Shrapit ek Prem Kahaani - 47 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 47

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 47

एकांश की बात सुनकर सत्यजीत कहता है---

> नही बैटा अब वो ऐसा नही कर पाएगी क्योकीं भैया 
और मैं साधु बाबा से मिलकर आ रहे हैं और उन्होंने हमे एक रक्षा कलस दिया है। जिसे हमने उसी पैड़ पर बांधकर आ रहे हैं। अब वो कुंम्भन फिर से उसी सुंदरवन में कैद हो गया है। पर.......। 


इतना बोलकर सत्यजीत चूप हो जाता है। एकांश पूछता है---


> पर क्या चाचा , बोलिये ना । 


सत्यजीत कहता है---

> बेटा मुझे चिंता इस बात की है के जिसने शिला को गायब किया अगर उसने इसे भी गायब कर दिया तो और जब उसने रक्षा शिला को गायब किया तो वो ये भी कर सकता है। 


सत्यजीत की बात सुनकर सभी के चेहरे मे एक मायूसी छा जाती है। तभी एकांश का फोन रिंग होता है । एकांश अपना फोन निकाल कर देखता है की उसमे आलोक का फोन था। एकांश जैसे ही फोन रिसिव करता है उधर से आलोक की गुस्सा वाली आवाज आता है---


> कहां है यार तु । सुबह से इतनी बार तेरा फोन ट्राय किया पर तेरा फोन आउट ऑफ नेटवर्क था। इधर इतना प्रॉबलम है और तु अपना फोन ऑफ करके सो रहा था। 


आलोक की बात सुनकर एकांश समझ जाता है के वर्शाली के घर मे नेटवर्क नही रहने के कारण आलोक का फोन नही लगी था इसिलिए आलोक एकांश पर गुस्सा रहा था। आलोक की बात सुनकर एकांश कहता है ---


> सॉरी यार वो मैं वर्शाली के वहां था और वहां पर नेटवर्क नही था । अच्छा अब वो सब छोड़ो और ये बताओ के तुम अभी कहां हो। 



आलोक चिड़कर कहता है ---


> और कहां हॉस्पिटल मे।


 एकांश झट से कहता है---


> हॉस्पिटल में पर तु वहां पर क्या कर रहे हो ? 


आलोक गुस्से से कहता है----


> जो तुझे करना चाहिए वो मैं कर रहा हुँ। तुझे पता है ना आज मेला में क्या हुआ था या भुल गया के कितने लोग घायल हो गए और कितने मारे गए। यहां हम उन्हीं घायलो को लाए हैं। और उनका इलाज कर रहे है। और एक तु है जो एक डॉक्टर होके भी हॉस्पिटल मे नही हैं और पता नही पुरा दिन कहां गायब था। इन्हें संभालना मुश्किल हो रहा है , तु जल्दी से आजा ।



 एकांश कहता है---


> ओहो अब माफ कर दे यार । मैं अभी आता हूँ और कौन कौन है वहां ?



 आलोक कहता है---


> तुझे छौड़कर सभी है। अब तु जल्दी आ तुझे कुछ बताना है। 


एकांश कहता है ----.
.> ठीक है और थैंक्स यार के जो काम मुझे करना था वो तुम सब ने किया । 



आलोक कहता है---

> अच्छा ठीक है अब मुझे बहला मत और आराम से
आजा। 


इतना बोलकर दौनो ही फोन काट देता है। एकांश फोन को अपने जेब में रखकर सौचता है--


..> ये आलोक आखीर कौन सी बात करना चाहता है। जिसे कहने के लिए उसने मुझे वहां पर बुलाया। कही कुंम्भन के बारे मे तो नहीं। 


इतना सौचकर एकांश वहां से हॉस्पिटल जाने लगता है तभी इंद्रजीत एकांश को रोक कर कहता है---


> अरे एकांश बैटा ! अब तुम कहां जा रहे हो ?


 तभी वहां मीना भी आ जाती है और एकांश को खाना खाने बुलाती है। एकांश इंद्रीजीत की ओर दैखकर कहता है---

> पापा मैं हॉस्पिटल जा रहा हूँ। 


मिना कहती है---


> हॉस्पिटल और इस वक्त ? 


एकांश कहता है ---



> हां माँ , वहां बहोत सारे लोग है जो घायल है और वृन्दां अकेली सबका इलज नही कर पाएगी पता नही इतने सारे लोगों को वह अकेली कैसे संभाली होगी । पर अच्छी बात यह है के वहा पर सभी दोस्त और संपूर्णा भी है। सुबह से वो लोग थक भी गए होगें इसिलिए मुझे जाना होगा। 



एकांश अपनी माँ की और दैखकर कहता है---


> मां मेरा और उन लोगो की खाना भी टिफिन में दे 
दिजिये। वो सब भी भूखे होगें । हम सब वही साथ मे खा लेगें। 


एकांश की बात सुनकर मिरा कहती है---
.
> मैने उन सबका खाना पहले ही टिफिन मे रेडी करके 
रख दिया है शाम को वृंदा ने कॉल किया था। इसिलिए मैने सबका खाना रेडी करके रखा है और गिरी उसे लेकर जाता ही होगा। 


मिरा की बात सुनकर एकांश गेट की और दौड़कर जाने लगता है और भागते भागते कहता है --


> मां मेरा खाना भी टिफिन में भर दो तबतक मैं गिरी चाचा को रौकर आता हूँ।



 इतना बोलकर एकांश गेट की तरफ भाग कर हवेली से बाहर आ जाता है और बाहर आकर दैखता है के गिरी चाचा गाड़ी में टिफिन चड़ा रहा था। एकांश गिरी चाचा से कहता है--

> चाचा मैं हॉस्पिटल ही जा रहा हूँ तो ये खाना भी मैं लेकर चला जाउगां आप जाके क्या करोगे आप दिजिये मैं जा रहा हूँ।


 इतना बोलकर एकांश गाड़ी की चाभी लेने के लिए गिरी के सामने अपना हाथ बड़ाता है तो गिरी कहता है---


.> एकांश बेटा मुझे तो जाना ही पड़ेगा क्योकीं संपूर्णा 
बेटी का कल एग्जाम है तो मालीक ने कहा के मैं संपूर्णा बेटी को हवेली वापस लेकर आउ। 



इतना बोलकर गिरी आगे ड्रायविंग सीट पर जा कर बैठ जाते हैं और एकांश से कहता है-–


>. चलो बैटा बैठ जाओ।


 एकांश गिरी के साथ बैठ जाता है के तभी मिना एकांश का टिफिन भी लेकर आ जाती हैं और टिफिन को एकांश के हाथ मे देकर कहती है---


> ये लो बैटा आराम से जाना और ये खाना खा लेना 
और अपना ख्याल रखना बेटा।



 एकांश कहता है ----- 


> हां मां आप टेंसन मत लो । अब मैं आता हूँ। 


एकांश अपनी मां को बाय कहते हूए वहां से चला जाता है। 


उधर बाबा का शिष्य चेतन जिसे अधोरी ने उस अंजान शक्ती की खोज करने भैजा था। चेतन एक आम किसान का भेष बनाकर गांव मे घुमने लगता है। ताकि कोई उसो पहचान ना पाए और कोई ऐसा मिल जाए जिससे वह मेला के बारे में पूछं सके।


 चेतन पूरे गांव मे घूमने लगता है पर उसे गांव मे कोई नही मिलता जिससे वह मेला के बारे मे पूछ सके। पुरा गांव सुनसान पड़ा था। सभी डर से अपने अपने घरों मे घुसकर रहता है। कुछ घायल हॉस्पिटल मे तो कुछ श्मसान मे था। चेतन मन ही मन सौचता है--


> कमाल है गांव मे कोई भी नही दिख रहा है , लगता है आज यहां से कोई जानकारी नही प्राप्त हो सकता मैं यहां कल सुबह आउगां। इतना बोलकर चेतन वही से चला जाता है। 


उधर दक्षराज अपने हवेली में काफी परेसान था। इस समय वह कुंभन के बारे सौच रहा था। उसे यह बिल्कुल भी लमझ मे नही आ रहा था के आखिर उस शिला को गायब कौन कर सकता है वह भी ये जानते हूए के इस सिला को वहां से हटाने से कुंम्भन गांव में वापस आ जाएगा। 



दक्षराज इतना सौच ही रहा था के तभी दक्षराज का फोन रिंग होता है। दक्षराज फोन निकाल कर देखता है के उसमे चट्टान सिंह का कॉल आ रहा था । चट्टान सिंह का कॉल दैखकर दक्षराज हैरान हो जाता है और कहता है----


> अरे ये चट्टान का फोन इस समय ।


 इतना बोलकर दक्षराज फोन रिसिव करता है और कहता है---


> हां चट्टान बोलो ! बड़े दिनो बाद याद किया । कुछ विषेश काम या फिर से साधना करनी है। 


उधर से चट्टान सिंह का आवाज आता है---


> नही यार ऐसी कोई बात नही है। अब उस रास्ते पर दोबारा वापस नही जाना चाहता। मैं तुंम्हे ये बताने के लिए कॉल कर रहा था के तुझे तो पता है के गांव के बाहर शक्ती शिला गायब है।



 दक्षराज कहता है----+

> हां मालूम है। 

चट्टान सिंह फिर कहता है---


> हां। पर इंद्रजीत ने आज साधु बाबा के पास जाकर 
उनके पास से एक रक्षा कलस लाया था जिसे हमने उसी जगह पर स्थापित कर दिया है जहां पर पहले रक्षा कवच थी । और साधू़ु बाबा ने कहा के जबतक ये रक्षा कलस उस जगह पर है। कुंम्भन अब वापस नही आ पाएगा।

चट्टान सिंह की बीत सुनकर दक्षराज कहता है --


> हां मैं ये बात जानता हूँ के रक्षा कवच गायब हो गया है । और ये भी जानता हूँ के इंद्रजीत ने साधु बाबा से एक रक्षा कलस लाया है क्योकीं इंद्रजीत ने सुबह ही मुझे इस बारे मे फोन करके बताया था। ये अच्छी बीत है के कुंम्भन फिर से कैद हो गया पर कबतक ? इस कलस को भी उसी तरह गायब कर दिया जाएगा जैसे रक्षा कवच गायब हुआ था।


 दक्षराज चट्टान सिंह से पूछता है---



..> पर ऐसा कौन कर सकता है। 


चट्टान सिंह कहता है----


> ये सब तो मुझे भी नही पता । पर मुझे लगा के ये सब तुम्हे बतानी चाहिए इसिलिए तुम्हें कॉल किया। 
तुम्हे पता है के मेला में कुंम्भन को उपर एक शक्ती से हमला किया गया था । जिससे कुंम्भन सिधा जंगल में जा गिरा। 


दक्षराज चुप होकर चट्टान सिंह की बाते सुन रहा था। चट्टान सिंह अपनी बात जारी रखते हुए कहता है---


> तुम्हें क्या लगता है दक्षराज ये कौन सी शक्ती हो सकती हैं ? 



दक्षराज हक्ला कर कहता है---


> क..क...कौन सी ? 


चट्टान सिंह हल्की मुस्कान के साथ कहता है---


> वो आ गई है दक्षराज । उस परि को बचाने दुसरी 
परि भी आ गई है। मैने तुम्हें उस दिन कितना समझाया के इन सब साधना , तंत्र विद्या इन सब से दुर रहो पर तुमने मेरी बात नही मानी और उस परि पर मोहीत होकर तुमने उस का मणि तुमने छीन लिया । अब उसे बचाने दुसरी परि भी आ गई है। और इधर कुंम्भन भी अपनी बेटी कुंम्भनी का मणि ढुंढने के लिए रक्षा कवच को तोड़ दिया । दक्षराज सच- सच बताना क्या कुंम्भनी का मणि भी तुम्हारे पास है ना ? 


चट्टान सिंह की बात से दक्षराज बहोत घबरा जाता है वो कुछ बोल नही पा रहा था। चट्टान सिंह फिर पूछता है---

> दक्षराज तुमने मेरी बात का जवाब नही दिया। 


दक्षराज कहता है---


> नहीं चट्टान मेरे पास कुंम्भनी का मणि नही है। अगर मेरे पास वो मणि होती तो मैं अकेले ही कुंभन को सामना कर सकता था। पर मैं भी अब मेघ मणि को ही ढुंढ रहा हूँ ताकी मैं इन दौनो मणियों की सहायता से बहोत शक्तीशाली बन जाऊं। 




चट्टान सिंह कहता है ---


> तु अब भी मणि के बारे में ही सौच रहा है उस दिन भी तुने मेरी बात नही मानी थी और मणि की लालच मे मुझे वहां से भगा दिया था । दक्षराज अब दौनो ही अपनी अपनी मनियो को ढुंढने लगा है। और अब तुझे सावधान रहने की आवश्यकता है। क्योकीं कुंम्भन को कैद कर लिया पर परि कैद नही है। वो कहीं पर भी आ सकती है। 


चट्टान सिंह की बात सुनकर दक्षराज बहुत घबरा जाता है़ और फोन को काट देता है। दक्षराज अपना सिर पकड़कर सौचने लगता है ---


> मुझे अब जल्दी से जल्दी अघोर बाबा की कहे अनुसार अपना कार्य पुरा करना होगा। क्योकीं जन्माष्टी मे अब बस कुछ ही दिन बचे हैं। मुझे साधना के लिए उचित सामग्री का व्यवस्था कर लेनी होगी। क्योकीं अब कुम्भन भी मेध और सांतक दौनो मणि का खोज मे लग गया है वो कुंम्भन मुझ तक पहुंचे इससे पहले मैं अपना कार्य पूरा कर लुगां।

To be continue.....735