Shrapit ek Prem Kahaani - 48 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 48

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 48

चट्टान सिंह की बात सुनकर दक्षराज बहुत घबरा जाता है़ और फोन को काट देता है। दक्षराज अपना सिर पकड़कर सौचने लगता है ---


> मुझे अब जल्दी से जल्दी अघोर बाबा की कहे अनुसार अपना कार्य पुरा करना होगा। क्योकीं जन्माष्टी मे अब बस कुछ ही दिन बचे हैं। मुझे साधना के लिए उचित सामग्री का व्यवस्था कर लेनी होगी। क्योकीं अब कुम्भन भी मेध और सांतक दौनो मणि का खोज मे लग गया है वो कुंम्भन मुझ तक पहुंचे इससे पहले मैं अपना कार्य पूरा कर लुगां।



 दक्षराज के इतना सौचते ही वहां पर दयाल आ जाता है । दयाल दक्षराज को चिंता मे दैखकर कहता है---  

> मालिक आप किस चिंता में खोये हो ?


 दक्षराज दयाल को सब बोलकर सुनाता है । दक्षराज की बात सुनकर दयाल कहता है---


> मालिक तब तो वो मुझे भी नही छौड़ेगा मालिक 
क्योकीं उस रात मैं भी आपके साथ था ।


 दयाल दक्षराज के पैर को पकड़कर रोते हूए कहता है----

> मालिक मुझे बचा लिजिए मालिक । 



तभी वहां पर चेतन पहूँच जाता है जो एक किसान के भेष में था। चैतन वहां पहूँच कर दयाल से कहता है--


> तुम क्यों रो रहे हो। चितां मत करो सब ठीक हो 
जाएगा।


 किसान के भेष मे चैतन को दक्षराज पहचान लेता है और चैतन से हैरानी से पूछता है---


> चैतन जी आप यहां इस समय ? सब ठीक है ना ? 


चैतन कहता है ---


> हां , फिलहाल तो सब ठीक ही है। हमे क्या हो सकती है। 


दक्षराज कहता है---


> वो तो है। पर आपका यूं अचानक यहां आना । बाबा ने कुछ संदेश भेजा है क्या? 



चैतन कहता है---


> नही ऐसी कोई बात या संदेश नही है।



 चैतन दक्षराद को बाबा द्वारा कही सारी बात बोलकर सुनाता है। जिस कारण चैतन यहां आया था । चैतन अपनी बात पूरी करके कहता है---


> मैने सौचा आज की रात मैं यही हवेली पर बिताउंगा ताकि सुबह होते ही मैं फिर से उस शक्ती की खोज में निकल जाउ। 


दधराद कहता है---


> आपका अनुमान बिल्कुल सही है। मुझे भी यही लगता है के ये काम कोई परि का ही हो सकता है। क्योकींं हम इंसानो के पास ऐसी कोई शक्ती नही है जिससे कुंम्भन को हराया जा सके। 


दक्षराज की बात सुनकर चैतन कहता है---


> हां सत्य कहा आपने । मनुष्य के पास ऐसी शक्ती का होना असंभव है। ये किसी साधारण मनुष्य का काम नही है। ये कई और शक्ती है जो दिव्य है। और इसी दिव्य शक्ती का पता लगाने के लिए मैं इस भेष मे घुम रहा हूँ। इस शक्ती का पता मुझे सिघ्र ही लगानी पड़ेगा।


 उधर एकांश और गिरी हॉस्पिटल पहूँच जाता है। एकांश को दैखकर आलोक गाड़ी के पास आता है और एकांश , गिरी के साथ टिफिन को उतारने लगता हैं। आलोक एकांश से कहता है---


>> थैंक्स यार । तुमने खाना लाकर बहुत अच्छा किया । भूख भी बहूत लगी थी। 


एकांश एक हल्की मुस्कान देकर अंदर जाने लगता है तो संपूर्णा वहां आ जाती है और आलोक से कहती है---


> ये क्या आलोक । खाना मैने फोन करके घर से सबके लिए मंगाया और तुम इसका क्रेडिट भैया को दे रहो हो। 


संपूर्णा के इतना कहने पर सभी जोर जोर से हसने लगता है। तभी एकांश की नजर वृंदा पर जाती है जो चूप चाप होकर कुर्सी पर बैठी थी। संपूर्णा एकांश को वृन्दां के पास जाने का इशारा करती है। एकांश वृन्दां के पास जाकर कहता है--

> क्या हुआ वृन्दां तुम यहां अकेली क्यों बैठी हो ? 


वृंन्दा एकांश की बात का कोई जवाब नही देती और अपना मुह दुसरी तरफ करके बैठ जाती है। एकांश समझ जाता है के वृन्दां उससे नाराज है। एकांश बात को बदलते हूए आलोक से कहता है--


> आलोक मुझे पहले उन सारे लोगों से मिलना है जो मेला मे घायल हूए है। क्या सबको ट्रिटमेंट मिल गई ?


 आलोक कहता है---


> हां यार ट्रिटमेंट सबको मिल गई है। भगदड़ की वजह से वहां सबको काफी गहरी चोटें आई है। हमने सबका इलाज कर दिया है। पर कुछ दवाईयां घट गयी है तो मैने चतूर और गूना को दवाई लाने शहर भेज दिया है ।


 एकांश कहता है--

> ठिक किया यार । जो काम मुझे करना था वो काम तुम सबने करके मेरा बोझ कम कर दिया। 


आलोक एकांश के कंधे पर हाथ रखकर कहता है--


> तु अब ये सब मत सोच ।


 आलोक एकांश को मरिजों की और ले जाकर कहता है--


> दैख यार क्या किया है उस देत्य ने इन मासूमो के 
साथ । 


एकांश दैखता है के सभी का बहुत बुरा हाल था। उसमे बहोत सारे बच्चे भी थे जो बहूत गंभीर घायल थे । सभी के घांव बहोत ही गहरे थे। उन मासूमो की ये हालत दैखकर एकांश का दिल तड़प उठता है तभी आलोक कहता है---


> अभी सब आराम कर रहे हैं। तु चाहे तो दैख लो जाके।


 एकांश सभी घायलो को दैखने लगता है। घायलों को दैखते दैखते एकांश निलु काका के बेड तक पहूँच जाता हैं । निलु को दैखकर एकांश आलोक से पूछता है---

> अरे ये निलु काका को क्या हो गया ? ये भी मेला मे घायल हो गए।  


आलोक कहता है---

> नही ये तो मेला मे थे ही नही । 


एकांश कहता है---

> ये तु कैसे कह सकता है के निलु काका मेला नही गए थे वहां पर इतनी भीड़ थी तो तुझे कैसे पता ? 


आलोक कहता है--

> मुझे पता है क्योकीं जब मेैने बड़े पापा से निलु काका के बारे में पूछा था तो उन्होनें कहा था के निलु काका अपने रिस्तेदार के घर गए है। 


 एकांश आलोक से कहता है---


> अगर ये मेला मे नही थे तो फिर इन्हें ये चोंटे कैसे लगी ?


 आलोक कहता है़---


> इसी बात का तो पता लगाना है और यही बात बताने के लिए मैने तुझे फोन पर कहा था। 


आलोक कूछ सौचते हूए कहता है---


> यार मुझे ना बड़े पापा के बात पर सक हो रहा है। 



एकांश हैरानी से पूछता है---

> सक...! पर क्यों ? 


आलोक कहता है --

> जब मैने बड़े पापा तो कॉल किया और बताया के निलु काका हॉस्पिटल में है तो तुरंत घर से हॉस्पिटल पहूँच गये । पहले तो मुझे लगा के उन्हें निलु काका की चिंता है। पर मैने दौनो क दैखा तब मुझे उन दौनो पर शक होने लगा।


 एकांश पूछता है--


> पर तुमने ऐसा क्या दैखा। 


आलोक एकांश को सब बोलकर सुनाता है आलोक की बात सुनकर एकांश कहता है--

> पर अंकल झूट क्यों बोल रहे है और निलु को क्या बताने के लिए मना करके गए ? आलोक कहता हैं। इसी बात का तो पता लगाना है। के आखीर ये सब हमसे क्या छूपा रहें हैं।

एकांश कहता है---


> कही इन सब के पिछे कुंम्भन तो नही ? 

आलोक कहता है--

> हो सकता है।

 तभी संपूर्णा वहां आती है और कहती है---


> अब यहीं रहोगे या खाना भी खानी है । जल्दी आओ खाना ठंडी हो रही है। 


संपूर्णा की बात सुनकर सभी खाना खाने बैठ जाता है। सभी ने अपना अपना टिफिन ले लिया था। एकांश दैखता है के वृन्दां अभी भी कुर्सी पर अकेली बैठी थी। एकांश वृन्दां को आवाज लगाते हूए कहता है---

> अरे वृन्दां आओ ना खाना खाते हैं। 


वृन्दा एकांश की और दैखकर कहती है--

> मुझे भूख नही है। 

एकांश उठकर वृन्दा के पास जाता है और वृंन्दा को समझा कर कहता है--

> नाराज हो क्या ?


 वृन्दां कुछ जवाब नही देती एकांश वृन्दां के पास कुर्सी लगाकर बैठ जाता है और कहता है--

> क्या हुआ किस बात पे नाराज हो मुझसे। 

वृन्दां कहती है--

> मुझे घुमाने के लिए तो तुम्हारे पास कभी टाइम नही 
होता है और किसी और के लिए तो बहुत टाइम है तुम्हारे पास। 

एकांश समझ जाता है के वृन्दां वर्शाली के कारण गुस्सा है। 

एकांश वृन्दां से कहता है --

> अच्छा तो ये बात है। सभी एकांश और वृन्दां की लड़ाई को दैखकर हंस रहा था। 

एकांश वृंन्दा से कहता है --

> वृन्दां मैं वर्शाली को लेकर कही घुम नही रहा था। जब हमे पता चला के कुंम्भन मेला मे हैं और तुम सब भी मेला गई हो तो हम सब जल्दी जल्दी मेला की और जा रहे थे के रास्ते मे हमे वर्शाली मिली और भी मेला आने की जिद करने लगी। तो मैं उसे ले कर चला गया । तो इसमे नाराज होने वाली क्या बात है। अब चलो भी बहुत भूख लगी है। 

वृंदा कहती है --

> क्यो वर्शाली ने तुम्हें खिलाकर नही भेजा और तुम उसे पहूँचाने गये थे या उसके घर मे रहने गये गया इतना टाइम हो गया था कितने लोग घायल थे पर तुम्हे क्या तुम तो उस वर्शाली के साथ बिजी थे और वो भी फोन स्वीच ऑफ करके रखे थे ताकी कोई तुम्हें डिसटर्ब ना कर सके। 


वृंन्दा की बात सुनकर एकांश सोचता है --


> अब मैं कैसे बताऊ के मैं वहां पर क्यों गया था और वहां पर फोन का नेटवर्क नही रहता । 

इतना बोलकरल एकांश उठता हेेै और वृन्दां का हाथ पकड़कर उठाते हुए कहता है--


> अब चलो खाना खालो। 


एकांश वृन्दां को खाना परोसता है। जिससे वृन्दां का गुस्सा काफी कम हो जाता है। और वृन्दां खाना खाने चल लग जाती है। खाना खाने के बाद संपूर्णा गिरी के साथ वहां से चली जाती हैं। हॉस्पिटल के बाहर एकांश बैठ कर वर्शाली के बारे मे सोचने लगता है--

> मैं वर्शाली की खूबसुरती के आगे कमजोर क्यों पड़ जाता हूँ। क्या मैं वर्शाली से प्यार करने लगा हूं ? उसके साथ रहना और उससे अलग ना होना क्या यही प्यार है।


 तब एकांश वृन्दां के बारे मे भी सौचने लगता है--

> अगर मैं वर्शाली से प्यार करता हुँ तो फिर मेरा मन 
वृन्दां के पास क्यो जात है। वृन्दां का साथ भी तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। तो क्या मैं वृन्दां से भी प्यार करता हूं। ये क्या हो गया है मुझे , मुझे कुछ भी समझ मे क्यों नही आ रहा है ।


एकांश वृन्दां और वर्शाली के बीच फंस जाता है। एकांश के मन मे दौनो के लिए ही फिलिंग्स थे तो क्या एकांशल दौनो से प्यार करने लगा था ? इतना सौचते सौचते एकांश वही पर सो जाता है।

 सुबह हो गई थी। चैतन अपने किसान के भेष मे दक्षराज के हवेली से बाहर आता है और गांव में घुमने लगता है। कुछ दूर जाने के बाद चेतन को एक पेंड़ के निचे कुछ लोग दिखता है जो पेड़ के निचे बैठकर बिड़ी फूंकते हूए आपस में बातें कर रहे थे।

चेतन धीरे धीरे उन सबके पास पहूँच कर खड़ा हो जाता है और उन सबकी बातें सुनने लगता है। वे सभी मेला के बारे में बात कर रहे थे। तभी उनमे से एक आदमी कहता है--

> अरे भाया ऐसा राक्षस तो मैने आज तक ना ही देखा है और ना ही कभी कल्पना की है। कुम्भन के बारे मे सिर्फ सुना था पर कल । कल उसे देख भी लिया। उसका विशाल सरीर , बड़े बड़े नाखून और लाल लाल आंखें जैसे अंगारे । बाप रे बाप , इतना भयानक राक्षस । पर जो भी हो एकांश के पापा ने उस राक्षस को फिर से उसी जंगल मे कैद कर दिया ।


दुसरा आदमी कहता हैं--

> हां भाया । और उसकी गर्जना कितनी भयानक थी। 
मेरे कान तो अभी तक उस भंयकर गर्जना को नही भुला पाया है। ऐसा दैत्य तो मेने बचपन मे नानी के कहानियों मे ही सुना था पर सच मे ऐसा हता है ये बात कल मुझे पता चली। 


चेतन उन लोगो की बातें बड़े गौर से सुन रहा था। तभी चेतन उन लोगो से कहता है--


> हां भाया । ऐसा दैत्य तो सच मे होवे है। और सिर्फ यही नही इसके जैसा और भी देत्य है।

 सभी चेतन की बात को सभी बड़े ध्यान से सुन रहा था। तभी उनमे से पहला आदमी कहता है--

> अच्छा तन्ने तो खुब पता है , के और भी देत्य होवे है। बड़ी जानकारी रखे हो भाया देत्यो के बारें में । चचेरा भाई लगे हो के देत्यो के ? 


दुसरा आदमी कहता है--


> पहले तो ना देखे है तन्ने यहां । ऐ कौन हो भाया और यहां के कर रहे हो ?

To be continue....761