अंतिम स्टेशन: रूहानी सफर
पहाड़ों के बीच से गुजरती वह सड़क रात के सन्नाटे में किसी काले नाग की तरह फुफकार रही थी। धुंध इतनी घनी थी कि कार की हेडलाइट्स भी हार मान रही थीं। आर्यन स्टीयरिंग व्हील थामे हुए था, जबकि उसका दोस्त समीर बगल वाली सीट पर सो रहा था। वे दोनों एक ट्रिप से वापस लौट रहे थे, लेकिन रास्ता भटक जाने के कारण वे 'काल-घाटी' नाम के एक अंजान इलाके में फंस गए थे।
अचानक, कार के इंजन ने एक अजीब सी आवाज़ की और झटके खाकर बंद हो गई।
"धत् तेरे की! अब इसे क्या हुआ?" आर्यन ने झुंझलाते हुए कहा।
समीर की आँखें खुलीं। "क्या हुआ आर्यन? गाड़ी क्यों रोक दी?"
"रुकी नहीं है, रुक गई है। इंजन शायद गर्म हो गया है," आर्यन ने जवाब दिया।
खामोश मुसाफिर
बाहर का तापमान तेज़ी से गिर रहा था। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे चीड़ के पेड़ ऐसे लग रहे थे जैसे कोई काले साये हाथ फैलाए खड़े हों। तभी दूर से एक धीमी सी रोशनी दिखाई दी।
"समीर, देख! वहां शायद कोई ढाबा या घर है। चल, मदद मांगते हैं," आर्यन ने इशारा किया।
वे दोनों गाड़ी से उतरे। जैसे ही वे उस रोशनी की ओर बढ़े, उन्हें एक पुराना रेलवे स्टेशन मिला। स्टेशन का नाम मिट चुका था, बस एक तख्ती लटक रही थी जो हवा के झोंकों से 'चर्र-चर्र' कर रही थी। वहां एक बूढ़ा आदमी लाल लालटेन लिए बैठा था।
"काका, हमारी गाड़ी खराब हो गई है। क्या यहाँ आस-पास कोई मैकेनिक मिलेगा?" आर्यन ने पूछा।
बूढ़े ने धीरे से अपना सिर उठाया। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं। उसने बिना कुछ बोले दूर एक पुरानी रेलगाड़ी की तरफ इशारा किया जो पटरी पर खड़ी थी। वह ट्रेन बहुत पुरानी थी, जैसे 19वीं सदी की हो।
"यहाँ कोई मैकेनिक नहीं मिलता बेटा। यहाँ सिर्फ मुसाफिर मिलते हैं... जो कभी वापस नहीं जाते," बूढ़े की आवाज़ किसी सूखी लकड़ी के टूटने जैसी थी।
ट्रेन का रहस्य
समीर को डर लगने लगा। "आर्यन, यहाँ से चलते हैं। यह आदमी पागल लग रहा है।"
लेकिन अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। बचने का कोई और रास्ता न देख, वे दोनों उस खड़ी हुई ट्रेन के एक डिब्बे में चढ़ गए। डिब्बे के अंदर का नज़ारा और भी अजीब था। वहां मोमबत्तियां जल रही थीं और सीटों पर लोग बैठे थे, लेकिन सब एकदम खामोश थे। उनके कपड़े पुराने जमाने के थे और उनके चेहरे पीले पड़ चुके थे।
आर्यन और समीर एक कोने की सीट पर बैठ गए।
"समीर, ये लोग इतने चुप क्यों हैं? और यह ट्रेन चल क्यों नहीं रही?" आर्यन ने फुसफुसाते हुए पूछा।
तभी ट्रेन ने एक ज़ोरदार झटका लिया और धीरे-धीरे चलने लगी। 'कू-उ-उ-उ'... ट्रेन की सीटी की आवाज़ किसी इंसान के रोने जैसी लगी।
गायब होते मुसाफिर
जैसे-जैसे ट्रेन की रफ्तार बढ़ी, डिब्बे के अंदर का नजारा बदलने लगा। जो लोग सीटों पर बैठे थे, वे धीरे-धीरे धुंधले होने लगे। आर्यन ने गौर किया कि उसके बगल में बैठा एक आदमी अचानक गायब हो गया।
"समीर! देख, वो आदमी कहाँ गया?"
समीर का चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसने खिड़की की तरफ इशारा किया। बाहर जंगल या पहाड़ नहीं थे, बल्कि एक अनंत अंधेरा था जिसमें हज़ारों रूहें तैर रही थीं।
अचानक, डिब्बे का दरवाजा खुला। वही बूढ़ा आदमी, जो स्टेशन पर था, अब ट्रेन का टीटी (TTE) बनकर अंदर आया। उसके हाथ में एक काला रजिस्टर था।
"टिकट... अपनी रूह की टिकट दिखाओ," उसने गरजते हुए कहा।
जब वह आर्यन के पास पहुँचा, तो उसने आर्यन का हाथ पकड़ लिया। बूढ़े का हाथ बर्फ से भी ज़्यादा ठंडा था। "आर्यन... तुम्हारा वक्त आ गया है। तुमने तीन साल पहले उस एक्सीडेंट में जिस मासूम को सड़क पर तड़पता छोड़ दिया था, वह आज तुम्हें बुलाने आया है।"
अतीत का साया
आर्यन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह हादसा! उसने कभी किसी को नहीं बताया था कि उस रात उसकी कार से एक लड़के की मौत हुई थी और वह डर के मारे भाग गया था।
"नहीं! यह सच नहीं है!" आर्यन चिल्लाया।
तभी ट्रेन के फर्श से काले हाथ निकलने लगे और आर्यन के पैरों को जकड़ने लगे। समीर उसे बचाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन समीर का हाथ आर्यन के शरीर के आर-पार निकल गया।
"आर्यन! तुम... तुम देख नहीं रहे? मैं समीर नहीं हूँ!" समीर की आवाज़ बदलने लगी। आर्यन ने देखा कि समीर का चेहरा पिघल रहा था। वह वही लड़का था जिसकी मौत आर्यन की कार से हुई थी।
"मैं तो तुम्हारे साथ उसी दिन से हूँ आर्यन... बस तुम मुझे देख नहीं पा रहे थे," समीर (साये) ने अपनी जलती हुई आँखों से उसे देखते हुए कहा।
खौफनाक अंत
ट्रेन अब एक गहरी खाई की ओर बढ़ रही थी जहाँ से आग की लपटें निकल रही थीं। आर्यन ने भागने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन के दरवाजे गायब हो चुके थे। दीवारें खून उगल रही थीं और उन पर लिखा था— 'कर्मों का फल'।
जैसे ही ट्रेन खाई में गिरने वाली थी, आर्यन की नींद खुली।
वह अपनी कार की स्टीयरिंग पर सिर रखे हुए था। बाहर सूरज की पहली किरण निकल रही थी। "शायद... शायद वह एक बुरा सपना था," उसने राहत की सांस ली और पसीना पोंछा।
उसने बगल वाली सीट पर देखा। समीर वहां नहीं था। उसे याद आया कि वह तो अकेला ही ट्रिप पर आया था। उसने कार स्टार्ट करने के लिए चाबी घुमाई, तभी उसकी नज़र डैशबोर्ड पर पड़ी।
वहां एक पुराना, पीला पड़ चुका रेलवे टिकट रखा था। उस पर लिखा था: "अंतिम स्टेशन: नर्क। यात्री: आर्यन।"
और पीछे वाले शीशे (Rear-view mirror) में उसने देखा... वही बूढ़ा आदमी पीछे वाली सीट पर बैठा उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।