ़ा काला तरल (खून जैसा) टपक रहा था। कमरे में अचानक जलते हुए मांस और गंधक की तीखी महक भर गई।
“मैं... वही हूँ, जिसे तुमने उस रात खिड़की से जलते हुए देखा था,” परछाईं की आवाज़ किसी पुरानी कब्र के फटने जैसी थी। “पाँच साल पहले... तुम देख रहे थे, मैं तड़प रही थी। तुमने एक फोन तक नहीं किया। तुम्हें डर था कि पुलिस तुमसे सवाल करेगी?”
“नहीं! मुझे माफ़ कर दो!” आरव पीछे हटते हुए चिल्लाया, लेकिन उसकी पीठ दीवार से जा टकराई। दीवार अचानक गीली महसूस हुई। उसने मुड़कर देखा तो दीवारों से काला खून रिसने लगा था। खिड़कियाँ अपने आप ज़ोर-ज़ोर से खुलने और बंद होने लगीं।
साया उसके इतना करीब आ गया कि आरव को उसकी जली हुई खाल की तपिश महसूस होने लगी। “अब तुम भी उसी सन्नाटे को महसूस करोगे...” उसने अपना ठंडा, काला पड़ चुका हाथ आरव के गले पर रखा।
अचानक—
कमरे की लाइट जल गई। आरव फर्श पर पड़ा पसीने से तर-बतर था। पंखा अपनी रफ्तार से चल रहा था। कोई परछाईं नहीं थी, कोई गंध नहीं थी।
“सपना... सिर्फ एक बुरा सपना था,” उसने अपने सीने पर हाथ रखकर खुद को दिलासा दिया।
तभी फिर से वही आवाज़ आई— ठक... ठक... ठक...
आरव ने घड़ी देखी। 3:12 AM।
उसका दिल फिर से डूबने लगा। वह लड़खड़ाते कदमों से दरवाज़े तक गया और उसे खोल दिया। बाहर एक खूबसूरत औरत खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, चेहरे पर एक शांत मुस्कान।
“माफ़ कीजियेगा इतनी रात को परेशान किया। मैं आपकी नई पड़ोसन हूँ, बगल वाले फ्लैट में अभी शिफ्ट हुई हूँ। मेरा कुछ सामान गिर गया था, क्या मुझे एक मोमबत्ती मिल सकती है?”
आरव को लगा जैसे मौत के मुँह से बाहर आ गया हो। “जी... जी हाँ, अंदर आइये, मैं देखता हूँ।”
वह औरत अंदर आई। आरव जैसे ही मोमबत्ती लेने पलटा, उसकी नज़र दीवार पर लगे बड़े से आईने (Mirror) पर पड़ी।
उसका खून जम गया। आईने में आरव तो खड़ा था, लेकिन उसके बगल में खड़ी औरत का कोई प्रतिबिंब (reflection) नहीं था। वहाँ सिर्फ एक जली हुई लाश की छाया दिख रही थी।
वह पलटा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उस औरत का चेहरा फिर से वही खौफनाक जलता हुआ मंज़र बन चुका था। उसने अपनी उंगलियाँ आरव की आँखों में गड़ा दीं।
“आज... कोई नहीं बचाएगा।”
अगली सुबह:
पुलिस ने जब दरवाज़ा तोड़ा, तो मंज़र दहला देने वाला था। आरव की लाश फर्श पर पड़ी थी, मानो किसी ने उसे ज़िंदा जला दिया हो, लेकिन उसके कपड़े बिल्कुल सलामत थे। कमरे की दीवारों पर खून से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
“3:12 AM: मौत का समय। दरवाज़ा कभी मत खोलना।”
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"अंधेरा गहरा है, सन्नाटा भारी है... संभल कर बैठिये, क्योंकि 'मौत की दस्तक' किसी भी रूप में आ सकती है।