Shrapit ek Prem Kahaani - 64 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 64

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 64

वर्षाली झट से वहां से उठ जाती है और कमरे के बाहर जाने लगती है। वर्शाली को यूं अचानक जाते दैखकर एकांश वर्षाली को रौककर कहता है--

> कहां जा रही हो वर्शाली ? 

वर्शाली हल्की मुस्कान के साथ कहती है। 

> आपको भुख लगी होगी ना एकांश जी । इसिलिए मैं आपके लिए भोजन लाने जी रही हूँ । 

एकांश उत्सुकता से पूछता है। 

> परी लोक का भोजन ?

 एकांश की बात सुनकर वर्शाली हंसते हुए कहती है। 

> हा हा हा ! हां एकांश जी परी लोक का ही भोजन लाउंगी । 

वर्शाली से इतना सुनने के बाद एकांश मन ही मन खुश होते हुए सौच रहा था के । जब परी लोक का पानी इतना मिठा है तो वहां का भोजन तो और भी स्वादिष्ट होगा इतना सौचकर एकांश झट से उठता है और बाहर जाकर झरने के पानी से अपना मुह धोने लगता है एकांश अपना मुह धौ ही रहा था के तभी वर्शाली वहां पर खाना लेकर आ जाती है।

 उधर त्रिजला और मातंक को मणी ना मिलने से त्रिजला अपने काबु से बाहर आने लगती है। और मातंक से कहती है।

> स्वामी हम कब तक ऐसे उस मणी को ढुंढते रहेगें । अगर हम चाहे तो उस मणी को अपनी शक्ती से ढुंढ सकते है। हम व्यर्थ ही इन मानवो से ऐसे पुछताछ कर रहे है । क्यों ना हम आपके मित्र कुम्भन को भी उस बंधन से मुक्त करा करके सभी मानव को पकड़ कर उनसे पूछते हैं। अगर हम ऐसे ही ढुंढते रहे तो हम उस मणी को कभी नही प्राप्त कर सकते । परंतु अगर हम इन मानवो पर अपना बल का प्रयोग करेगें इन्हें डरायेगें तो हम सिघ्र ही उस मणी को प्राप्त कर लेगें । हमारे लिए तो ये कार्य बहुत ही सरल है ।

 मातंक त्रिजला की बात को सिर्फ सुन रहा था और कुछ जवाब नही देता है। जिससे त्रिजला नाराज होकर मांतक से पुछती है ।

> मैं कबसे आपको बोले जा रही हूँ और आप बिना कुछ उत्तर दिये सिर्फ चुप चाप सुन रहे हैं ।

 त्रिजला की बात पर मातंक कहता है। 

> क्या उत्तर दूँ मैं तुम्हे। तुम्हारी मूर्खता भरी बातों का 
क्या उत्तर दूँ मैं तुम्हें। 

मांतक त्रिजला को समझाते हुए कहता है। 

> मैंने तुम्हें बहुत बार समझाया के ये हमारा लौक नही 
है। और ना ही पृथ्वी पर हमारा आधिपत्य है जो हम इन निर्दोष मानवो पर अत्याचार करेगें। अगर तुम भुल गयी हो तो मैं आज तुम्हें पुनः इस बात का स्मरण करा दूँ के हम सब देत्यो ने एक संधी किया था के हम इस पृथ्वी लोक पर कभी नही आयेगें और अगर आयेगें भी तो कभी भी इन मानवो पर अत्याचार नही करेगें और ना ही इस पृथ्वी पर अपना आधिपत्य जमायेगें। एक तो हमने यहां पर आकर अपना वचन तौड़ा और तुम कह रही हो की हम कुम्भन को भी साथ मे लाकर इन मानवो पर अत्याचार करें । सुदंरवन मे जो बंधन है उसे कोई भी तौड़ कर कुम्भन को बाहर नही ला सकता हम भी नही। वो हमे स्वयं ब्रह्मा जी ने वरदान दिया था के कोई भी बंधन हमे बाधं नही सकता हम प्रत्येक बंधन से मुक्त हैं परंतु हम किसी और को किसी बंधन से मुक्त नही करा सकते। मैने इससे पूर्व भी तुमसे कहा था के यहां पर ऐसी कोई भी गलती ना करना जिससे हमारा वचन भंग हो । ये बात हमेशा स्मरण रहे । 

मातंक का बात सुनकर त्रिजला हां मे सर हीलाती है। मातंक कहता है। 

> अब सिघ्र चलो हमे उस मणी को ढुंढना है। 

त्रिजला चिड़कर कहती है। 

> परंतु कहां स्वामी.... हम उस मणी को इस तरह से कहां और कैसे ढुंढे ?

 मांतक त्रिजला की बात पर सौच मे पड़ जाता है। कुछ दैर तक सौचने के बाद मांतक कहता है।

> त्रिजला हो ना हो हमे उस मणी का पता उसी मानव के पास से मिल सकता है जिसके घर के उपर बैठकर हमने उस दिन उन सब की बाते सुन रहा था । 

त्रिजला मांतक से कहती है। 

> स्वामी जैसी आपकी इच्छा । परंतु स्वामी अगर इससे भी कुछ हल नी निकले तो ? और फिर हमारे पास कुछ ही समय शेष बचे है अगर समय रहते हम पुत्री कुम्भनी को जिवित ना कर पाए तो कुंम्भनी को हम सदा के लिए खो देगें । और फिर आपका वचन क्या जो आपने अपने मित्र कुम्भन को दिया है। के आप कुंम्भनी को किसी भी हाल मे जिवन देकर ही रहेगें। इसिलिए स्वामी मैं आपसे कह रही थी के इन मानवो से हमे इस तरह तो कुछ भी प्राप्त नही होगा। हमे अपनी शक्ती का प्रयोग करना ही होगा। 

मांतक त्रिजला की बात सुनकर सौच मे पड़ जाता है , 

" के मैने तो अपने परम मित्र कुंम्भन को वचन दिया है 
के मैं कुंम्भनी को किसी भी हालत मे जिवित करके ही रहूगां। 

मातंक को सौच मे दैखकर त्रिजला मांतक से कहती है़ । 

> क्या हुआ स्वामी आप किस सौच मे पड़ गए । 

त्रिजला बात का जवाब देते हुए मांतक कहता है। 

> मैं यही सौच रहा था प्रिये के मैंने तो अपने परम मित्र कुंम्भन को वचन दिया है। परतुं त्रिजला मैं इन मानवो पर अत्याचार भी नही कर सकता। ,और फिर तुम्हारा कहना भी सत्य है के हम ऐसे इस तरह से उस मणी तक नही पँहुच पाएगे,। उसके लिए हमे कुछ और सौचनी पड़ेगी जिससे मानव को कोई हानी ना हो और हमे मणी भी मिल जाए । 

मांतक की बात पर त्रिजला झट से कहती है। 

> हामजात देत्य ! 

हामजात देत्य का नाम सुनते ही मांतक हैरानी से त्रिजला की और देखता है। 

त्रिजला अपनी बात को आगे जीरी रखते हूए कहती है। 

> हां स्वामी हमे हामजात से सहायता मांगनी होगी। 

त्रिजली की बात पर मांतक कहता है --

> परतुं प्रिये हामजात को यहां बुलाने से क्या लाभ वो तो केवल मार्ग बताएगा तो उससे हमे क्या लाभ होगा और मार्ग तो हमे ज्ञात है। 

त्रिजला कहती है।

> स्वामी वो जो मार्ग बताएगा हो सकता है हमे कुछ सरल मार्ग और मिल जाए । 

त्रिजला की बात पर मांतक हामी भरते हूए कहता है। 

> उचित है ! जैसी तुम्हारी ईच्छा परतुं अभी नही । पहले हम कुछ प्रयास और करके दैखेगें उसके बाद हम हामजात को बुलाएगें। 

त्रिजला भी मांतक की बात पर राजी हो जाती है और फिर दौनो पक्षी का भेष लेकर वहां से उड़कर चला जाता है। 

इधर वर्शाली एकांश के लिए भोजन लेकर आती है और वही पथ्थर पर बैठ जाती है। भोजन की खुशबु से एकांश के मुह पर पानी आने लगता है एकांश जल्दी से अपना मुह अपने ही सर्ट से सुखाने की कोशीश करता है पर ठीक से सुखा नही पा रहा था। 

इतने मे वर्शाली वहां से उठता है और एकांश को एक पथ्थर पर बैठा कर अपने दुप्पटे से एकांश का मुह सुखाने लगती है और कहती है। 

> क्या एकांश जी आप को अपना मुह भी सुखानी नही आती है। 

एकांश कुछ नही बोलता है बस वर्शाली को दैखते जा रहा था। वर्शाली एकांश को भोजन की थाली दे देती है। एकांश भोजन का एक निवाला अपने मुह मे लेता है और अपनी आखे बंद करके कहता है।

> आहह ! वाह वर्शाली ये तो अमृत है। क्या खाना बनायी हो वर्शाली इस तरह का खाना मैने आज से पहले कभी नही खाया। 

एकांश की बात सुनकर वर्शाली हल्की मुस्कान के साथ कहती है। 

> अच्छा ! आपको इतना पंसद आया एकांश जी। 

एकांश कहता है --

> पंसद की क्या बात करती हो वर्शाली ये अमृत है।

 इतना बोलकर एकांश एक निवाला वर्शाली की और बड़ा देता है। जिसे दैखकर वर्शाली कहती है ।

> ये क्या एकांश जी ये भोजन तो मैने आपके लायी थी। 

एकांश कहता है। 

> हां तो क्या मै खा तो रहा हू ना । तुम भी तो कल से कुछ नही खायी हो इसिलिए चुपचाप खायो। 

एकांश के इतना कहते ही वर्शाली एकांश के हाथ से खाने लगती है। और एकांश को अपने हाथ से खिलाने लगती है। दौनो ही एक दुसरे को खिलाने लगती है। 

खाना खत्म होने के बाद एकींश देखता है के वर्शाली ते होंठ पर थोड़ी सी भोजन लगा था। जिसे एकांश अपनी ऊंगली से वर्शाली के होंठ पर लगी खाना को हटा देता है। जिससे वर्शाली सरमा जाती है और अपनी नजरे को झुका लेती है।

 वर्शाली सरम से लाल हो जाती है। तभी अचानक वर्शाली वहां से उठती है और कहती है नही ये कैसे हो सकता है। मैं ये भूल कैसे गयी। एकांश वर्शाली को ऐसे अचानक उठकर बड़बड़ाते दैख कर पूछता है। 

> क्या हुआ वर्शाली ? 

वर्शाली एकांश की बात का बिना कुछ जवाब दिये वहां से महल की और जाने लगताी है। एकांश भी वर्शाली के पिछे पिछे महल के अंदर चला जाता है। जहां पर एकांश दैखता है के वर्शाली हर्शाली के पास जाकर बैठी है । 

एकांश वर्शाली के पास जाकर वर्शाली से पूछता है। 

> क्या बात है वर्शाली तुम यूं अचानक वहां से उठ कर क्यो चली आयी ? 

वर्शाली कहती है । 

> ये दैख रहे हो एकांश जी।

 वर्शाली अपनी और हर्शाली के हाथ मे एक ही जैसी पहनी दोनो बालियों को दिखाती है जो एक जैसा ही चमक रहा था को दिखाकर कहती है।


> जब ये चमकती है तो इसका मतलब ये होता है के हम मे से किसी एक की जान खतरे मे है । ये बाली मुझे और मेरी बहन हर्षाली को बाबा ने दिया था । ताकी जब भी हम दोनो मे से कोई खतरे मे हो तो हमे पता चल सके और हम सिघ्र उसकी मदद को पहूंच सके। 

 वर्शाली रोते हूए कहती है। 

> परंतु एकांश जी मुझे ऐसा प्रतीत होता है एकांश जी 
के मैं अपनी बहन को अब कभी जिवित नही कर पाऊंगी। 

वर्शाली की बात पर एकांश हैरानी से पूछता है। 

> जिवित नही कर पाओगी का क्या मतलब वर्शाली ? इन्हें हुआ क्या है ?

To be continue....1029