Mout ki Dastak - 31 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 31

Featured Books
Categories
Share

मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 31

अंधेरी घाटी का बुलावा: एक खौफनाक दास्तान
हिमालय की तलहटी में बसा 'रुद्रपुर' एक ऐसा गाँव था जहाँ सूरज की रोशनी बाकी दुनिया से पहले चली जाती थी। ऊँचे-ऊँचे चीड़ के पेड़ों के बीच बसी यह बस्ती शाम होते ही सन्नाटे की चादर ओढ़ लेती थी। गाँव के किनारे पर एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग 'नीली कोठी' कहते थे। गाँव वालों का मानना था कि उस कोठी की दरो-दीवारों में आज भी उन लोगों की चीखें कैद हैं, जो कभी वहाँ से वापस नहीं आए।
शहर से आए तीन दोस्त
अयान, समीर और काव्या शहर की भागदौड़ से दूर कुछ रोमांच की तलाश में रुद्रपुर पहुँचे थे। अयान एक फोटोग्राफर था, जिसे पुरानी इमारतों की तस्वीरें लेना पसंद था। समीर निडर और थोड़ा लापरवाह था, जबकि काव्या अक्सर अनहोनी की आशंका से घिरी रहती थी।
जब उन्होंने गाँव वालों से नीली कोठी के बारे में पूछा, तो मुखिया ने उन्हें चेतावनी दी:
"बेटा, उस कोठी की तरफ मत जाना। वहाँ हवाओं का रुख अलग है और साये इंसानों की तलाश में रहते हैं। रात के सन्नाटे में वहाँ पायल की छन-छन सुनाई देती है, जो किसी के इंतज़ार में है।"
समीर खिलखिलाकर हँसा। उसने इसे महज़ एक ग्रामीण अंधविश्वास समझा। लेकिन अयान की आँखों में कौतूहल था। उसने सोचा कि अगर उस हवेली की कुछ तस्वीरें मिल जाएँ, तो उसकी अगली प्रदर्शनी हिट हो जाएगी।
रात का सन्नाटा और हवेली की दहलीज
रात के ठीक 11 बजे, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो चुका था, ये तीनों अपनी टॉर्च लेकर नीली कोठी की ओर चल दिए। जैसे-जैसे वे करीब आ रहे थे, तापमान गिरता जा रहा था। हवा में एक अजीब सी सड़न और पुराने इत्र की महक घुली हुई थी।
हवेली का बड़ा सा लोहे का दरवाजा जंग लगा हुआ था और हाथ लगाते ही एक भयानक चरमराहट के साथ खुल गया। अंदर कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे किसी ठंडी उंगली ने उनकी रीढ़ की हड्डी को छू लिया हो।
हवेली का मंजर:
फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी, जिस पर उनके पैरों के निशान ऐसे उभर रहे थे मानो कोई और भी उनके साथ चल रहा हो।
दीवारों पर लगी पुरानी पेंटिंग्स की आँखें हर दिशा में उनका पीछा कर रही थीं।
हॉल के बीचों-बीच एक विशाल झूमर लटका था, जो बिना हवा के भी धीरे-धीरे डोल रहा था।
वो रहस्यमयी कमरा
हवेली की दूसरी मंजिल पर एक कमरा था जिसका दरवाजा आधा खुला था। अयान ने अपना कैमरा निकाला और तस्वीरें लेना शुरू किया। अचानक, काव्या ठिठक गई।
"तुम लोगों को कुछ सुनाई दिया?" उसने काँपते हुए पूछा।
समीर ने मज़ाक उड़ाया, "शायद कोई चूहा होगा काव्या, डरो मत।"
लेकिन तभी, पूरे हॉल में एक धीमी सुरीली आवाज़ गूँजने लगी। कोई गुनगुना रहा था—एक ऐसी लोरी जो कानों को सुरीली तो लग रही थी, लेकिन रूह को कंपा देने वाली थी। आवाज़ उस कमरे के पीछे से आ रही थी।
अयान ने कमरे का पूरा दरवाजा खोला। अंदर एक पुरानी नक्काशीदार कुर्सी रखी थी जो अपने आप हिल रही थी। कुर्सी के पास एक टूटा हुआ आइना था। जब अयान ने टॉर्च की रोशनी आइने पर डाली, तो उसकी चीख निकल गई। आइने में अयान का अक्स नहीं था, बल्कि एक धुंधली सी औरत की परछाई थी जिसका चेहरा बालों से ढका हुआ था और उसकी आँखें अंगारे की तरह चमक रही थीं।
परछाइयों का खेल
अचानक कमरे की बत्तियाँ (जो बरसों से खराब थीं) एक पल के लिए जल उठीं और फिर धमाके के साथ फूट गईं। चारों तरफ घुप्प अंधेरा छा गया। टॉर्च की रोशनी भी धुंधली पड़ने लगी।
"समीर! काव्या! कहाँ हो तुम लोग?" अयान चिल्लाया।
कोई जवाब नहीं आया। अयान ने अपनी टॉर्च फर्श पर घुमाई, तो उसे समीर के जूतों के निशान दिखाई दिए जो एक दीवार की तरफ जा रहे थे और फिर अचानक गायब हो गए थे। ऐसा लग रहा था मानो समीर दीवार के अंदर समा गया हो।
तभी अयान को अपने कंधे पर एक बर्फ जैसा ठंडा हाथ महसूस हुआ। उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। वहाँ समीर खड़ा था, लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह सफेद हो चुकी थीं और उसके चेहरे पर एक अजीब, डरावनी मुस्कान थी।
उसने फुसफुसाते हुए कहा, "वो आ गई है, अयान... वो हमें नहीं जाने देगी।"
खौफनाक सच
अयान पागलों की तरह नीचे की ओर भागा। सीढ़ियाँ उतरते समय उसे लगा कि सीढ़ियाँ कभी खत्म ही नहीं हो रही हैं। वह जितना नीचे भागता, उसे लगता कि वह और ऊपर जा रहा है। काव्या उसे एक कोने में सिसकती हुई मिली।
"अयान, यहाँ से भागो! यह कोई हवेली नहीं है, यह एक जाल है!" काव्या चिल्लाई।
तभी हवेली की दीवारों से खून जैसा लाल तरल पदार्थ रिसने लगा। फर्श से अनगिनत हाथ निकलने लगे जो उनके पैरों को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। उसी समय, वही रहस्यमयी औरत उनके सामने प्रकट हुई। वह हवा में तैर रही थी। उसकी आवाज़ बिजली की कड़कड़ाहट जैसी थी:
"तुमने मेरी नींद में खलल डाला है। अब तुम भी इसी सन्नाटे का हिस्सा बनोगे।"
अयान ने जेब से वो छोटा सा ताबीज निकाला जो गाँव के पुजारी ने उसे दिया था। उसने उसे ज़मीन पर पटका। एक तेज़ रोशनी पैदा हुई और उसे लगा जैसे कोई उसे अंधेरे कुएँ से बाहर खींच रहा हो।
अगली सुबह: एक अधूरा अंत
जब सूरज की पहली किरण रुद्रपुर की पहाड़ियों पर पड़ी, अयान गाँव के बाहर पगडंडी पर बेहोश मिला। उसकी कमीज फटी हुई थी और हाथ-पैर पर खरोंचें थीं।
जब उसे होश आया, तो उसने पागलों की तरह गाँव वालों से समीर और काव्या के बारे में पूछा। मुखिया ने दुख भरी नज़रों से उसे देखा और कहा, "बेटा, तुम वहाँ अकेले ही गए थे। हमें सीसीटीवी फुटेज में (जो गाँव के नाके पर था) सिर्फ तुम ही कोठी की तरफ जाते दिखे थे।"
अयान सन्न रह गया। उसने अपना कैमरा चेक किया। कैमरे की सभी तस्वीरें काली थीं, सिवाय आखिरी तस्वीर के। उस तस्वीर में अयान अकेला खड़ा था, लेकिन उसके पीछे दो धुंधले साये थे जिनके हाथ अयान के गले के पास थे—वो साये हूबहू समीर और काव्या जैसे दिख रहे थे।
आज भी, रुद्रपुर के लोग कहते हैं कि पूर्णिमा की रात को नीली कोठी से तीन लोगों के हंसने की आवाज़ें आती हैं। पर हकीकत यह है कि वहाँ अब भी सिर्फ एक ही इंसान ज़िंदा वापस लौटा था, जिसकी रूह आज भी उसी अंधेरी कोठी में कैद है।
निष्कर्ष
भूतिया कहानियाँ अक्सर हमारे अवचेतन मन के डरों को दर्शाती हैं। क्या आपको लगता है कि अयान के दोस्त वाकई उसके साथ गए थे, या वो सिर्फ उस हवेली का कोई मायाजाल था?