गुना एकांश और आलोक के लिए प्लेट लगा देता है और कहता है---
यार ये लड़की कोई अप्सरा है क्या , इतनी सुंदर लड़की मेंने आज तक नहीं देखा।
तभी एकांश गुना के कान में धीरे से कहता है---
>" गुना हमें यहां से जल्दी दुकान बंद करके निकलना
होगा।
गुना पुछता है---
>" पर क्यू भाई। इतनी अच्छी दुकान चल रही है हमारी।
एकांश कहता है---
>" बात को समझो गुना यहा खतरा है। मैं तुम्हें बाद में बताऊंगा पहले जल्दी निकलो यहां से।
गुना एकांश से कहता है---
>" तुझे हो क्या गया है यार कैसी बात कर रहा है तू।
एकांश इंद्रजीत से कहता है---
>" पापा अब घर चलीये ना ।
गुना हैरानी से एकांश की और देखता है और इंद्रजीत भी। इंद्रजीत एकांश से हैरानी से पुछता है---
>" क्यूं बेटा कुछ समस्या है क्या।
एकांश कहता है----
>" हां पापा बात ही कुछ ऐसी है जो में आपको यहां नहीं बता सकता।
सत्यजीत एकांश का चेहरा देखता है और समझ जाता है के एकांश अंदर से परेसान है। सत्यजीत कहता है-----
>" भैया एकांश ठीक बोल रहा है। अब चलिये यहां से।
सभी हैरानी से पुछता है----
.>" पर अभी क्यू ?
सत्यजीत कहता है------
>" वो मैं सबको बाद में बताऊंगा। अब चलो जल्दी यहां से।
इतना बोलकर सब उठता है और जाने लगता है। गुना चतुर से कहता है-----
>" यार ये एकांश को क्या गया है। आज ये कैसी बात कर रहा है।
तब चतुर गुना के कान के में कहता है----
>" भाई एकांश ठीक कर रहा है। क्योंकी यहां मेला में
इसी पेड़ के ऊपर कुंभन है। इसिलिए जल्दी निकल यंहा से।
कुम्भन का नाम सुनकर गुना चुप हो जाता है। जैसे ही सभी अब दुकान से बहार आता है। एक छोटे बच्चे ने खिलोना वाली बंदुक से जिसका छोटा छोटा प्लास्टिक की गोली थी। कुम्भन के आंख में मार देता है।
बंदूक की गोली तेज होने के कारण कुंम्भन के आंख में चौट लग जाता है। जिससे कुंम्भन गुस्सा होकर वही खड़ा हो जाता है और जोर जोर से गर्जना करने लगता है। कुंम्भन की गर्जना इतनी भयानक था के सब डर से इधर उधर भागने लगता है।
एकांश किसी तरह से अपने परिवार वालो को वहाँ से निकलना चाहता था पर भीड़ में भागदौड़ के कारण से नहीं निकाल पाता है। सभी को अब ये समझ में आ जाता है के एकांश क्यों सबको यहां से जल्दी जाने को बोल रहा था।
तभी एक सुरक्षा गार्ड अपनी बंदुक निकाल कर कुम्भन पर गोलियां दाग देता है। पर उन गोलियों का असर कुम्भन पर नहीं होता है। पर कुंम्भन हसिक्युरिटी गार्ड के दो टुकड़े कर देता है। कुंम्भन अब अपने शरिर का आकार छ: माले तक बढ़ा लेता है और लोगो को कुचलने लगता है।
जिसे काफी लोग दब के मर जाता है। वर्शाली कहती है---
>" एकांश जी हमें यहां से जल्दी निकलना है।
एकांश वर्शाली से पुछता है---
>" वर्शाली क्या तुम अपनी शक्ति से मेरे परिवार को यहां से निकाल सकती हो।
वर्शाली कहती है----
>" निकाल तो सकती हु पर मैं ऐसा नहीं कर सकती। क्योंकी ऐसा करने से सबको मेरे बारे में पता चल जाएगा के मैं एक परी हूं।
उधर राजनगर में दक्षराज को पता चल जाता है। के रक्षा कवच टूट चूका है। दयाल दक्षराज को सब बताता है। दक्षराज जैसे ही दयाल को नीलू के बारे में बताता तभी एक आदमी आ कर कहता है----
>" मालिक मेला में कुंम्भन ने अतंक मचा दिया है।
दक्षराज इतना सुंदर कहता है----
>" दयाल तुम अपने कुछ आदमी को लेकर जाओ और कुम्भन पर गोलियां बरसा दो।
दक्षराज के इतना कहने पर दयाल कुछ आदमी को लेकर मेला में चला जाता है। दयाल और कुछ आदमी मेला पँहुच जाती है। जहां कुम्भन को देखकर और उसकी गर्जना सुनकर कुछ लोग भाग जाता है।
बाकी बचे कुछ साथी को लेकर दयाल कुम्भन पर बहुत गोलियां बरसाता है पर कुंभन को कोई फर्क नहीं पड़ता जिसे देखकर दयाल हैरान रह जाता है। कुम्भन दयाल के साथ आए 2 आदमी को मार देता है और काफी लोगों को नुक्सान पहुंचाता है।
जिसे देख कर एकांश से रहा नहीं गया और एकांश कुम्भन को आवाज लगाते हूए कहता है---
>" अरे ओ निर्दयी देत्य। इन मासूमो को क्यूं मार रे हो । इन्होने तेरा क्या बिगाड़ा है।
वर्शाली एकांश से कहती है----
>" एकांश जी संभालिए अपने आपको आप क्या कर रहे हैं। अगर कुम्भन ने आपको देखा लिया तो पता नहीं क्या होगा।
मीना भी एकांश से कहती है---
>" हां बेटा जल्दी से निकलो यहां से।
सभी कुम्भन को देख कर कफी डर गए थे। वर्षाली कहती है। एकांश जी ये गांव वाले तो मुर्ख है। उन्हे ये नहीं पता के कुम्भन को पत्थर मारने से कुछ नहीं होगा।
कुम्भन गांव वोलो को अपने पैरो से कुचल रहा था जिसे एकांश से रहा नहीं जाता और वो भीड़ में कुम्भन के आगे जा कर खड़ा हो जाता है और कहता है----
>" मासूमो को मारना छोड़ दे ओ धूर्त देत्य और चला जा यहाँ से।
कुम्भन एकांश की बात का ध्यान नहीं देता तो एकांश एक पत्थर उठा कर कुम्भन के तरफ फैकता है। तभी वर्शाली भी एकांश के पिछे पिछे आ जाती है। वर्शाली एकांश का हाथ पकड़ लेटी है और कहती है---
>" रुकिए एकांश जी ये आप क्या कर रहे हैं वो एक देत्य है और आप एक साधारण मानव । आप इस देत्य का जरा सी भी क्षति नहीं कर पाएंगे।
तभी कुम्भन की नजर एकांश पर पड़ती है। एकांश के हाथ में पत्थर देख कर कुम्भन गुस्से से लाल हो जाता है। कुंम्भन एक शक्ति से एकांश पर प्रहार करता है तो वर्शाली एकांश को धक्का दे देती है जिससे एकांश कुछ दूर जा कर गिर जाता है और वो शक्ति वर्शाली को लग जाती है।
वर्शाली गिर जाती है। वर्शाली गिरते गिरते उसके हाथ में एक नीले रंग की मणी प्रकट होता है जिससे एक रोशनी निकलती है जो कुम्भन को जाकर लगता है। जिससे कुम्भन दर्द सो कराहते हूए बहुत दूर जंगल के अंदर जा कर गिरता है और बेहोश हो जाता है।
एकांश दौड़ कर वर्शाली के पास आता है और अपने गौद में उठा लेता है एकांश वर्शाली के गाल में अपना हाथ रख कर कहता है---
>" वर्शाली ....! वर्शाली ...! ये क्या किया वर्शाली तुमने। मेरे ऊपर किया हुआ प्रहार तुमने अपने ऊपर ले लिया।
वर्शाली एकांश को देखती है एक हल्की मुस्कान देती है और वही बहोश हो जाती है। सभी दौड़ कर वर्शाली के पास आता है। मेला में चारो और लोगो की भाग दौड मच गई थी जहां तांहा आदमी घायल पड़े थे तो कहीं मुर्दा पड़े थे।
एकांश वर्शाली को होश में लाने की कोशि करता है पर वर्शाली नहीं उठती है।
एकांश बहोत डर जाता है , के कही वर्शाली को कुछ हो ना जाॉए । मीरा वर्शाली के हाथ और मीना पैर को रगड़ती है।
एकांश बहुत घबराया हुआ है। एकांश कभी वर्शाली के नब्ज चेक कर रहा था तो कभी दिल की धड़कन पर वर्शाली अब भी बेहोश थी। आलोक एकांश से पुछता है ---
>" क्या हुआ यार ?
एकांश कहता है.----
>" पता नहीं यार वर्शाली की सांस नहीं चल रही है। इसे जल्दी हॉस्पिटल ले जाना पाएगा।
तभी एकांश वर्शाली को वही जमीं पर लिता देता है और वर्शाली के सिने को जोर प्रेस करने लगती है। मैडिकल भाषा में इसे सी , पी , आर कहते हैं। एकांश वर्शाली के चेस्ट को जोर दबाये जा रहा था। पर वर्शाली फिर भी नहीं उठती है। तब एकांश माउथ टू माउथ रिक्यूसिटेशन देने जा रहा था।
जैसे ही एकांश अपने होते हैं वर्शाली के होठ के पास लेकर जाता है। वृंदा एकांश से कहती है----
>" ये क्या कर रहो हो एकांश।
एकांश कहता है---
>" डॉक्टर होकर तुम्हें पता नहीं।
इतना बोलकर एकांश वर्शाली के होंट में अपना होंठ सटा देता है और सांस देने लगता है।
एकांश का होता सटते ही वर्शाली के शरीर मे हरकत करने लगती है। और वर्शाली धिरे - धिरे अपनी आंखें खोलने लगती है अब वर्शाली को होश आ गया था तो वर्शाली देखता है के एकांश का होंठ उसके होंठ से सटा है।
वर्शाली चुप होकर एकांश को देखे जा रही थी। एकांश बहुत घबराय हुआ था और वो वर्शाली को सांस दे रहा था तब एकांश देखता है के वर्शाली को होश आ गया है।
जिसे देखने एकांश के चेहरे में खुशी आ जाती है। एकांश अपना दोनो हाथ वर्शाली के गाल में रखकर कहता है---
>" वर्शाली तुम ठीक हो..!
वर्शाली अपना सर हां में हिलाती है। मीना वर्शाली के बाल को सहलाते हुए कहत। हैं--
मिना :- बेटी आज तुमने हम सबको एकांश की जान बचाकर खरिद लिया बेटी। आज तूने जो किया वो एहसान हम कभी चूका नहीं पाएंगे। पर अगर तुम्हें कुछ हो जाता बेटी तो हम अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाते।
मीना की आँखों से आँसू बह रहा था। जिसे दैखकर वर्शाली बैठकर उठ जाती है और मीना से कहती है--
वर्शाली: - ये क्या माँ। आप कैसी बात कर रहे हैं मैंने किसी पर कोई एहसान नहीं किया और ना ही खरीदा है। आप लोग तो मेरे अपने हो ना और अपनो पर कोई एहसान करता है क्या।
मीना वर्शाली का हाथ पकड़ कर कहती है---
मीना :- हां बेटी तू तो मेरी बेटी ही है।
वर्शाली उठने की कोसिस करती है पर वो कुंम्भन की शक्ती प्रहार ये बहुत कमजोर हो गई थी। जिस कारण वो उठ नही पा रही थी। एकांश वर्शाली को उठने में मदद करता है। वर्शाली ठिक से खड़ी नहीं हो पा रही थी।
वर्शाली एकांश से कहती है----
वर्शाली : - एकांश जी आप मुझे अपने घर तक पहूँचा देंगे ?
To be continue...556