: “दरभंगा की वह बंद हवेली”
दरभंगा की पुरानी गलियों में एक हवेली थी—ऊँची, खामोश और समय से भी पुरानी। लोग उसे बस “सेन हवेली” कहते थे। कहते हैं, वहाँ रात के बाद कोई नहीं जाता। और जो गया… वो कभी पहले जैसा लौटकर नहीं आया।
अक्टूबर की ठंडी शाम थी। हवा में सीलन और धुएँ की मिली-जुली गंध थी। आसमान पर बादल ऐसे तैर रहे थे जैसे किसी ने काली स्याही उड़ेल दी हो। पटना से आई एक रिसर्च स्कॉलर, आर्या, उस हवेली के सामने खड़ी थी। वह लोककथाओं पर रिसर्च कर रही थी और उसे दरभंगा की इस हवेली के बारे में कई अजीब बातें सुनने को मिली थीं।
गाँव वालों ने उसे मना किया था।
“बिटिया, रात में मत जाइए उधर… उ हवेली में कुछ ठीक नहीं है,” एक बूढ़ी औरत ने काँपती आवाज़ में कहा था।
लेकिन आर्या तर्क में विश्वास करती थी, अंधविश्वास में नहीं। उसने अपने बैग से टॉर्च निकाली और भारी लोहे का जंग लगा फाटक धक्का देकर खोल दिया। फाटक की चरमराहट ऐसी थी जैसे कोई बहुत पुराने ज़ख्म पर हाथ फेर दे।
अंदर आँगन में जंगली घास उगी थी। दीवारों पर काई जमी थी। हवेली के बीचों-बीच एक सूखा कुआँ था, जिसके चारों तरफ लाल धागे बंधे थे। हवा अचानक ठंडी हो गई। जैसे किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया हो—“वापस जाओ…”
आर्या ने खुद को संभाला। “सिर्फ हवा है,” उसने खुद से कहा।
वह अंदर के बड़े दरवाज़े तक पहुँची। दरवाज़ा आधा खुला था। जैसे कोई अभी-अभी अंदर गया हो। उसने टॉर्च की रोशनी अंदर डाली। धूल, जाले और टूटी कुर्सियाँ।
अचानक… उसे ऊपर की मंज़िल से पायल की हल्की आवाज़ सुनाई दी।
छन… छन… छन…
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। “कोई है?” उसने आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं।
वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। हर कदम के साथ आवाज़ और साफ़ होती जा रही थी। ऊपर एक लंबा गलियारा था, जिसके आखिर में एक कमरा हल्की रोशनी में डूबा था। रोशनी? इस वीरान हवेली में?
कमरे का दरवाज़ा खुला था। अंदर एक पुराना आईना रखा था—बड़ा, चाँदी की नक्काशी वाला। आईने के सामने एक लड़की खड़ी थी। सफेद साड़ी, लंबे खुले बाल।
आर्या ने सोचा शायद कोई और रिसर्चर या कोई पागल लड़की यहाँ रहती हो।
“सुनिए?” उसने धीरे से कहा।
लड़की ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
उसका चेहरा… चेहरा नहीं था।
जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, वहाँ सिर्फ काली खाली जगह थी। होंठ फटे हुए, जैसे किसी ने सिल दिए हों।
आर्या के हाथ से टॉर्च गिर गई।
कमरे में अँधेरा छा गया।
और तभी उसे महसूस हुआ—कोई उसके पीछे खड़ा है।
ठंडी साँस उसके गर्दन को छू गई।
“तुम… क्यों आई हो?” वही फुसफुसाहट, जो आँगन में सुनी थी।
आर्या ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
एक बूढ़ी औरत… वही जो गाँव में मिली थी। लेकिन अब उसकी आँखें लाल थीं। चेहरा झुर्रियों से नहीं, जलने के निशानों से भरा था।
“तुमने हमारी नींद तोड़ी है…”
अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया। हवा तेज़ चलने लगी। आईना काँपने लगा।
आईने में अब सिर्फ वह सफेद साड़ी वाली लड़की नहीं थी—बल्कि दर्जनों चेहरे थे। और हर चेहरा आर्या जैसा दिख रहा था।
“यह क्या है…?” वह चिल्लाई।
बूढ़ी औरत हँसी। “इस हवेली में जो आता है, वो अपनी परछाईं यहीं छोड़ जाता है। तुम भी छोड़ जाओगी।”
आर्या भागने के लिए दरवाज़े की ओर दौड़ी, लेकिन दरवाज़ा गायब था। सिर्फ दीवार।
फर्श पर खून जैसा लाल पानी फैलने लगा। कुएँ से आती बदबू कमरे तक भर गई।
अचानक उसके दिमाग में गाँव वालों की बात गूँजने लगी—“हवेली में एक लड़की की मौत हुई थी… उसने कुएँ में कूदकर जान दे दी थी… क्योंकि उसके परिवार ने उसे बंद कर दिया था…”
सफेद साड़ी वाली लड़की अचानक उसके बिल्कुल सामने आ गई। उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।
“मुझे बाहर ले चलो…” उसने बिना होंठ हिलाए कहा।
आर्या काँप गई। “कैसे?”
लड़की ने कुएँ की ओर इशारा किया।
अचानक सब कुछ बदल गया। कमरा गायब। वह खुद को आँगन में खड़ी पाई। कुएँ के पास।
कुएँ से रोने की आवाज़ आ रही थी।
आर्या ने अंदर झाँका।
अंदर अंधेरा था। लेकिन गहराई में… उसे अपना ही चेहरा दिखाई दिया।
वह चीखी और पीछे हट गई।
पीछे वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।
“हर आत्मा को एक शरीर चाहिए… और तुम आ गई हो…”
हवा में अचानक तेज़ चीख गूँजी। सफेद साड़ी वाली लड़की कुएँ से बाहर निकली—लेकिन अब उसका चेहरा साफ़ था।
वह… बिल्कुल आर्या जैसी दिख रही थी।
आर्या ने महसूस किया कि उसके पैर ज़मीन से चिपक गए हैं। उसका शरीर भारी हो रहा है।
सफेद साड़ी वाली लड़की उसके अंदर समाने लगी।
“नहीं… नहीं…!” आर्या चिल्लाई।
अगले ही पल सब शांत हो गया।
सुबह जब गाँव वाले हवेली के पास से गुज़रे, तो उन्होंने देखा—फाटक खुला था।
आँगन में एक लड़की खड़ी थी। सफेद साड़ी में। लंबे खुले बाल।
उसका चेहरा मासूम था। बिल्कुल सामान्य।
वह मुस्कुराई और बोली—“नमस्ते… मैं यहाँ रिसर्च के लिए आई हूँ।”
गाँव वाले डर से काँप गए।
क्योंकि उन्होंने उसे पहले भी देखा था।
सालों पहले।
जब वही लड़की इस हवेली में आई थी… और फिर कभी वापस नहीं लौटी।
और अब… हवेली फिर से किसी नई परछाईं का इंतज़ार कर रही थी।
कहते हैं, अगर आप दरभंगा की उस पुरानी गली से गुज़रें और आधी रात को पायल की आवाज़ सुनें—तो पीछे मुड़कर मत देखिए।
क्योंकि हो सकता है… वह आपकी ही परछाईं हो, जो आपको अपने साथ ले जाने आई हो।