Mout ki Dastak - 34 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 34

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मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 34

पटना के बाहरी इलाके में, जहाँ गंगा की लहरें खामोशी से बहती हैं, वहाँ एक विशालकाय और जर्जर इमारत खड़ी थी। इसे लोग 'काली हवेली' के नाम से जानते थे। इस हवेली की दीवारें काली पड़ चुकी थीं और इसके झरोखों से झांकता अंधेरा राहगीरों के दिल में दहशत भर देता था। सालों से यह हवेली वीरान थी, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना था कि यहाँ सन्नाटा कभी चुप नहीं रहता। रात के सन्नाटे में यहाँ से पायल की छनछन, सिसकियों और भारी कदमों की आवाजें आती थीं।
लालच और चुनौती
राजू, जो पटना शहर का एक उभरता हुआ और जिद्दी रियल एस्टेट ठेकेदार था, इन कहानियों को महज़ बकवास मानता था। उसका मानना था कि डर सिर्फ कमज़ोर दिमाग की उपज है। उसने इस हवेली को कौड़ियों के दाम खरीद लिया। उसका प्लान साफ था—इस पुरानी हवेली को ढहाकर वहाँ एक आलीशान अपार्टमेंट खड़ा करना।
जब उसने अपनी पत्नी सीमा को यह खबर सुनाई, तो वह कांप उठी। "राजू, उस हवेली के साथ खून का इतिहास जुड़ा है। कहते हैं 50 साल पहले ठाकुर हरिश्चंद्र ने अपनी ही बेटी रानी को उसकी मर्जी के खिलाफ प्रेम करने के जुर्म में उसी हवेली की एक दीवार में जिंदा चुनवा दिया था। उसकी आत्मा आज भी आज़ादी के लिए तड़पती है।"
राजू खिलखिलाकर हंसा, "सीमा, तुम भी उन्हीं अनपढ़ गांव वालों जैसी बातें कर रही हो। कल हम हवेली देखने चलेंगे। मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि वहाँ सिवाय चूहों और चमगादड़ों के कुछ नहीं है।"
हवेली का पहला अनुभव
अगली सुबह जब दोनों हवेली के भारी, जंग लगे लोहे के गेट के सामने खड़े थे, तो हवा का एक सर्द झोंका उन्हें छूकर गुजरा, जैसे हवेली ने अपनी सांसें उनके ऊपर छोड़ दी हों। अंदर कदम रखते ही धूल भरी महक और सड़न की गंध ने उनका स्वागत किया। विशाल हॉल में मकड़ियों के जाले किसी सफेद कफ़न की तरह लटक रहे थे।
ऊपर की मंज़िल पर जाते समय सीढ़ियों की चरमराहट किसी के कराहने जैसी लग रही थी। एक कमरे में पहुँचते ही सीमा ठिठक गई। सामने एक आदमकद आईना था, जो सालों की धूल के बावजूद चमक रहा था। सीमा को आईने की गहराई में एक धुंधली परछाई दिखी—एक युवती, जिसके बाल बिखरे थे और आँखों में गहरा सन्नाटा था। "राजू! देखो वहाँ!" सीमा चिल्लाई। लेकिन जब राजू ने मुड़कर देखा, वहाँ सिवाय खाली दीवार के कुछ न था।
रहस्य की परतें
उस रात राजू को नींद नहीं आई। जैसे ही उसने आँखें मूंदीं, उसे एक भयानक सपना आया। एक लड़की उसे अपनी खाली और खून से सनी आँखों से देख रही थी और फुसफुसा रही थी, "मुझे बाहर निकालो... मैं इस दीवार के पीछे दम तोड़ रही हूँ।"
अगले दिन राजू अकेले हवेली गया। वह उस कमरे में पहुँचा जहाँ सीमा डरी थी। वहाँ फर्श के एक कोने में उसे फटी-पुरानी एक डायरी मिली। वह ठाकुर हरिश्चंद्र की निजी डायरी थी। उसमें आखिरी पन्ने पर कांपते हाथों से लिखा था: 'आज रात 12 बजे मैंने अपनी इकलौती संतान को उस दीवार में दफन कर दिया। उसकी सिसकियां अब हवेली का हिस्सा हैं। खुदा मुझे माफ करे, पर खानदान की इज्जत बच गई।'
राजू का दिल जोर से धड़का, लेकिन उसके अंदर के लालच ने डर को दबा दिया। उसने सोचा कि अगर वह इस दीवार को तोड़ देगा, तो सारा रहस्य खत्म हो जाएगा।
खौफनाक रात और अंत का आरंभ
राजू ने मजदूरों को अगले दिन दीवारें गिराने का हुक्म दिया। लेकिन उस रात, वह हवेली के पास बने एक अस्थाई केबिन में रुका था। रात के ठीक 12 बजे, उसके केबिन के दरवाजे पर भारी दस्तक हुई। खट... खट... खट...
राजू ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला। सामने सीमा खड़ी थी, लेकिन वह सीमा नहीं लग रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और उसकी आँखों की पुतलियाँ गायब थीं। वह सिर्फ इतना बोली, "मुझे बाहर निकालो राजू... दीवार ठंडी है।"
सुबह होते ही मजदूरों ने काम शुरू किया। जैसे ही उस खास दीवार पर पहला हथौड़ा पड़ा, एक भयानक बदबू चारों ओर फैल गई। दीवार के गिरते ही अंदर से एक कंकाल बाहर गिरा। उसके गले में वही लॉकेट था जिस पर 'रानी' लिखा था। मजदूर डर के मारे भाग खड़े हुए। पुलिस आई, जांच हुई, लेकिन 50 साल पुराने केस का अब क्या होता?
काली हवेली का अंतिम ग्रास
राजू ने सोचा कि अब सब खत्म हो गया है, वह भाग जाना चाहता था। पर सीमा कहीं नहीं मिली। पागलों की तरह वह फिर हवेली के अंदर भागा। ऊपर के उसी कमरे में, जहाँ वह आईना था, सीमा खड़ी थी। उसने वही सफेद साड़ी पहनी थी जो कंकाल के साथ मिली थी।
"सीमा! चलो यहाँ से!" राजू ने उसका हाथ पकड़ा। लेकिन जैसे ही उसने हाथ छुआ, वह बर्फ जैसा ठंडा था। सीमा मुड़ी और उसकी आवाज़ बदल चुकी थी। वह रानी की आवाज़ थी, "तुमने मुझे बाहर निकाला, अब मेरी जगह कौन लेगा?"
अचानक हवेली की दीवारें हिलने लगीं। सीढ़ियाँ गायब हो गईं और कमरा छोटा होने लगा। राजू ने भागने की कोशिश की, लेकिन फर्श उसे दलदल की तरह खींचने लगा। दीवार से काले हाथ निकले और राजू को अंदर खींचने लगे। उसकी चीखें हवेली की दीवारों में जज़्ब हो गईं।
आज भी काली हवेली वहीं खड़ी है। गांव वाले कहते हैं कि अब वहाँ से एक नहीं, बल्कि दो और आवाज़ें आती हैं। एक औरत की जो रोती है, और एक मर्द की जो दीवारें पीटता है। हवेली का रहस्य आज भी बरकरार है—क्योंकि काली हवेली को सिर्फ इमारतें नहीं, रूहें चाहिए थीं।