“आख़िरी ड्यूटी”: रेलवे हॉस्पिटल की आत्मा
रात के साढ़े बारह बज रहे थे। �
शहर के पुराने रेलवे हॉस्पिटल की इमारत दूर से ही अजीब-सी लगती थी—ऊँची, पीली पड़ी दीवारें, कई जगह से उखड़ा हुआ प्लास्टर, और बीच-बीच में टिमटिमाती ट्यूब लाइटें, जो जैसे हर पल बुझने की धमकी दे रही हों। �
चारों तरफ़ सन्नाटा था, बस कभी-कभी किसी दूर जाती मालगाड़ी की सीटी रात की ख़ामोशी को चीरती हुई सुनाई दे जाती। �
हॉस्पिटल के गेट के पास खड़े गार्ड रमेश ने अपनी जैकेट को सीने तक खींचकर बंद किया।
ठंडी हवा अजीब तरह से चुभ रही थी, जबकि दिन में इतनी ठंड नहीं थी। �
रमेश की आज नई ड्यूटी लगी थी—रात की शिफ़्ट, 12 से सुबह 6 बजे तक, और सबसे ज़्यादा डरावनी बात ये थी कि उसकी पोस्टिंग हॉस्पिटल की पुरानी, लगभग बंद पड़ी वाली इमारत के सामने थी, जहाँ अब सिर्फ़ मॉर्चरी और रिकॉर्ड रूम ही बचा था। �
गार्ड रूम के पुराने रजिस्टर में किसी ने पेंसिल से हल्के हाथों में लिखा था—
“रात में अगर तीसरी मंज़िल पर लाइट जले… तो ऊपर मत जाना।” �
रमेश ने इसे मज़ाक समझकर मुस्कुरा दिया।
वह नई नौकरी पर था, भूत-प्रेत की बातों पर ज़्यादा यक़ीन नहीं करता था। �
अजीब गिनती
करीब एक बजे, रमेश ने राउंड लगाने का सोचा।
हाथ में टॉर्च, कमर पर सीटी, और जेब में मोबाइल। �
वह धीरे-धीरे पुराने बिल्डिंग की ओर बढ़ा। �
पुरानी बिल्डिंग के बाहर का बरामदा सीलन से भरा था। �
छत से पानी की बूंदें टपक-टपक कर फर्श पर छोटे-छोटे गढ्ढे बना रही थीं।
ऊपर की मंज़िलों की रेलिंग से जाले लटक रहे थे, जैसे किसी ने सालों से सफाई न की हो। �
रमेश ने टॉर्च की रोशनी ऊपर डाली।
पहली मंज़िल अंधेरे में डूबी थी, दूसरी भी। �
लेकिन तीसरी मंज़िल की एक खिड़की से हल्की पीली रोशनी छनकर बाहर आ रही थी—जैसे किसी कमरे की ट्यूब लाइट जली हो। �
उसने भौंहें चढ़ाईं।
सुबह ट्रेनिंग में सुपरवाइज़र ने साफ कहा था—पुरानी बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल बंद है, वहाँ कोई वार्ड नहीं चलता, सिर्फ़ पुराने रिकॉर्ड और टूटे बेड पड़े हैं; रात में वहाँ किसी का काम नहीं। �
रमेश ने सोचा,
“शायद कोई बिजली वाला भूल गया बंद करना… या कोई मरीज या स्टाफ ऊपर चला गया हो।”
वह वापस गार्ड रूम में आया और वॉकी-टॉकी उठाकर रिसेप्शन से पूछा,
“हैलो, यहाँ रमेश बोल रहा हूँ। पुरानी बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर लाइट जली है, कोई डॉक्टर ऊपर है क्या?”
उधर से नर्स की उनींदी आवाज़ आई,
“तीसरी मंज़िल तो सालों से बंद है, वहाँ कोई नहीं जाता रात में। आप नीचे से ही चेक कर लो, अगर ज़्यादा डाउट हो तो सुबह मैडम देख लेंगी।” �
रमेश कुछ पल चुप रहा।
वहाँ तक डर भी था और जिज्ञासा भी। �
खाली वार्ड में कोई है…?
आख़िर उसने तय किया कि ऊपर जाकर देखना ही पड़ेगा।
“भूत से ज़्यादा डर तो नौकरी जाने का है,” उसने खुद से कहा। �
सीढ़ियाँ पुरानी थीं, लोहे की रेलिंग जगह-जगह से जंग खाई हुई। �
पहली मंज़िल पार करते हुए उसे हल्की-हल्की फुसफुसाहट-सी सुनाई दी, जैसे कोई दूर से नाम लेकर पुकार रहा हो, लेकिन शब्द साफ़ न हों। �
रमेश ने कदम तेज़ कर दिए।
दूसरी मंज़िल पर पहुँचकर उसने टॉर्च घुमाई—पुरानी कुर्सियाँ, टूटी स्ट्रेचर, कुछ लोहे के स्टैंड, और दीवार पर लगे पेंट के उखड़े पैच। �
कोई इंसान नहीं दिखा।
अब