वर्शाली एकांश की आंखों में अपने लिए प्रेम देख पा
रही थी।
वर्शाली एक टक नजर से एकांश को देखे ही जा रही
थी। तभी एकांश वर्शाली से कहता है-----
एकांश :- क्या हुआ वर्शाल बताओ ना..? क्या प्रेम जात पात देख कर किया जाता है।
वर्शाली एकांश के आंखों में दैख कर कहती है---
वर्शाली: - नहीं एकांश जी। प्रेम की कोई सीमा नहीं
होती और नाहीं ही जात पात का प्रेम किसी से भी हो सकता है बस प्रेम निस्वार्थ होना चाहिए।
इतना बोलकर एकांश और वर्शाली एक दसरे के आंखों में देखने लगता है। और ऐसे ही एक दुसरे को दैखते रहता है ।
उधर राजनगर में दक्षराज अपनी हवेली से बाहर आता
है। जिसे देख कर सब अब चुप हो जाते हैं जो कुछ
देर पहले सौर कर रहे हैं वो अब दक्षराज के डर से
शांत हैं। दक्षराज अपनी भारी आवाज से कहता है------
दक्षराज :- बोलिए आप सबका यहां आने का क्या कारण है।
दक्षराज कहता है---
दक्षराज :- गांव में छाता मेला चल रहा है ना..? क्या मेला संपन्न हो गया?
सब दक्षराज के डर से चुप था तभी एक लड़का उठता
है और कहता है। नहीं मलिक मेला कफी धूमधाम से
चल रहा है पर पिछले कुछ दिनो से गांव में अजीब अजीब घटनाये घट रही है। जबसे मेला लगी है तब से।
दक्षराज हैरानी से पुछता है----
दक्षराज :- घटना...! कैसी घटना.?
लड़का कहता है----
लड़का :- मालिक कुछ दिनो से गांव के सभी जानवर
अचानक से रोज एक एक करके गायब हो रहे हैं और कल शाम को मेला में अचानक गायब हुए सभी जनवारो की कंकाल एक साथ मेले में जहां था बिखरा था। मलिक हमें तो डर है के कहीं वो देत्य कुम्भन का तो काम नहीं..!
दक्षराज उस लड़के के बात से परेसान हो जाता है और कहता है---
दक्षराज :- क्या...! कुम्भन...! पर वो बाहर कैसे आ सकता है। कही रक्षा कवच को किसीने .... नही नही ऐसा नही हो सकता ।
दक्षराज मन ही मन सोचता है ---.
" ये कैसे हो सकता है , अगर कुंम्भन बाहर आ गया तो वो मणी , कही कुम्भन को मणी मिल तो नही गया ? अगर ऐसा हूआ तो मेरा श्राप , नही मुझे कुछ करना होगा , बाबा , हां अधौरी बाबा के पास जाना होगा "
दखराज सौच में पड़ जाता है , दक्षराज के मन में भी
कुम्भन का डर था। दक्षराज दयाल को अपने पास बुलाता है और कान में कहता है-----
दक्षराज :- दयाल तुम जाकर वो शक्ति शिला को एक बार देख कर आओ और मुझे तुरंत खबर करो ।
दयाल हां में अपना सर हिलाकर कहता है----
दयाल: - ठीक है मलिक में अभी जा कर देखता हुं ।
इतना बोलकर दयाल वहा से चला जाता है। तब दक्षराज गांव वालो से कहता है---
दक्षराज :- देखिये आप लोग डरिये नहीं मैं इस बात का पता लगाने की कोशिस करता हूं के अखिर में जनवारो को ऐसे कौन मार रहा है या अगर ये काम कुम्भन का है तो फिर इसका भी कुछ कुछ रास्ता निकालना पड़ेगा। अब आप जाओ और जा कर दौ दिन बचे मेला को पूर्ण करो मैं आज शाम को आलोक को आपके पास भेजुगां ।
इतना बोलकर दक्षराज वहां से उठा कर हवेली के अंदर चला जाता है।
दोपहर हो गया था। भानपुर में वृंदा एकांश का इंतजार कर रही थी और सोच कर उदास हो रही थी के ये एकांश अभी तक घर क्यों नहीं आया। वृंदा इतना सोच ही रही थी के तभी वहां पर मीना और मीरा भी आ जाती है।
दौनो वृंदा के पास आकर बेठ जाती है। मिना वृंदा के सर प्यार से हाथ फिराती हुई कहती हैं----
मिना :- क्या बात है बेटा तुम इतनी उदास क्यों हो? यहाँ मन नहीं लग रहा है क्या ?
मीरा कहती है---
.मीरा :- हां बेटा क्या बात है कुछ परेसानी है तो बताओ। यहाँ किसी चिज की कमी है तो बताओ बेटा ये भी तो तुम्हारा ही घर है।
वृंदा झट से दोनो का हाथ पकड़ती है और कहती है---
वृदां :- नहीं नहीं चाची ऐसी कोई बात नहीं है। यहां तो
मुझे अपने घर से भी ज्यादा प्यार मिल रहा है।
मीना :- तो फिर तू इतनी उदास क्यों है।
तभी वहां संपूर्णा आ जाती है और कहती है----
संपूर्णा :- शायद वृंदा भाई के लिए परेसान है। है न वृंदा..!
संपूर्णा के मुह से ये बात सुनकर वृंदा के होश उड़ जाते हैं वो डर जाती है के कहीं एकांश और उसके रिश्ते का पता उनको ना लग जाए। वृंदा अपनी आंखे बड़ी बड़ी कर लेती हैं और अपनी आंखो से ही वृंदा को ईशारे में ऐसी बात इनके सामने ना करें।
संपूर्णा की बात से वृंदा की हालत देख कर मीना और मीरा दोना ही मंद मंद मुस्कुराने लगती है। मीरा बात को घुमाते हुए कहती हैं---
मीरा :- एकांश का इंतजार कर रही है पर क्यों बेटा।?
मीरा की बात की सुनकर वृंदा सौच में पड़ जाती है के अब इसका जवाब क्या दे। वृंदा मन ही मन सोचती है---
""ये संपूर्णा की बच्ची ने कहा फसा दिया..! वृंदा..! अब तू क्या बोलेगी आंटी को. ! तू तो बुरी तरह फंस गयी
वृंदा तेली लव स्टोरी सुरु होने से पहले ही इसका अंत हो जाएगा लगता है "
वृंदा इतनी सोचती है कि तभी मीना कहती है----
मीना :- अरे क्यूं का क्या मतलब। वृंदा को कहीं बाहर
जाना होगा इसिलिए एकांश का इंतजार कर रही होगी , है ना बेटा।
वृंदा हां में अपना सर हिलाते हुए कहती हैं---
वृदां :- हां...हां...चाची।
मीरा :- पर वृंदा तो बहार संपूर्णा के साथ भी जा सकती है।
वृंदा के पास अब इसका कोई जवाब नहीं था। वृंदा सोच नहीं पा रही थी के अब इसका जवाब क्या दे।
तभी संपूर्णा कहती है---
संपूर्णा :- शायद वृंदा को भाई से कुछ कहना हो।
संपूर्णा की बात सुनकर वृंदा की धड़कन तेज हो जाती है।
वृंदा घबराती हुए कहती हैं----
वृदां :- ये...ये....ये...क्या बोल रही हो संपूर्णा तुम। भला मुझे एकांश से क्या कहना होगा।
वृंदा बहोत घबरा चुकी थी वृंदा की हालत देख कर मीना, मीरा और संपूर्णा तीनो ठहाके लगा कर जोर से हंसने लगती है।
जिसे देखो वृंदा हैरान हो जाती है। वृंदा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था के ये सब ऐसे क्यों हंस रहे हैं। वृंदा ऐसा सौच ही रही थी के मीरा मीना से कहती है----
मीरा :- अरे दीदी अब बस भी करो ना क्यों सता रहे हो तुम मेरे बहू को।
To be continue......373