Shrapit ek Prem Kahaani - 63 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 63

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 63

आलोक का नाम सुनते ही संपूर्णा का चैहरा खुशी से लाल हो जाता है। संपूर्णा अपनी खुशी को छिपा नही पा रही थी इसिलिए संपूर्णा सर्मा के वहां से दौड़कर भाग जाती है। सभी संपूर्णा की चेहरे की खुशी दैखकर समझ जाता है के संपूर्णा इस रिश्ते से बहुत खुश है। 

उधर वर्शाली मणी के बारे मे सौच रही थी के तभी एकांश वर्शाली से कहता है--

> क्या बात है वर्शाली ? तुम किस सौच मे पड़ गयी। 

एकांश की बात सुनकर वर्शाली कहती है---

> वो मैं मणी के बारे मे सौच रही थी एकांश जी। 

एकांश पुछता है--

> मणी के बारे मे ?

वर्शाली कहती है--

> हां एकांश जी ! पता नही वो मणी कहां और किसके पास होगा।। वो मणी फिर कभी हमे मिल पाएगी भी या नही ।

इतना कहते हूए वर्शाली की आंखे नम हो जाती है वर्शाली नम आंखो से कहती है--

> एकांश जी क्या हम हर्शाली को फिर कभी वापस ला सकते है?

 एकांश एक गहरी सांस लेता है और वर्शाली के गाल पर हाथ रख कर कहता है--

> मुझ पर भरोसा रखो वर्शाली मैं उस मणी को ढुंड कर ही रहुगां।

 एकांश के इतना कहने पर वर्शाली एकांश का हाथ पकड़ कर कहती है--

> मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है एकांश जी। 

वर्शाली मन ही सौचने लगती है---
> एकांश जी मुझे आप पर कभी शंदेह नही हुआ है ।मुझे ञात है के आप मेरे लिए उस मणी को कही से 
भी ला कर दोगे। परंतु इसमे आपके प्राणो पर संकट भी आ सकती है। मुझे हर समय आपके साथ रहना होगा आपकी परछाई बनकर ताकी कोई आपको हानी ना पहुंचा सके। क्योकी मैं आपसे बहुत प्रेम करती हूँ एकांश जी। एक ऐसा प्रेम जिसके बारे मे मैं आपको कभी बता नही सकती। और एक दिन ना चाहते हूए भी मुझे आपको बिना बताए यहां से अपनी लोक को जाना होगा।

 वर्शाली एकांश की और दैखती है एकांश कमरे को चारो और अपनी नजर घुमाके दैख रहा था। वर्शाली फिर मन ही मन सौचती है--

> आपका साथ जिस भी कन्या को मिलेगा वो बहुत
 भाग्यवान होगी एकांश जी। मैं भी आपके साथ रहना चाहती हूँ एकांश जी परंतु मैं विवश हूं । पर मैं हमेशा केवल आपकी ही रहूंगी एकांश जी सिर्फ आपका। ये वर्शाली सिर्फ और सिर्फ आपका ही रहेगा ।

इतना सौचते सौचते वर्शाली की आंखो से आंसु निकल आते है। वर्षाली अपनी आंखो को साफ कर ही रही थी के एकांश वर्शाली के आंख मे आये आंसु को दैख लेता है। जिसे वर्षाली साफ करने की कोशिस कर रही थी एकांश वर्षाली के आंख के आंसु को अपने हाथ से पोंछते हुए कहता है--

> वर्षाली ! तुम रो रही हो ?  

वर्षाली एकांश से अपनी नजरे चुराती हुई कहती है--

> न... न.. नही तो ! मैं कहां रो रही हूँ।

 वर्शाली एकांश से अपनी नजरे चुराते हुए कहती है । एकांश वर्षाली के गाल पर अपने दौनो हाथों को रख कर कहता है--

> वर्शाली झुठ बोलना परीयों का काम नही है। और तुम्हें तो झुठ बोलना भी नही आता।

 इतना बोलकर एकांश वर्शाली के आंसु को पोंछने लग जाता है। एकांश के आंसु पोंछते ही वर्शाली भावुक हो जाती है और एकांश को झट से अपने गले से लगा लेती है।

 एकांश को ये सब कुछ समझ मे नही आ रहा था के वर्शाली को अचानक क्या हो गया। वर्शाली एकांश के बाहों मे बस रोये जी रही थी। पर वो अपना प्यार एकांश को बता नही पा रही थी । एकांश वर्शाली को अपने से अलग करके वर्शाली से रोने को कारण पुछना चाहा पर वर्शाली एकांश को कस के पकड़ रखी थी। वर्शाली एकांश से अलग होना नही चाहती थी , बस एकांश के बाहों मे ही रहना चाहती थी ।

वर्शाली कुछ दैर ते लिए एकांश के बाहों मे रही और एकांश वर्शाली के बालो को सहला रहा था। जब वर्शाली की पकड़ थौड़ी ढीली हुई तो एकांश वर्शाली के आंखो को साफ करते हुए कहता है़ --

> ऐसे बच्चों जैसा नही रोते। ठीक है। मैं हुं ना तुम्हारे 
साथ। अब तुम्हें किसी बात की चितां करने की कोई जरूरत नही। मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूँ ।

एकांश वर्शाली के गाल पर अपने हाथ रखते हुए प्यार से पुछता है--

> क्या बात है परी साहिबा आपको किस बात की चितां सता रही है।

 वर्शाली मन ही मन सौचती है के अब एकांश को बता ही दैती हूँ के मैं आपसे कितना प्रेम करती हूँ । पर वर्षाली एकांश से बोल नही पा रही थी।

.
 > वो ... वो... एकांश जी ! मैं आप......मैं आपसे ! 

इतना बोलकर वर्शाली रुक जाती है। एकांश फिर वर्शाली पर दबाव बनाकर पूछता है--

> तुम मुझसे क्या वर्शाली ? बोलो ना ।

 एकांश मन ही मन सौचता है---

> कही वर्शाली मुझे ये कहना चाहती है के वो भी मुझे प्यार करती है शायद कह नही पा रही है। नही नही एकांश तु वर्शाली से प्यार करता है पर इसका मतलब ये तो नही के वर्शाली भी तुमसे प्यार करे । वर्शाली एक परी है और बेहद खूबसुरत है वो भला तुमसे प्यार क्यों करेगी। हां शायद वो मुझसे कुछ मदद चाहती है जिसे वो बोल नही पा रही है।

 एकांश फिर वर्शाली की और दैखता है और कहता है--

> वर्शाली क्या हुआ तुम ऐसे चुप क्यूं हो ? कुछ बात है तो बताओ ! तुम्हें अब मुझसे कहने मे संकोच क्यों हो रहा है। मैने तुमसे पहले भी कहा है ना ! के तुम मुझसे कुछ कहने या मांगने संकोच मत करना । अब बताओ क्या बात है । क्या तुम अपने बड़ी बहन के बारे मे सौच कर रो रही हो ?

 वर्शाली चुप रहती है और एकांश को बस एक टक नजर से दैखती रहती है और मन मे सौचती है--
.> आप क्या हो एकांश जी आपको सिर्फ मेरी चिंता है । आप भी तो मुझसे बहोत प्रेम करते हो परतुं मैं जानती हूँ के आप मुझसे कभी कहेगें नही। क्योंकी आपको ये लगता है के मैं एक परी हूँ और एक परी किसी मानव से कैसै प्रेम कर सकती है। परंतु एकांश जी मैं आपको कैसे बताउं के मैं आपसे प्रेम कर बैठी हूँ । आप अपनी खुशी को त्याग कर केवल मेरे खुशी के लिए आप कुछ भी करने को तत्पर हो। आपके इसी स्वाभाव के कारण मैं आपसे बहुत प्रेम कर बैठी हूँ एकांश जी ।

तभी एकांश फिर वर्शाली का ध्यान अपनी और करके कहता है--

> क्या हुआ फिर कहीं खो गई।

 एकांश बड़े प्यार से वर्शाली से कहता है--

> वर्शाली मैं तुमसे वादा करता हूँ के जबतक मेरे शरीर मे प्राण रहेगें । मैं उस मणी को तुम्हारे लिए जरूर लाऊगां । चाहे वो मणी पाताल मे भी क्यों ना छुपा हो।

 एकांश के इतना कहने पर वर्शाली झट से एकांश के होंठ मे अपना हाथ रख कर कहती है--

> नही नही एकांश जी आप ऐसा मत बोलो । मैं 
आपको कुछ भी होने नही दुगीं। 

एकांश हल्की मुस्कान के साथ कहता है --

> मुझे पता है पगली । क्योकी तुम हो ही प्यारी बिल्कुल परी जैसी ।

 वर्शाली कहती है--
.> अच्छा ! परी जैसी ? एकांश जी आपको अगर ज्ञात नही तो मैं आपको बता दु के मैं परी ही हूँ ।

 वर्शाली की बात सुनकर एकांश हड़बड़ा जाता है और कहता है--

> नही मतलब वो ! 

एकांश की बात को बिच मे ही काटकर वर्शाली कहती है--

> क्यों एकांश जी ! आपने मुझसे पहले भी कोई परी दैखी है क्या ? 

एकांश वर्शाली की बात का जवाब देते हुए कहता है--

> अ... अ... अरे नही वर्शाली ऐसी कोई बात नही है। मैं तो बस यूं ही कहा। ये हमारे यहां ऐसे ही कहते है। 

वर्शाली हैरानी से पूछती है--

> ऐसे ही पूछते का क्या मतलब ?

एकांश कहता है--

> जब भी कोई सुंदर लड़की को दैखते है तो हम कहते है के कितनी सुंदर लग रही है बिल्कुल परी जैसी।

वर्शाली कहती है--

> अच्छा तो ये बात है। तो इसका मतलब मैं आुको सुदंर लगती हूँ ? 

वर्शाली एकांश से पूछती है ।

एकांश वर्शाली की आंखो मे दैख कर कहता है--

> बहुत सुदंर हद से भी ज्यादा । इतना के बौलकर नही बताया जा सकता।

एकांश की बात पर वर्षाली शर्माने लगती है और चेहरे के सामने आई बाल को संवारते हूए कहती है--

> बस बस बहोत नाम कर लिए आपने मेरी। अब मुझे लज्जा आ रही है ।

वर्शाली अपना चेहरा को अपने हाथो से ढकने लगती है , तो एकांश वर्शाली के हाथो को उसके चेहरे से हटाकर कहता है --

> अरे नही मेडम जितना आप हो मेरे इतना कहने से भी कुछ नही होता है। आप उससे भी और सुदंर हो ।

मेडम शब्द सुनकर वर्शाली एकांश से कहती है--

> मेडम ! ये मेडम क्या है एकांश जी ? 

एकांश हल्की मुस्कान के साथ कहता है--

> मेडम का मतलब किसी स्त्री को आदर पूर्ण संबोधीत करना जैसे महोदया , साहिबा या पत्नी । 

पत्नी शब्द सुनकर वर्शाली के चेहरे पर रौनक आ जाती है। पर वर्शाली अपनी चैहरे की रौनक को छुपाते हुए वर्शाली एकांश से पूछती है।--

> पत्नी ?

एकांश कहता है --

> हां पत्नी । 

वर्शाली कहती है--

> अच्छा ! इतना सारा मतलब है ये मेडम का । 

> हां वर्षाली । 

एकांश कहता है। 

वर्षाली झट से वहां से उठ जाती है और कमरे के बाहर जाने लगती है। वर्शाली को यूं अचानक जाते दैखकर एकांश वर्षाली को रौककर कहता है--

> कहां जा रही हो वर्शाली ?


To be continue.....1015