Ishq aur Ashq - 74 in Hindi Love Stories by Aradhana books and stories PDF | इश्क और अश्क - 74

Featured Books
Categories
Share

इश्क और अश्क - 74

प्रणाली की आँखें खुली थीं।
पर मन कहीं और था।
कमरे में धीरे धीरे सब आ गए थे — माँ, पिताजी, भाई परस — सबके चेहरों पर राहत थी, खुशी थी। जैसे कोई बड़ा तूफान टल गया हो।
पर प्रणाली के अंदर —
एक अलग ही तूफान था।
वर्धान।
बस यही एक नाम था जो उसके दिमाग में घूम रहा था। वो ठीक है? कहाँ है? क्या हुआ उसे?
तभी  अगरेन का स्वर सुनाई दिया —
"अब तो अविराज भी युद्ध से आ गया है... तो अब तुम दोनों के विवाह की तैयारी शुरू कर सकते हैं।"


प्रणाली ने सुना — पर जैसे सुना नहीं।
परस ने धीरे से कहा — "पिताजी, अभी इन्हें कुछ दिन आराम करने दीजिए। अभी तो ठीक हुई हैं।"


मालविका ने सिर हिलाया — "मैं भी इस बात से सहमत हूँ। हमारा सबसे बड़ा संकट टल चुका है।"


पारस ने एक लंबी साँस ली — "हाँ... अब गरुड़ों के हमले का भी डर नहीं। कुछ वक्त बाद यह बची हुई दुश्मनी भी खत्म करने की कोशिश करूँगा।"


सब बातें हो रही थीं।
सब खुश थे।

और प्रणाली —
बस सुन रही थी। चुपचाप। क्योंकि उसका मन यहाँ था ही नहीं।
वर्धान ठीक है न?
तभी अग्रेद हँसे — "तुम अभी भी यही सोचते हो कि तुम्हें किसी गरुड़ ने बचाया है!"


परस ने धीमे से कहा — "हाँ पिताजी... उसकी बात मेरे दिमाग से नहीं निकल रही।"

और उसकी आँखें कहीं खो गईं — उस रात में — जब एक गरुड़ ने उसे थाम लिया था।
प्रणाली और नहीं बैठ सकी।
"पिताजी — हमें अभी वन भ्रमण के लिए जाना है।"
मालविका चौंकीं — "अभी? तुम कमज़ोर हो बेटा। कुछ दिन आराम करो फिर—"
"जाने दीजिए माँ इन्हें।"
परस की आवाज़ शांत थी — पर उसमें कुछ था। जैसे वो समझता था।
मालविका रुक गईं।
और प्रणाली —
एक पल भी नहीं रुकी।
जंगल में दासियाँ पीछे थीं — पर प्रणाली आगे थी।
तेज़ कदम। भारी साँसें। आँखें रास्ता ढूँढती हुईं।
यहीं कहीं थी वो झोपड़ी।

यहीं आखिरी बार देखा था उसे।
और फिर वो रुकी।
साँस रुकी।
वो जगह — वही जगह — सामने थी।
पर —
न झोपड़ी थी।
न बाबा।
न वर्धान।
बस ज़मीन थी। खाली। वीरान। जैसे कभी कुछ था ही नहीं यहाँ।
प्रणाली वहीं खड़ी रही।
हवा चली — उसके बालों को छूती हुई — जैसे कोई अलविदा कह रहा हो।
आँखें भर आईं।
होंठ काँपे।
"वर्धान..."
बस इतना निकला। एक टूटी हुई फुसफुसाहट में।
और फिर —
ख़ामोशी।
कुछ दर्द आवाज़ नहीं माँगते।
वो बस — महसूस होते हैं। 😢
— उधर — गरुड़ लोक —
पूरे गरुड़ लोक में खबर फैल चुकी थी।
वर्धान ने प्रणाली को प्रेम जाल में फँसाकर उसकी शक्तियाँ त्यागने पर मजबूर कर दिया।
जश्न था। गर्व था। हर तरफ वर्धान का नाम था।
पर वर्धान के कमरे में —
सन्नाटा था।
वो तैयार हो रहा था। शांत चेहरे से। आईने में खुद को देख रहा था। पर आँखें — आँखें खाली थीं।
जैसे अंदर से कुछ टूट चुका हो — और उसे जोड़ने की कोशिश करना बेकार हो।
तभी दरवाज़ा खुला।
गरुड़ शोभित अंदर आए। चेहरे पर गर्व था — एक राजा का गर्व।
"तुमने जो गरुड़ लोक के लिए किया है — वो एक अच्छे राजा की पहचान है।"
वर्धान ने आईने से नज़रें हटाए बिना कहा —
"जी पिताजी। मैंने कहा था न — कि मैं उसे शक्तियाँ त्यागने पर मजबूर कर दूँगा।"
शोभित ने एक पल रुककर कहा — "मैं आशा करता हूँ कि शक्तियों के बिना वो जीवित बच जाए... क्योंकि शक्तियाँ त्यागते ही वो उस घोर निद्रा में चली गई — यह उसकी कमज़ोरी का प्रमाण है।"
वर्धान की मुट्ठी भिंची।
पर आवाज़ में — कोई बदलाव नहीं।
"शक्तियाँ त्यागते ही वो उस निद्रा में चली गई थीं... आपने तो खुद दूतों को भेजकर जाँच की थी।"
"हाँ।" — शोभित ने सिर हिलाया। फिर सीधे आँखों में देखकर बोले — "तुम अब यह बताओ — विवाह कब करोगे? सायूरी तुम्हारे इंतज़ार में बैठी है।"
वर्धान ने आईना छोड़ा।
खिड़की की तरफ मुड़ा।
"पिताजी... बस एक काम और बाकी है। उसके बाद — आप जो कहेंगे, मैं करूँगा।"
शोभित ने उसे देखा — एक लंबी नज़र से।
"ठीक है।"
और चले गए।
कमरे में अब सिर्फ वर्धान था।
उसने खिड़की खोली। बाहर गरुड़ लोक की विशाल वादियाँ थीं — सुनहरी। भव्य। उसका राज्य।
पर उसकी नज़र कहीं और थी।
"एक बार तुम्हें होश आ जाए..." — वो धीरे से बोला — जैसे हवा उसकी बात उस तक पहुँचा देगी — "एक बार तुम्हें सही सलामत देख लूँ... उसके बाद मैं तुमसे बहुत दूर चला जाऊँगा।"
"बहुत दूर।"
होंठ काँप रहे थे — पर आँखें पत्थर थीं।
तभी —
खिड़की पर एक पक्षी दूत आया।
वर्धान ने उसकी बात सुनी —
प्रणाली को होश आ गया है। वो बिल्कुल ठीक है।
एक पल।
सिर्फ एक पल की ख़ामोशी।
और फिर —
वर्धान झूम उठा।
पहली बार — सच में — दिल से मुस्कुराया।
"मैं जानता था..." — उसकी आवाज़ भर आई — "मैं जानता था तुम बहुत बहादुर हो!"
आँखें नम थीं।
पर मुस्कान — वो मुस्कान कहीं नहीं गई।