हवेली का खामोश पहरेदार
अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा 'निलयपुर' एक ऐसा गांव था, जहां सूरज ढलते ही सन्नाटा अपनी चादर बिछा देता था। गांव के छोर पर एक पुरानी हवेली खड़ी थी—‘रायजादा हवेली’। सफेद संगमरमर से बनी यह इमारत अब काली पड़ चुकी थी और उसके चारों ओर उग आई कटीली झाड़ियां ऐसी लगती थीं जैसे किसी ने हवेली को कैद कर रखा हो।
गांव वाले कहते थे कि उस हवेली में वक्त ठहर गया है। वहां रहने वाला आखिरी वारिस, कुंवर विक्रम सिंह, चालीस साल पहले एक रात रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया था। उसके बाद जो भी वहां गया, वह या तो कभी लौटा नहीं, या फिर अपनी दिमागी हालत खो बैठा।
अंशुल की जिद
अंशुल एक युवा लेखक था जिसे पुरानी इमारतों और लोककथाओं का शौक था। उसने सुना था कि अगर कोई रायजादा हवेली में एक रात बिता ले, तो उसे वहां के छिपे हुए खजाने का पता चल सकता है। हालांकि उसे खजाने से ज्यादा दिलचस्पी अपनी नई डरावनी किताब की कहानी में थी।
"अंशुल भाई, वहां मत जाओ। वह जगह शापित है," गांव के चाय वाले रहमत चाचा ने उसे चेतावनी दी।
अंशुल मुस्कुराया और अपना बैग कसते हुए बोला, "चाचा, भूत-प्रेत सिर्फ हमारे दिमाग का वहम होते हैं। कल सुबह मिलता हूं आपसे।"
हवेली में प्रवेश
शाम के सात बज रहे थे। धुंध गहरी होने लगी थी। अंशुल हवेली के भारी लोहे के गेट के पास पहुंचा। जैसे ही उसने गेट धक्का दिया, एक रूह कंपा देने वाली चीख जैसी आवाज गूंजी—शायद जंग लगे कब्जों की पुकार थी।
अंदर का नजारा भयानक था। धूल की मोटी परत हर चीज पर जमी थी। छत के कोनों से मकड़ी के जाले ऐसे लटक रहे थे जैसे फंदे हों। अंशुल ने अपनी टॉर्च जलाई और मुख्य हॉल की ओर बढ़ा। वहां एक बड़ी आदमकद तस्वीर लगी थी। वह कुंवर विक्रम सिंह की थी। तस्वीर की आंखें इतनी सजीव थीं कि अंशुल को लगा जैसे कुंवर उसे ही देख रहे हों।
अजीब घटनाएं
रात के 11 बजे थे। अंशुल ने दूसरी मंजिल के एक कमरे में अपना ठिकाना बनाया। अचानक, सन्नाटे को चीरते हुए किसी के चलने की आवाज आई।
खट... खट... खट...
आवाज ऊपर की मंजिल से आ रही थी। अंशुल का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने खुद को समझाया, "यह सिर्फ चूहे होंगे।" लेकिन तभी उसे पायलों की छनछन सुनाई दी। वह आवाज मधुर थी, लेकिन इस वीराने में वह किसी खंजर की तरह चुभ रही थी।
अंशुल ने हिम्मत जुटाई और टॉर्च लेकर ऊपर गया। सीढ़ियां चढ़ते समय उसे महसूस हुआ कि तापमान अचानक गिर गया है। उसकी फूंक से धुआं निकल रहा था।
दर्पण का रहस्य
तीसरी मंजिल पर एक बंद कमरा था। जैसे ही अंशुल उसके करीब पहुंचा, दरवाजा खुद-ब-खुद खुल गया। अंदर एक बड़ा सा प्राचीन दर्पण (mirror) था। टॉर्च की रोशनी दर्पण पर पड़ी, तो अंशुल का खून जम गया।
दर्पण में अंशुल का अक्स तो दिख रहा था, लेकिन उसके ठीक पीछे एक धुंधली सी आकृति खड़ी थी। एक औरत, जिसने लाल रंग के पुराने कपड़े पहने थे, लेकिन उसका चेहरा... उसका चेहरा पूरी तरह से जल चुका था।
अंशुल ने झटके से पीछे मुड़कर देखा। वहां कोई नहीं था।
उसने फिर दर्पण में देखा। वह आकृति अब और करीब आ चुकी थी और उसके हाथ अंशुल की गर्दन की ओर बढ़ रहे थे। अंशुल पीछे हटा और कमरे से बाहर भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा अब बंद हो चुका था।
बीते कल की गूंज
अचानक, कमरे की रोशनी खुद ही जल उठी। धूल भरी झाड़-फानूस चमकने लगे। दीवारों से धूल गायब हो गई और हवेली अपनी पुरानी शान में लौट आई। अंशुल हैरान था। उसने देखा कि कमरे में कुंवर विक्रम सिंह बैठे थे। उनके सामने वही सुंदर औरत खड़ी थी, जिसे उसने दर्पण में देखा था।
"विक्रम, तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते," वह औरत रो रही थी।
"माया, यह रिश्ता मुमकिन नहीं है। समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा," विक्रम ने निष्ठुरता से कहा।
अंशुल एक मूक दर्शक की तरह यह सब देख रहा था। यह एक 'फ्लैशबैक' जैसा था। उसने देखा कि कैसे गुस्से में विक्रम ने माया को उस कमरे में बंद कर दिया और हवेली के गुप्त तहखाने में आग लगा दी। माया की चीखें हवेली की दीवारों में दफन हो गईं।
आत्मा का बदला
दृश्य बदला। रोशनी फिर चली गई। अब कमरा फिर से वैसा ही खंडहर था। लेकिन इस बार, माया की रूह अंशुल के सामने थी।
"उसने मुझे नहीं बचाया... अब कोई यहाँ से नहीं जाएगा," एक फटी हुई, भारी आवाज गूंजी।
हवेली हिलने लगी। दीवारें दरकने लगीं। अंशुल को अहसास हुआ कि वह खजाना जिसकी बात गांव वाले करते थे, वह सोना-चांदी नहीं, बल्कि कुंवर विक्रम सिंह का वह गुनाह था जिसे वह दुनिया से छिपाना चाहता था।
अंशुल ने देखा कि फर्श के नीचे एक छोटी सी संदूकची दबी हुई थी। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उसे बाहर निकाला। उसमें माया के गहने और एक खत था, जिसमें विक्रम ने अपने गुनाह का इकरार किया था।
"माया! मैं तुम्हारा सच दुनिया को बताऊंगा। तुम्हें न्याय मिलेगा!" अंशुल चिल्लाया।
अचानक, वह रूह ठिठक गई। उसके जलते हुए चेहरे पर एक अजीब सी शांति छा गई। खिड़की से सुबह की पहली किरण अंदर आई और वह आकृति धुएं की तरह हवा में विलीन हो गई।
उपसंहार
अगली सुबह गांव वालों ने देखा कि अंशुल हवेली के बाहर बेहोश पड़ा था। उसके हाथ में वह पुरानी संदूकची थी। जब उसने होश में आकर पूरी कहानी सुनाई और वह खत दिखाया, तो पुलिस ने हवेली के तहखाने की खुदाई करवाई। वहां एक कंकाल मिला, जो शायद माया का था।
आज भी रायजादा हवेली वहीं खड़ी है, लेकिन अब वहां वह भारीपन नहीं है। लोग कहते हैं कि अब वहां पायलों की आवाज नहीं, बल्कि हवाओं के चलने का सुकून भरा संगीत सुनाई देता है।
अंशुल ने अपनी किताब पूरी की, जिसका शीर्षक था—"खामोश हवेली का इंसाफ"।