Yah mai kar Lunghi - 8 in Hindi Fiction Stories by अशोक असफल books and stories PDF | यह मैं कर लूँगी - भाग 8

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यह मैं कर लूँगी - भाग 8

(भाग 8)

जान बची तो लाखों पाए!

सिटपिटाया-सा मैं रूम पर लौट आया। लगातार सोचता रहा कि उसे पता नहीं चला...या चल गया! क्या स्वप्न इतना जीवंत था कि होठ चूसना, उरोज मसलना जो अभी तक महसूस हो रहा है, वह हकीकत नहीं थी! और हकीकत थी तो उसे पता क्यों नहीं चला, क्या इतनी गहरी नींद सोई थी या फिर जाहिर नहीं होने दे रही...?

रहस्य बहुत गहरा था। यह तो वही हुआ कि राजकुमार बीमार पड़ गया और सारे हकीम हार गए। अब राजा के प्राण घट में आ गए कि पता नहीं कल क्या होगा? अगर इसे कुछ हो गया तो इस राज्य का वारिस कौन होगा? यह इतना बड़ा साम्राज्य मैं किसे दूंगा! इसी चिंता में उसे रात भर नींद नहीं आई। और भोर की बेला में आई तो इतनी गहरी आई कि उसने बड़ा जीवंत सपना देखा कि उसके एक दर्जन बेटे हैं और एक दर्जन ही साम्राज्य। लेकिन सभी एक साथ मर गए हैं और वह सिर पटक रहा है।

तभी रानी ने जगाया कि- क्या हुआ, बेटा मरणासन्न और तुम अब तक सोये हो!' तब भी होश में नहीं आया। उसे वह सपना सच्चा मालूम हो रहा था। रानी ने कहा कि- बेटे को तो एक बार देख लो, जिस पर प्राण देते थे!' तो उसने कहा कि- इस एक बेटे को देखूं, इस पर शोक करूं या उन बारह बेटों पर जो अभी-अभी मर चुके हैं!'

रानी को कुछ समझ में नहीं आया कि इन्हें क्या हो गया है!

और मुझे लग रहा है कि ठीक ऐसा ही मेरे साथ भी हो गया है। पता नहीं कि यह जो उसकी तटस्थता वाली प्रतिक्रिया है, जैसे उसे कुछ पता ही नहीं। अपनी टांग उठा कर मेरी कमर में डालना, मेरे द्वारा अपने उरोजों का पकड़ा जाना और फिर ऊपर आ जाना...! अगर उसको इसका भान नहीं है, तो फिर तो कोई बात नहीं। और अगर जाहिर नहीं होने दे रही तो फिर खतरा है। इज्जत दांव पर लगी समझो। क्यों न मैं अचानक गायब हो जाऊं उसकी जिंदगी से!

यही ठीक रहे शायद! आज ऐसा करता हूं कि किसी दूसरे डाकखाने पर चला जाता हूं। फिर जो होगा देखा जाएगा। फोन पर अगर शिकायत करेगी, और हो सकता है, भला-बुरा कहे, तो सुन लूंगा। फिर नंबर ब्लॉक कर दूंगा। इज्जत बचाने का मुझे लगता है, इसके अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है।

फिर सोचा कि शायद वह बहुत गहरी नींद में थी। जी भर सो लेने से ही सुबह इतनी स्वस्थ और तरोताजा मिली। निश्चित ही वह बहुत भोली है, उसे मेरी किसी हरकत का पता ही नहीं चला। और अगर ऐसा है तो मुझे उसका साथ छोड़ना नहीं चाहिए।

ऊहापोह में फंसा आखिर मैं डेढ़ बजे डाकखाने पहुंच ही गया। ठीक उसी वक्त लंच ब्रेक हुआ था। क्षमा ने मुस्कुरा कर कहा, आईए!' और मैं अंदर पहुंच दूसरी टेबल पर जाकर बैठ गया तो वह हाथ धोकर आई और टिफिन खोल लिया। उसमें आज आलू के परांठे, सॉस और बैगन का भरता था।

छककर कर खाने के बाद मैंने पानी पिया और उठकर बाहर निकल गया। फिर जब वह काउंटर पर पहुंच गई, बण्डल वहां ले जाकर रख दिया। उसने बारकोड दे दिए और मैंने सभी पैकेटों पर लगा दिए। तब वह बुकिंग करने लगी और मैं अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। लगभग पौन घंटे बाद उसने कहा, लीजिए' और मैंने उठकर रसीदें ले लीं तथा पेमेंट कर दिया।

जब वह अपने काम में लग गई तब मैं धीरे से उठकर उसके पास गया और कुछ देर खड़ा रहा। नजरें उठाईं और पूछा, क्या है' तो धीरे से बोला, कल मैं किसी दूसरे डाकखाने में चला जाऊंगा।' वह चौक गई, क्यों?' मैंने कहा, यहां तुम्हारे पास वर्कलोड है!'

'तो क्या हुआ!'

'हुआ कैसे नहीं, तुम वैसे ही बहुत परेशान हो, अब मैं तुम्हें और ज्यादा तंग नहीं करना चाहता!'

कमाल की बात करते हैं, आप!' वह जैसे तड़प कर रह गई। आंखें नम हो गईं।

फिर कुछ कहते न बना। मैं चुपचाप अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। मेरी हिम्मत न पड़ी कि उठ कर चला जाऊं, और कल नहीं आऊं! अपराधी सा सर लटकाए बैठा रहा। जब छह बज गए, वह उठी, मेरी तरफ देखा, कहा नहीं चलने के लिए आज! बाहर निकल स्कूटी उठाई...तो चुपचाप पास पहुंच गया और रुख मिला तो बैठ गया। पर राह भर कोई बात न हुई।

घर जाकर रोज की भांति वह बाथरूम में गई, वहां से लौटी तो मैं गया। लौट कर चुपचाप देखने की कोशिश कर रहा था कि वह अपने आंसू तो नहीं छुपा रही और मुझे नहीं लगा कि वह अपने आंसू छुपा रही है या उसके आंसू निकल भी रहे हैं! पर वह खामोश जरूर हो गई थी। चुपचाप खाना बना दिया और हम लोगों ने बैठकर खा भी लिया। अब हिम्मत नहीं हो रही थी यह पूछने की कि, मैं  चला जाऊं...?'

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