सब लोग अगस्त्य को उसके घर ले आए। अर्जुन ने रास्ते में ही डॉक्टरों की पूरी टीम और सारी मशीनें मंगवा ली थीं — क्योंकि अगस्त्य मान का अस्पताल जाना मुमकिन नहीं था। दुश्मन की नज़रें हर जगह थीं।
अगस्त्य को बेड पर लिटाया गया। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, होंठ सूखे थे — फिर भी उसने आँखें खोलने की कोशिश की।
उसके होंठ हिले...
"का... कानि... रा... रात्रि..."
बस इतना — और वो बेहोश हो गया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेशन की तैयारी शुरू की।
काफी देर बाद डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिख रही थीं।
"गोली बहुत पास से लगी है — शायद गन में साइलेंसर था। काफी नसें damage हुई हैं... अभी कुछ नहीं कह सकते।"
अर्जुन की आँखें भर आईं।
"भाई..." — बस यही निकला उसके मुँह से।
A.V. ने उसका कंधा थामा — "अर्जुन... खुद को संभालो।"
पर अर्जुन नहीं संभल सका। नम आँखों से बोला —
"वो सिर्फ मेरे भाई नहीं हैं A.V.... उन्होंने मुझे एक बाप की तरह पाला है।"
और वो A.V. से लिपट गया।
कमरे में सिर्फ सिसकियों की आवाज़ थी।
उसी पल —
दूसरी तरफ — गरुड़ पुष्प ने असर दिखाया।
हॉस्पिटल के एक कमरे में वो मशीन जो दिल की धड़कन दिखाती थी — अचानक बंद हो गई।
और उसी पल —
रात्रि की आँखें एक चीख के साथ खुलीं —
"वर्धाааааन...!"
उसने घबराकर चारों तरफ देखा।
सिर्फ माँ थी। कमरे में और कोई नहीं।
"वर्धान... माँ वर्धान कहाँ है...?"
मेघा हैरान — "वर्धान? वर्धान कौन बेटा...?"
"माँ please... वर्धान कहाँ है...!" — रात्रि की आवाज़ में घबराहट थी, आँखों में आँसू।
मेघा ने बताया कि A.V. और अर्जुन के घर गए हैं — पर रात्रि ने कुछ नहीं सुना।
उसने एक झटके में सारी machines निकालीं।
मेघा चिल्लाई — "रात्रि रुको! अभी अभी coma से निकली हो!"
पर रात्रि रुकी नहीं।
जैसे उसके अंदर कोई और आत्मा जाग गई हो — उसने अपनी car निकाली और ऐसे चलाने लगी जैसे यह रास्ता उसे सदियों से पता हो।
तेज़। बेखौफ। बिना रुके।
बिल्कुल अगस्त्य की तरह।
गाड़ी सीधे अगस्त्य के घर के सामने रुकी।
रात्रि उतरी — साँसें तेज़, आँखें नम, पर क़दम मज़बूत।
होंठों पर बस एक ही बात थी —
"मैं आ गई... वर्धान।"
अंदर घुसते ही उसने देखा — चारों तरफ हॉस्पिटल स्टाफ। मशीनें। दौड़ते लोग।
वो भागी।
कमरे का दरवाज़ा खुला —
"150 joules... Charge!!!!"
धड़ाम।
रात्रि की साँसें रुक गईं।
और उसकी चीख पूरे घर में गूँज गई —
"वर्धाааааааааааान...!!!!"
डिफिब्रिलेटर की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।
"चार्जिंग... 200 जूल्स!"
"क्लियर!!"
एक झटका।
फिर ख़ामोशी।
डॉक्टर ने नब्ज़ देखी... फिर दोबारा... फिर एक बार और।
कमरे में खड़ी हर आँख उस एक मशीन को देख रही थी — जो अब बिल्कुल सीधी लकीर दिखा रही थी।
डॉक्टर ने धीरे से अपना स्टेथोस्कोप उतारा। equipment रखा। और मुड़ा।
"मृत्यु का समय..." — उसकी आवाज़ भारी थी — "11 फरवरी, शाम 4 बजकर 33 मिनट।"
"हमें खेद है।"
उस एक पल में जैसे पूरी दुनिया रुक गई।
अर्जुन के घुटने कमज़ोर पड़े — और वो ज़मीन पर गिर गया। न रोना आया, न आवाज़ निकली। बस एक ख़ामोशी थी जो अंदर तक काट रही थी।
"भाई..." — सिर्फ इतना। एक टूटी हुई साँस में।
और बाहर —
रात्रि वहीं बेहोश हो गई। कोई संभालने भी नहीं पाया — वो गिरती गई, जैसे उसके अंदर की कोई धड़कन खुद बंद हो गई हो। 💔
इधर प्रणाली ने धीरे धीरे अपनी आँखें खोली।
उस राज्य में आज सन्नाटा था।
दासियाँ आगे पीछे घूम रही थीं। राज्य वैद्य अपनी दवा लेकर खड़े थे। और उस पलंग पर — प्रणाली 15 दिनों बाद अपनी आँखें खोल रही थी।
उसने अपने चारों तरफ देखा — अनजाना सा लगता था सब कुछ। जैसे एक लंबी नींद के बाद दुनिया बदल गई हो।
"मैं... कितने दिनों से इस हालत में हूँ?" — उसकी आवाज़ कमज़ोर थी।
दासी ने हाथ जोड़े — "पिछले 15 दिनों से, राजकुमारी।"
प्रणाली की आँखें एक पल के लिए रुक गईं।
15 दिन...
"वर्धान..." — नाम होंठों पर आया और वो उठने लगी।
तभी — मालविका आ गईं। उसकी माँ। आँखें भरी हुईं, चेहरे पर एक अनजानी राहत थी।
"आप कहीं नहीं जा रहीं, राजकुमारी!"
"माँ... क्या हुआ इतने दिनों में? ये सब —"
मालविका ने बात काटी — धीरे से, पर मज़बूती से।
उन्होंने प्रणाली को सब बताया। कैसे उसके पिता उसका विवाह 20 साल से पहले करना चाहते थे — ताकि वो दूसरे कुल की हो जाए। ताकि परी न बने। ताकि वो शक्ति उनसे दूर रहे।
"अब कोई चिंता नहीं है बेटा..." — मालविका की आवाज़ में एक अनजाना सुकून था — "तुम्हारा 20वाँ जन्मदिन भी जा चुका है... और तुम परी भी नहीं बनीं।"
प्रणाली के होंठ खुले — "क्या...?"
और फिर —
एक flash।
आँखों के सामने एक तस्वीर आई —
वो खुद — पर अलग। पीठ पर परियों के पर। आँखों में एक तेज़ रोशनी। और हाथ में — वर्धान।
वो उसे लेकर उड़ रही थी। तेज़। बेखौफ। उसकी जान बचाने के लिए।
अपनी सारी शक्ति... अपनी पूरी हस्ती... उस एक इंसान के लिए लगा दी थी उसने।
प्रणाली की आँखें भर आईं।
पर होंठों पर कोई लफ्ज़ नहीं आया।
कुछ बातें कहने के लिए नहीं होतीं।
कुछ दर्द सिर्फ अंदर ही अंदर जीते हैं। 😢