Ishq aur Ashq - 71 in Hindi Love Stories by Aradhana books and stories PDF | इश्क और अश्क - 71

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इश्क और अश्क - 71

🌌 दृश्य: सय्युरी का घर
(सय्युरी का घर – अगस्त्य बेचैन खड़ा है। तभी उसका फोन बजता है।)


A.V. (फोन पर, घबराहट भरी आवाज़ में):
“Agastya… Ratri की condition बहुत critical है। Doctors कह रहे हैं कि अगर जल्द कुछ नहीं किया गया, तो वो coma में जा सकती है।”
(अगस्त्य की आँखें एक पल के लिए बंद हो जाती हैं। उसकी साँसें तेज हो जाती हैं।)
Agastya (धीमी पर दृढ़ आवाज़ में):
“Main use kuch nahi hone dunga.”
(फोन काटने के बाद, अगस्त्य सय्युरी की तरफ मुड़ता है।)
Agastya:
“Sayyuri, mujhe Garud Lok jana hoga… aur tum mere saath chalogi.”
Sayyuri (गंभीर नज़र से देखते हुए):
“Tum bhool rahe ho, Agastya… main ek shapit Garud hu. Garud Lok ka dwar mere liye aasaan nahi hai.”
Agastya (आँखों में दृढ़ निश्चय के साथ):
“Meri shaktiyaan tumhare shraap se badi hain. Agar Ratri ko bachane ke liye mujhe apni har seema todni pade, to main woh bhi karunga.”
Sayyuri (हल्का सा हैरान होकर):
“Tum jaante ho iski keemat kya hogi?”


Agastya:
“Keemat chahe jo bhi ho… main chukane ke liye tayyar hoon.”


🌌 दृश्य: Garud Lok की यात्रा

(अगस्त्य अपनी आँखें बंद करता है। उसके आस-पास तेज हवा चलने लगती है, और एक दिव्य प्रकाश उभरने लगता है।)
Sayyuri (चिंतित स्वर में):
“Agastya, shraap todne ki koshish tumhe bhaari pad sakti hai…”
Agastya (आँखें बंद किए हुए):
“Ratri ki zindagi se badhkar mere liye kuch bhi nahi.”
(उसकी गर्दन पर एक जली हुई छाप उभर आती है। दर्द से उसका चेहरा कस जाता है, लेकिन वह रुकता नहीं।)
Sayyuri:
“Yeh… yeh shraap ki keemat hai!”
Agastya (दर्द के बावजूद):
“Yeh to bas shuruaat hai…”
🌌 दृश्य: Garud Lok


(प्रकाश शांत होता है। दोनों Garud Lok में खड़े होते हैं। अगस्त्य आस-पास देखता है और स्तब्ध रह जाता है।)


Agastya (हैरानी और दर्द के साथ):
“Yeh… yeh kaise ho sakta hai? Mera Garud Lok… is haal me?”


(स्वर्ग जैसा स्वर्ण महल अब खंडहर बन चुका है। पूरा राज्य पत्थर में बदल गया है।.. जो व्यक्ति जहां खड़ा था वही पत्थर हो गया , सब बंजर हो गया,, अगस्त्य आगे बढ़ता रहा और अपनी आंखों से अपने राज्य का विनाश देखता रहा, 

एक एक कदम के साथ वो मन में किसी बोझ तले दबता जा रहा है।


Agastya (बेचैनी से):
“Sayyuri, yeh sab kya hua? Kaun zimmedar hai is vinash ka?”


Sayyuri (उदासी भरी आवाज़ में):
“Jis din se Vardhan ne Garud Lok tyag diya… us din se yeh rajya aise hi thamm gaya. Samay ne yahan chalna band kar diya. पशु, पक्षी, इंसान ,पेड़ फूल सब पत्थर हो गए।

Agastya (गहरी साँस लेते हुए):
“Kanishk… Kanishk kahan hai?”
उसे तो राजा बनने का बहुत शौक था, ये हाल किया उसने मेरे घर का ।


Sayyuri (सिर झुकाते हुए):
“Mujhe nahi pata, Agastya… uska kuch bhi pata nahi hai.”
(वह आगे कहती है:)
“Wo iss lok ka Raja kabhi ban hi nahi paya, kyuki Garud Lok ke Raja banne ki chabhi kabhi uske haath aayi hi nahi…
Wo chabhi thi Pranali.”


(अगस्त्य की आँखों में एक गहरी समझ उभर आती है। अतीत की सारी कड़ियाँ जुड़ने लगती हैं।)

Agastya (धीरे से, खुद से):
“Ab sab samajh aa raha hai… yeh sab meri wajah se hua hai.”
(अगस्त्य गहरी सोच में डूब जाता है…)
Agastya (मन ही मन):
“Agar uss waqt Kanishk Garud Lok ka Raja nahi ban paya, to… matlab wo Pranali ke punarjanam ka intezar kar raha hoga…”


अब वो सारी कहानी समझ गया, प्रणाली, ये मूवी, मेरा भाई..... 

अगस्त्य समझ गया कि ये सब कनिष्क का किया हुआ है…
मतलब वह आज तक रात्रि पर नज़र रख रहा था,


जानबूझकर मेरी ज़िंदगी में रात्रि को लाया, ताकि पहले जैसी स्थिति बन सके और उसे गरुड़ लोक का प्रवेश मिल जाए।
अगस्त्य की आँखों में गुस्सा और पीड़ा एक साथ उमड़ पड़े। उसकी मुट्ठियाँ कस गईं।


अगस्त्य (धीमी लेकिन तीखी आवाज़ में):
“कितनी गहरी चाल चली है तुमने, कनिष्क… रात्रि को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया… सिर्फ़ गरुड़ लोक तक पहुँचने के लिए।”
सय्युरी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे उसके विचारों से बाहर निकाला।


सय्युरी:
“अगस्त्य… हमें गरुड़ पुष्प को देखना चाहिए। शायद अब भी कोई उम्मीद बाकी हो।”
दोनों तेज़ क़दमों से उस तालाब की ओर बढ़े।
लेकिन वहाँ पहुँचते ही उनके क़दम ठिठक गए।



तालाब भी पत्थर बन चुका था। उसके मध्य एक गरुड़ पुष्प खिला तो था, पर वह भी पत्थर बनकर निर्जीव खड़ा था।
सय्युरी की आँखों में निराशा छा गई।


सय्युरी (टूटी हुई आवाज़ में):
“तुम्हारी आख़िरी उम्मीद भी खत्म…”
अगस्त्य ने गहरी साँस ली। उसकी नज़र उस पत्थर बने पुष्प पर टिक गई। आँखों में अटूट विश्वास चमक उठा।
अगस्त्य (दृढ़ निश्चय के साथ):
“नहीं… ये पुष्प खिलेगा। अगर इसे पता हो कि ये रात्रि के लिए चाहिए, तो ये ज़रूर खिलेगा। रात्रि की value गरुड़ लोक से ज़्यादा कोई नहीं जानता।”
वह धीरे-धीरे पुष्प के पास गया। उसने अपना काँपता हुआ हाथ उस पर रखा। पल भर के लिए चारों ओर गहरा सन्नाटा छा गया।
उसकी आँखें नम हो गईं… और उसने एक नाम पुकारा—
अगस्त्य (फुसफुसाती आवाज़ में):
“प्रणाली…”
जैसे ही यह नाम गूँजा, एक चमत्कार घटित हुआ।
पत्थर बना हुआ पूरा तालाब धीरे-धीरे फिर से पानी में परिवर्तित होने लगा। सतह पर दरारें पड़ीं और जीवन की लहरें वापस लौट आईं।
साथ ही, गरुड़ पुष्प की पत्थर बनी पंखुड़ियाँ हिलने लगीं और धीरे-धीरे खिल गईं। एक दिव्य प्रकाश ने पूरे वातावरण को आलोकित कर दिया।
सय्युरी आश्चर्य से यह सब देखती रह गई।
सय्युरी (साँसें थामकर):
“यह… यह कैसे संभव है?”
अगस्त्य के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान उभर आई—उम्मीद की मुस्कान।
उसने सावधानी से गरुड़ पुष्प को अपने हाथों में उठा लिया।
लेकिन जैसे ही उसने उसे थामा, उसके हाथ पर हल्की सी खुजली (itching) होने लगी।
अगस्त्य ने एक पल के लिए उस एहसास को महसूस किया, पर रात्रि को बचाने की जल्दबाज़ी में उसने सब कुछ अनदेखा कर दिया।
अगस्त्य (दृढ़ आवाज़ में):
“रात्रि का इंतज़ार अब खत्म होगा।”
गरुड़ पुष्प को अपने सीने से लगाकर, अगस्त्य सय्युरी के साथ धरती पर वापस लौट आया—
अपने प्रेम को बचाने और नियति को बदलने के लिए।