Beete samay ki REKHA - 8 in Hindi Classic Stories by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | बीते समय की रेखा - 8

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बीते समय की रेखा - 8

8.
क्या आपने किसी कहानी को फटते हुए देखा है? दरारें पड़ जाती हैं।
हमारी ये कहानी भी फट गई। एक नहीं, दो - दो दरारें पड़ गईं इसमें।
बेहतर होगा कि आपको इसके टूटे हुए सभी हिस्से दिखा दिए जाएं ताकि आपको पूरी कहानी मिल सके -मुकम्मल!!
ये बात तब की है जब रेखा की शादी हुई।
आम तौर पर भारतीय समाज में शादी का मतलब होता है कि एक लड़के और एक लड़की का एकाकी जीवन पूरा हुआ, अब वो साथ में रहेंगे और अपनी आने वाली संतति के लिए जीवन की सुविधाएं जुटाते हुए अपनी ज़िंदगी पूरी करेंगे। 
लेकिन ये रेखा की शादी थी।
इसके अर्थ भी अलग- अलग बहुत सारे थे।
इस शादी का जो प्रभाव उसके जीवन पर पड़ा वो किसी प्रिज़्म से गुज़री हुई लाइट की तरह अलग- अलग रंगों का है। जैसे - 
एक वो जो स्वयं रेखा ने सोचा।
दूसरा वो जो उसके पति ने सोचा।
तीसरा वो जो समाज ने सोचा।
चलिए हम इन तीनों पर ही अलग- अलग बात करते हैं।
रेखा का मानना था कि सदियों से शादी के बाद लड़के ही परिवार का बोझ उठाते रहे हैं। इसीलिए उन्हें शादी के बाद अपने माता - पिता के साथ बने रहने की छूट मिलती है और लड़की को अपना घर छोड़ कर पराए घर जाना पड़ता है, जहां उसका नाम, सरनेम, गोत्र, जाति, धर्म, रिवाज, खानपान, व्यवहार, नीति, आदर्श, सपने... सब कुछ बदल जाता है।
लेकिन अब लड़कियों को भी लड़कों की तरह तमाम सुविधाएं और सहारा देकर उसी तरह पढ़ाया जाता है, उसी तरह कमाना सिखाया जाता है, तो क्या ये ज़रूरी है कि अब भी परिवार का मुखिया लड़का ही बना रहे? क्या ज़रूरी है कि लड़की अब भी परिवार पर बोझ बनी रहे?
उधर रेखा के पति का मानना था कि एक उच्च शिक्षित, अच्छा कमाने वाली लड़की यदि जीवन में आएगी तो परिवार की सुविधाएं भी बढ़ेंगी और आगे आने वाली संतान का लालन पालन भी बेहतरीन तरीके से हो सकेगा। उसे "दहेज" से सख़्त चिढ़ थी। उसे इस बात से खिन्नता होती थी कि लड़के वाले दहेज के नाम पर लड़की के घर वालों से ज़्यादा से ज़्यादा धन लूट या मांग तो लेते हैं पर इस धन से किसी का भला नहीं होता क्योंकि दहेज का यह धन वस्तुतः काला धन होता है। न इसके बारे में किसी को बताया जा सकता है और न ही इसे भविष्य के अच्छे कामों में लिया जा सकता है। इसे तो चोरी के माल की तरह छुपाते हुए ग़लत कामों में ही खर्च करना पड़ता है। जबकि शिक्षित और मेहनती लड़की की अपनी कमाई से घर में बरकत होती है और जीवन स्तर सुधरता है।
रेखा और उसके पति कभी एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए अलग - अलग विभागों में रहे थे जहां उन्हें एक दूसरे के विचारों को जानने का मौका मिला था। दोनों एक ही जाति से आते थे।
उधर समाज का इस विवाह पर क्या सोचना था, यह भी जान लीजिए।
- लो, लड़की पढ़ - लिख कर हाथ से निकल गई। पढ़ने बाहर भेजा तो "लव मैरिज" ही कर बैठी। पढ़ाई - लिखाई में अच्छी थी, घर वाले ढूंढते तो लड़का भी अच्छा ही मिलता, कोई आइ. ए. एस., डॉक्टर या सी. ए. तो होता। कम से कम लड़की से ज़्यादा कमाने वाला तो होना ही चाहिए था। अब लड़की घर में हुकुम चलाएगी, किसी की सुनेगी भला! सास- ससुर को साथ तो मुश्किल ही रखे। लड़के को ही अलग कराएगी। लड़की की अभी उम्र ही क्या थी। घर वालों पर भरोसा तो करती। कौन सी उम्र निकली जा रही थी। अजी, उसका नाम "बॉम्बे" है, वहां जाकर तो लड़का- लड़की क्या गुल खिलाएं, कौन जाने।
इन सब खट्टी - मीठी- चटपटी बातों के बीच रेखा विवाह के बंधन में बंध गई।
कुछ इने - गिने लोग ऐसे भी थे जो इस विवाह को एक अच्छे निर्णय के रूप में देख रहे थे। उनका मानना था कि रेखा ने लड़का भी अपने बौद्धिक स्तर का ही चुना है। प्रेम भी किया तो अपनी ही जाति में, कम से कम दकियानूसी लोगों को कुछ कहने का मौका तो नहीं दिया। दोनों मेधावी हैं और आज चाहे जहां हों, भविष्य में अपना- अपना अहम मुकाम ज़रूर बनाएंगे।
एक दिलचस्प बात यह हुई कि विवाह इसी बनस्थली विद्यापीठ के परिसर में संपन्न हुआ। यहां के संस्कारी , शिक्षित, बौद्धिक वातावरण में किसी को कुछ भी कहने का मौका नहीं मिला और सब हंसी- खुशी शादी से सम्मिलित हुए।
हां, अपने मन में जिसने जो सोचा हो, वो सोचा ही होगा। आख़िर सोचने पर तो किसी का कोई वश नहीं है!
शादियों में आशीर्वाद समारोह ज़रूर होते हैं चाहें उनमें आने वाले आशीर्वाद के साथ- साथ ईर्ष्या, कुंठा या उपेक्षा लेकर ही आएं।
इसी कहानी के बीच आपको यह भी जानना चाहिए कि बनस्थली विद्यापीठ ने समय- समय पर अपनी बुनियादी सोच को लेकर कई असमंजस भी झेले।
इन्हीं में एक विचार यह भी था कि यहां रहने वाले विद्यार्थी और शिक्षक अनिवार्य रूप से शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करेंगे और परिसर में मांस, मछली, अंडा लाने तक की भी अनुमति नहीं होगी। इसी तरह मदिरा और धूम्रपान पर भी पूर्णतः प्रतिबंध था।
लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि विद्यापीठ को अपने इस निर्णय को लेकर दुविधा का सामना करना पड़ा।
कई बार ऐसा हुआ कि देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे कर्मचारी, शिक्षक, डॉक्टर, पायलट आदि विद्यापीठ में काम करने की हार्दिक इच्छा लेकर आते, उनका वहां चयन भी हो जाता पर बाद में यह बात उभरती कि उनके लिए मांसाहार और धूम्रपान आदि बहुत ही सामान्य बात है और वो इसके बिना रह ही नहीं सकते। कई लोग कहते कि हम तो फिर भी कोशिश करके इन आदतों को छोड़ दें पर हमारे परिवारजन तो यह विवशता बिल्कुल स्वीकार नहीं करेंगे।
इस पर बहुत चिंतन - मनन हुआ। संचालकों की राय भी आपस में बंट गई।
रेखा ने भी अपने दिल्ली -मुंबई प्रवास के दौरान देश के नामचीन वैज्ञानिकों, अधिकारियों, विशेषज्ञों को सहज ही भोजन में ऐसी कोई बाध्यता न मानते हुए देखा था। एक ओर जब देश- विदेश के उच्च शिक्षित लोग वहां आ रहे थे तो केवल एक ही तरह के भोजन और जीवन शैली पर कैसे दृढ़ रहा जा सकता था? सवाल यह था कि ऐसा करने से आधुनिक सोच के लोगों पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।
कई ऐसी छात्राएं भी थीं जिनके परिवारों में यह सब ग्राह्य था। दूसरे, वो खुद भी बड़ी - बड़ी नौकरियों के लिए अपने को तैयार करने की प्रक्रिया में थीं और इन विचारों को आगे बढ़ने में एक बंदिश ही मानती थीं।
आख़िर विद्यापीठ में एक अंतरराष्ट्रीय छात्रावास बनाने का प्रयोग स्वीकार किया गया। बहुत विचार - विमर्श के बाद सोचा गया कि केवल इसमें निरामिष भोजन की छूट दी जा सकती है। लेकिन गांधीवादी सिद्धांतों पर खड़े हुए परिसर में यह भी आसान न था। इसका प्रभाव अन्य छात्रावासों पर पढ़ने का अंदेशा था। परिसर की आलोचना होने की आशंका थी। अतः यह तय किया गया कि परिसर के नियम तो यथावत रहेंगे पर केवल इस छात्रावास के रहवासियों को सप्ताह में एक या दो बार विद्यापीठ के बाहर जाकर अपनी रुचि का भोजन करने की सलाह दी जाएगी। पास का कस्बा निवाई, जिला मुख्यालय टोंक या राजधानी जयपुर इसके लिए नज़दीक ही थे।
पर व्यवहार में यह निर्णय ले पाना भी संभव न हो पाया। फ़लस्वरूप विद्यापीठ को कई योग्य व अनुभवी लोगों की सेवा से वंचित भी रहना पड़ा। 
कुछ लोगों ने इस समस्या का समाधान अपने परिवार को परिसर से बाहर रख कर भी निकाला। वो ख़ुद विद्यापीठ परिसर में रहते पर उनका परिवार नज़दीक के कस्बे में रहता और कार्यकर्ता वहीं जाकर धूम्रपान, निरामिष भोजन आदि की अपनी ज़रूरतें पूरी कर लेते।
रेखा ने भी विद्यापीठ परिसर के बाहर ग्रामीण इलाके में अपना एक अपेक्षाकृत कुछ बड़ा निजी आवास बनाया हुआ था जो बाद में विद्यापीठ के कई कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों हेतु किरायेदारों के रूप में काम में आया।
किंतु अंततः स्वयं रेखा ने भी यह देखा कि विद्यापीठ की आबोहवा में ही कुछ ऐसा असर था जो यहां आने वाले कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों को यहां के जीवन मूल्यों में ढाल देता। वो स्वयं इन सब बातों और मूल्यों को आदर और आस्था से देखने लगते। ये एक प्रकार से भारतीय मूल्यों की जीत थी। विद्यापीठ का खुला वातावरण, शांतिपूर्ण पावन पवित्र रहन- सहन और अपने जीवन के लक्ष्य को हासिल करने की जिजीविषा यहां के लोगों को परम संतोष देती।
"सादा जीवन उच्च विचार" यहां का मूल मंत्र बना रहा।
बड़े सरकारी पदों पर, बड़े - बड़े महानगरों में रह लेने के बाद भी रेखा यहां एक सहज घरेलू महिला की भांति अपने परिवार की देखभाल स्वयं करते हुए अपने अध्यापन, शोध और प्रशासनिक कार्यों में लगी रहती।
बाहर से आने वाले लोग एक उच्च पद पर स्थापित अत्यंत शिक्षित महिला की जो छवि अपने मन- मस्तिष्क में लेकर आते वो यहां की वास्तविकता देख कर दंग रह जाते और स्वयं कहते कि घर के तमाम कामकाज अपने हाथों से निपटा कर अपने बच्चों की देखभाल, अपने विद्यार्थियों की चिंता करते हुए, सादा सरल वस्त्र विन्यास में रह कर, पैदल आवागमन करते हुए किसी महिला को विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थान के शैक्षिक तथा प्रशासनिक दायित्व को कुशलता से निभाते हुए देखना सचमुच अद्भुत है।
रेखा की यही छवि देश- विदेश में फैले उसके विद्यार्थी और उनके माता- पिता- अभिभावकों के बीच अंकित होती चली जाती।
***