झोपड़ी की खाली ज़मीन देखने के बाद प्रणाली रुकी नहीं।
पाँव खुद ब खुद उस राह पर चल पड़े — जो शायद दिल को याद थी।
नदी।
वो जगह — जहाँ वो कितनी बार मिले थे। कभी झगड़ते हुए। कभी हँसते हुए। कभी बिना कुछ कहे — बस साथ बैठे हुए। यह जगह उनकी थी — बिना कहे, बिना तय किए।
पर आज —
यहाँ भी कोई नहीं था।
प्रणाली धीरे धीरे पेड़ों के पास गई। उँगलियों से छाल छुई — जैसे इन पेड़ों से पूछ रही हो — क्या तुमने उसे देखा?
पेड़ चुप रहे।
वो नदी के किनारे आकर बैठ गई। पानी बह रहा था — शांत, बेपरवाह। जैसे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यहाँ बैठकर कोई टूट रहा है।
आँखें भर आईं।
"वर्धान..." — आवाज़ काँपी।
नदी बहती रही।
हवा चलती रही।
जवाब नहीं आया।
प्रणाली ne आसमान की तरफ देखा। आँखों से आँसू बह रहे थे — रुक नहीं रहे थे।
"एक बार... बस एक बार बता दो कि तुम ठीक हो।"
आवाज़ टूट गई।
"मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस यह जानना है कि तुम कहीं हो... कि तुम ठीक हो।"
और वो रो पड़ी।
सच में रोई — जैसे बहुत दिनों से रोकना चाहती थी पर मौका नहीं मिला था।
दासियाँ दूर खड़ी थीं — किसी की हिम्मत नहीं हुई आगे आने की।
कुछ दर्द अकेले ही जीने पड़ते हैं।
तभी —
एक आवाज़ आई।
हल्की। परिचित। और उसमें वो पुरानी शरारत थी — जो सिर्फ एक ही इंसान की थी।
"अरे... फूल बेचने वाली।"
प्रणाली की साँस रुक गई।
हाथ रुक गए।
दिल रुक गया।
यह आवाज़।
धीरे से — जैसे यकीन न हो — उसने पलटकर देखा।
वर्धान।
वहीं खड़ा था — उसी पेड़ के पास। वही कद। वही आँखें। होंठों पर वही आधी मुस्कान।
प्रणाली एक पल बस देखती रही।
आँखें पोंछी — यकीन करने की कोशिश की।
पर वो था। सच में था।
और फिर —
वो भागी।
दासियाँ देखती रह गईं।
वो भागती गई — और जाकर उसके सीने से लिपट गई। कसकर। बेझिझक।
इतना देख दासिया पीछे चली गई।।।
वर्धान हिला नहीं।
एक पल — दो पल — तीन पल।
उसके हाथ हवा में रहे।
मन में एक आवाज़ थी — नहीं। यह गलत है। तुम्हें यह हक नहीं।
पर दिल —
दिल कुछ और कह रहा था।
वो प्रणाली को महसूस कर सकता था — उसकी काँपती साँसें, उसकी भीगी आँखें जो उसके कपड़ों में छुप गई थीं।
वो लड़की जो किसी के सामने नहीं रोती थी — वो उसके सामने टूट रही थी।
Vardhaan के हाथ धीरे धीरे नीचे आए।
झिझके।
रुके।
और फिर —
दीवार टूट गई।
उसने अपनी बाँहें उसके इर्द गिर्द लपेट लीं — धीरे से। जैसे डर रहा हो कि यह लम्हा टूट जाएगा।
आँखें बंद कर लीं।
उसने प्रणाली के इर्द गिर्द जैसे अपनी सारी दुनिया ही समेट ली, और उसको खो देने के डर से वर्धान के हाथ कांपे और उसने अपनी प्रणाली पर पकड़ थोड़ी और जकड़ी, जैसे कहना चाहता हो के तुम सिर्फ मेरी हो।।।।
"पता है..." — उसकी आवाज़ धीमी थी — भारी थी — "...मैं कितना डर गया था।"
और उसने प्रणाली को और कस लिया।
जैसे वो भी — इसी पल का इंतज़ार कर रहा था।
बहुत देर हो गई
नदी बह रही थी।
हवा चल रही थी।
पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं।
और दोनों —
बस वहीं थे।
साथ।
जैसे यही काफी था।
जैसे यही सब कुछ था।
कितनी देर बीत गई — पता नहीं।
नदी बहती रही। हवा चलती रही
और दोनों — वहीं रहे। साथ। चुपचाप
प्रणाली ने धीरे से अपना चेहरा ऊपर उठाया — वर्धान के सीने से अलग हुई। पर उसका दामन नहीं छोड़ा
उसने उसकी आँखों में देखा।
और जो कहना था — जो इतने दिनों से दिल में दबा था — वो होंठों पर आ गया।
"वर्धान..." (प्रणाली ने हक से उसका नाम पुकारा)
"हम्म।"
"मुझे तुमसे कुछ कहना है।"
वर्धान ने उसे देखा — शांत आँखों से। पर अंदर कुछ हिल रहा था।
प्रणाली की आँखें झुक गईं। गाल लाल हो गए। उँगलियाँ उसके कपड़ों का दामन थामे रहीं।
"मुझे... मुझे तुम्हारी याद आती थी।"
वर्धान चुप रहा। और उसे देखता रहा ,
"जब होश नहीं था — तब भी। जब नींद में थी — तब भी। हर पल... बस तुम थे।"
आवाज़ काँप रही थी — पर रुकी नहीं।
"मैं नहीं जानती यह क्या है। मैंने पहले कभी किसी के लिए ऐसा महसूस नहीं किया। पर..."
उसने ऊपर देखा — सीधे उसकी आँखों में।
"...पर तुम्हारे बिना साँस लेना मुश्किल लगता है वर्धान।"
"यह प्यार है — या कुछ और — मैं नहीं जानती। पर जो भी है... वो सिर्फ तुम्हारे लिए है।"
एक पल।
सिर्फ एक पल की ख़ामोशी।
और वर्धान की आँखें भर आईं।
वो मुस्कुराया — पहली बार इतनी सच्ची मुस्कान। जैसे सीने पर रखा पत्थर हट गया हो। जैसे सदियों की थकान एक पल में पिघल गई हो।
उसने प्रणाली का चेहरा अपनी हथेलियों में लिया — धीरे से।
"पागल हो तुम।" — आवाज़ भर आई थी।
"हाँ।" — प्रणाली ने कहा।
वर्धान की आँखों से एक आँसू बह निकला।
प्रणाली ने देखा — और हैरान रह गई।
"वर्धान...?"
पर उसने जवाब नहीं दिया।
बस देखता रहा — उसे। उन आँखों को। उस चेहरे को। जैसे याद कर रहा हो — हर नस, हर रेखा।
जैसे यह आखिरी बार हो। 😢
वर्धान प्रणाली के पास आया... दोनों ने एक दूसरे को देखा और फिर वर्धान ने उसका माथा चूम लिया, वर्धान की आंखों से आंसू बह निकले ।
वर्धान नम आंखों और एक दुनिया जीत लेने वाली मुस्कान के साथ ।