> भाया वो...वोह...।
दुसरा आदमी कहता है--
> अरे भाया पहले थौड़ी सांस ले लो फिर कहना।
वो आदमी कुछ दैर सांस लेता है और फिर कहता है --
> भाया वो रक्षा कवच अब नही रहा किसीने उसे वहां से हटा दिया है। इसिलिए कुंम्भन जंगल से बाहर
आया।
इतना सुनने के बाद सभी उस आदमी पर गुस्सा होकर कहता है --
> ये लो इसे अब पता चला, अरे मुरख कलस वहां से हटा था तभी तो कुंम्भन बाहर आया था , और इंद्रजीत बाबु ने वहां पर रक्षा कलश रख दिया है , अब कुंम्भन फिर से सुंदरवन मे कैद हो गया है समझे।
इधर दक्षराज और दयाल आपस मे बात कर रहे थे। दक्षराज दयाल से कहता है---
> दयाल क्या चेतन पता कर पायेगा के कुंम्भन क्यों ऐसे अचानक वहां से गायब हो गया । क्या वहां पर सच मे परी आयी थी ?
दयाल कहता है--
> पता नही मालिक पर अगर पता चल भी जाए तो
उससे हमें क्या ।
दक्षराज कहता है--
> नही दयाल अगर पता चल जाए के वहां पर परी आयी थी। तो ये बात मेरे लिए बहुत ही अच्छी खबर होगी ।
दयाल हैरानी से कहता है----
> अच्छी खबर होगी पर क्यों मालिक अगर ऐसा सच
मे हो गया तो इसका मतलब ये होगी ना के वो परी अपनी साथी को बचाने के लिए आयी हो और फिर आपको उससे संभल कर रहना होगा।
दक्षराज हंसते हूए कहता है--
> हा...हा...हा...! हां दयाल तुम्हारी बात बिल्कुल सही है पर अब परी भी मुझे इस श्राप से मुक्ती दिला सकती है।
दयाल हैरानी से पूछता है--
> क्या मालिक एक परी के वजह से ही तो आपकी ये
हाल है। अब एक और परी के आने से आपके लिए अच्छा कैसे हो सकता है। वो कैसै आपको श्राप से मुक्त करा सकती है ?
दक्षराज कहता है--
> संम्भोग करने से ।
इतना सुनकर दयाल हैरानी से दक्षराज की और दैखने लगता है। दक्षराज अपनी बात को जारी रखते हूए कहता है--
> ऐसे हैरान मत हो दयाल , हाँ दयाल परी के साथ संम्भोग करने से ही मैं श्राप से मुक्त हो जाउगां।
दयाल अपने दौनो हाथ को आपस मे जोड़कर कहता है--.
> वाह मालिक क्या बात है खुबसूरत परी के संम्भोग और श्राप से मुक्ती भी।
इतना बोलकर दक्षराज हंसने लगता है--
> हा...हा...हा...!
दक्षराज की हसी दैखकर दयाल भी साथ मे हसने लगता है। दक्षराज दयाल से कहता है--
> अब हंस मत और जा । जाकर दैख के हॉस्पिटल मे
निलु क्या कर रहा है तु जाकर उसे अच्छी तरह समझा कर आ नही तो कहीं वो नालायक किसी को कुछ बोल ना दें।
दयाल हां मे अपना सर हिलाकर कहता है --
> जी मालिक ।
इतना बोलकर दयाल वहां से हॉस्पिटल की और चला जाता है।
दयाल से जाने के बाद दक्षराज कहता है --
> अब मुझे परी साधना करके समय गवांनी नही पड़ेगी, उस परी को वश मे करके उसके साथ संभोग करके मैं इस श्राप से हमेशा के लिए मुक्त हो जाऊगां ।
उधर सभी गाँव वाले इंद्रजीत के हवेली मे इंद्रजीत के पास बैठै थे और इंद्रजीत को पुरी बात बोलकर सुनाता है। गाँव वालो की सारी बात सुनकर इंद्रजीत कहता है--
. मैं इस बारें मे जानता हूँ पर वो कवच किसने वहां से हटाया ये बात मुझे नही पता। पर आप सब निश्चिंत
रहीये कुंम्भन को फिर से जंगल मे कैद कर दिया गया है। जहां पर रक्षा कवच थी अब उस जगह पर रक्षा कलस रख दिया गया है।
इंद्रजीत के मुह से इतना सुनने के बाद सभी के चेहरे पर एक खुली दिखाई देने लगती है। और सभी इंद्रजीत की प्रसंसा करते करते वहां से चला जाता है।
इधर हॉस्पिटल मे दयाल निलु के सामने बैठ कर बात कर रहा था। दयाल निलु से कहता है --
> तु बिल्कुल भी चिंता मत करना । मालिक ने मुझे तेरे पास भैजा है तेरा ख्याल रखने के लिए और मालिक ने ये भी कहा है के अगर कोई तुमसे तुम्हारे इन चोटों के बारे मे पूछे तो तु कुछ भी बहाना करके बोल देना ठीक है।
निलु हां में अपना सर हिलाता है। दयाल निलु के हाथ को पकड़ कर पूछता है--
> अच्छा निलु ये बता के उस दिन तु वहां से कहां गायब हो गया था और तेरे साथ क्या हुआ था ?
दयाल निलु से कहता है---
> उस दिन मालिक ने तुझे कितना ढुंढा तुझे पता है उन्होनें तुझे हर जगह ढुंढा पर तुम कहीं नही मिले सिर्फ तुम्हारा चप्पल और खून की कुछ बूंदे मिली वो तो बहुत ही टेंसन मे आ गये थे। आखिर तु वहां से कहां गायब हो गया था।
दयाल से इतना सुनते ही निलु डर से थर थर कांपने लगता है। उसकी आंखे बड़ी बड़ी और लाल हो जाती है। निलु पसीना से पूरा भीगं चुका था । वो दयाल को सब कुछ बताना चाहता था पर डर से उसके मुह से एक शब्द नही निकलता है।
उसके चेहरे से ये साफ पता चल रहा था के निलु मौत के मुह से लौट कर आया था। दयाल निलु के पीठ को थपथपाते हूए कहता है--
> तु घबरा मत निलु अब मैं हूँ ना तेरे साथ तुझे कुछ नहीं होगा अब बस तु आराम कर ।
इतना बोलकर दयाल निलु को वही बेड पर सुला देता है और निलु के चेहरे का पसिना को पोंछते हुए कहता है--
> तु अब ज्यादा सौच मत बस आराम कर । हम सब है ना तेरे साथ।
निलु अपनी आंखे बंद कर लेता है। दयाल निलु का ये हालत दैखकर हैरान और दंग रह जाता है। दयाल सौचने लगता है के क्या निलु को सच मे कुम्भन उठा कर तो नही चला गया था। दयाल निलु की हालत दैखकर और कुंम्भन के बारे में सौच कर बहुत घबरा जाता है।
तभी वहां पर आलोक एकांश और वृन्दां आ जाती हैं। आलोक दैखता है के वहां पर दयाल पहले से ही निलू के पास बैठा रहता है। दयाल को दैखकर आलोक कहता है--
> अरे दयाल काका आप यहां वो भी इतनी सुबह सुबह।
दयाल कहता है--
> अ.....अ....आलोक बेटा वो रात भर मैं निलु के बारें में ही सौच रहा था तो पुरी रात मैं सो नही पाया इसिलिए सुबह ही मिलने चला आया। वो क्या है ना वर्षो से एक साथ रहने की आदत जो हो गई है। इतना बोलकर दयाल हंसने लगता है--
> हें.....हें.... हें..... हें....!
दयाल बार बार आलोक से नजरे चुरा रहा था । आलोक समझ जाता है के दयाल उससे झूठ बोल रहा है। पर आलोक अब दयाल से बिना कुछ सवाल किये निलु के पास आ जाता है और वही पर रखी कुर्सी पर बैठ जाता है। आलोक निलु से उसका हाल चाल पुछते हुए कहता है--
> निलु काका अभी आपकी तबियत कैसी है ?
निलु धीरे से जवाब देता है ---
> हां बेटा अब पहले से मैं बेहतर महसुस कर रहा हूँ ।
आलोक निलु के हाथ मे लगे खरौंच को दैखकर कहता है--
> काका ये खरोंचे आपको कैसी लगी ? कल तो आप मेला मे नही थे तो फिर यो चौंटे और खरोंचे आपको कैसै लगी ?
आलोक के सवाल से निलु बहुत घबरा जाता है उसे समझ मे नही आ रहा था के वो आलोक को क्या जवाब दे । निलु दयाल की और दैखने लग जाता है दयाल हलके से अपना सर हिला कर ना मे इशारा करता है जिसे आलोक दैख लेता है ।
आलोक निलु के हाथ को पकड़कर कहता है--
> निलु काका मैं हुँं ना आपके साथ आपको किसी से
भी डरने की कोई जरूरत नही है। आप बेफिक्र होकर बोलिए।
निलु कुछ दैर सौचता है और कहता है--
> वो बैटा उस दिन जब मैं रास्ते से पैदल आ रहा था तो अचानक से किसीने पिछे से मेरे आंखो में पट्टी बांध
दैता है और मुझे वहां से उठकर कही और लेकर चला जाता है।
आलोक हैरानी से कहता है --
> क्या । पर आपको कौन उठकर ले जा सकता है और क्यूं ? निलु काका क्या आपने उनमे से किसी को देखा था।
आलोक की बात का जवाब देते हुए निलु कहता है--
> चैहरा मैं नही दैख पाया क्योंकी उन लोगो ने मेरे
आंखो पर पट्टी बांध कर रखा था पर वो लोग मुझे सुंदरवन लेकर गए थे । पर वहां क्यों लेकर गए थे ये मुझे नही पता फिर उनलोगों ने मुझे बहोत पिटा और कुछ सुंघाकर मुझे बेहोस कर दिया। और जब मुझे होश आया तो मैने अपने आपको सुंदरवन मे पाया । मैरा हाथ और पैर को उन्होनें रस्सी से बांध दिया था। बहुत मुस्किल से मैनै अपने आपको रस्सी के बंधन से छुड़या और भागते भागते सिधा यहां हॉस्पिटल आ गया।
इतना बोलने के बाद निलु दयाल की और दैखता है। दयाल निलु को आंख मारकर इशारा करता है के तुमने बिलकुल सही कहा। जिसे आलोक दैख ल़ेता हैं। तभी दयाल वहां से उठ जाता है और आलोक से कहता है--
> आलोक बाबा मैं अभी चलता हूँ । वो.....! मालिक हवेली पर अकेले होगें।
इतना बोलकर दयाल वहां से चला जाता है। आलोक निलु को शक की नजर से दैखता है । निलु फिर अपनी आंखे बंद करके सोने का बहाना करता है । आलोक मन ही मन सौचता है--
" आखीर इन सबके मन मे चल क्या रहा है। कुछ तो
बात है जो ये लोग छुपा रहे है इसका पता तो मैं लगा कर ही रहूगां।
उधर सुंदरवन के अंदर जंगल में कुंम्भन को होश आने लगता है। कुंभ्मन कराहते हूए धिरे - धिरे उठता है और लड़खड़ाने लगता है ।
कुंभ्मन चलने की कोशिश करता है पर चल नही पाता । कुंभ्मन परेसान होकर कहता है--
> ये....ये मुझे क्या हो रहा है । मैं....मैं ठीक से चल क्यों नही पा रहा हूँ।
कुंम्भन अपने अंदर बहुत कमजोरी महसुस कर रहा था। कुंभ्मन गुस्से से कहता है--
> ये मेरे अंदर क्या हो रहा है। मुझमे शक्ती का अभाव
क्यो हो रहा है। मुझे कुछ याद क्यो नही आ रहा है , मुझे क्या हुआ था।
Note :- Thank you sandika ji , aapka comment dekhkar mujhe bhi acha lagta hai ❤️😊. Thank you Sapna kumari ji , priti ji , hardik ji , dhruvvinod ji , Sneha ji , chetan bhanarkar ji , aap sabko bahot bahot dhanyavaad . or baki jo bhi readers hai jinka comment or review mujhe nhi dikh rha hai wo please mujhe follow karle taki aap logo ke lovely comments or review ko mei dekh paun .
To be continue....798