Shrapit ek Prem Kahaani - 43 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 43

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 43

उधर वर्शाली और एकांश एक दुसरे को प्यार से बाहों मे भर रखा था और उनपर नीले पुष्प की वर्षा हो रही थी जिससे दोनो ही घुटने पुष्प से ढक जाते हैं। एकांश वर्शाली के होठ को चुमने के लिए आगे बड़ता है पर वर्शाली अपने आपको सम्भांलते हुए कहती हैं--

वर्शाली :- नहीं एकांश जी अभी नही ।

एकांश कुछ नहीं बोलता है। बस चुपचाप हाथ में रखी मणि को देखने लगता है। वर्शाली एकांश से अलग होती होकर कहती है--

वर्शाली :- बस अब और नहीं।


 वर्शाली के इतना कहते ही वह पुष्प वर्षा रुक जाती है। वर्शाली भूमी पर गीरे पुष्प के उपर बैठ जाती हैं और अपने दोनो हाथो से पुष्प को अपने उपर गिराने लगती है तो कभी अपने गालो पर सटाने लगती है।  


वर्शाली की खुशी देखकर एकांश बस देखे जा रहा था । वर्शाली एकांश को खिंचकर अपने पास बैठा लेती है और एकांश से कहती है---


वर्शाली :- एकांश जी आपको ज्ञात नही पर ये पुष्प मुझे बहुत प्रिय है। 


वर्शाली फिर कहती है--

वर्शाली :- ये क्या एकांश जी मैने मणी आपको अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए दिया था पंरतु आपने केवल मेरे लिए ही मांगा ? अपने लिए कुछ भी नही मांगा। 

एकांश :- कौन कहता के मैने अपने लिए कुछ भी नही मांगा। मैने मागां ना ।


 वर्शाली हैरानी से पुछती है---

वर्शाली :- आपने मांगा ! पर क्या एकांश जी ? 

एकांश :- तुम्हारी ये जो खूशी है ना वो मांगी मैने । यही तो मैरी मनोकामना है वर्शाली । जिसे मैने पूरा किया । 


वर्शाली एकांश को बस देखे जा रही थी और मन ही मन सौचती है--

>" ये एकांश जी भी मुझसे प्रेम करते है। पर मै उन्हे 
कैसे बताउ के मैं भी उनसे उतना ही प्रेम करती हूँ जितना वो मुझसे करते हैं। पर मै ये बात उनसे कभी बता नही सकती। हे इश्वर ये मुझे आपने किस दुविधा मे डाल दिया । एक परी होकर मैं एक मनुष्य से प्रेम कैसे कर सकती हूँ ।"

 वर्शाली इतना सोच ही रही थी के एकांश वर्शाली से कहता हैं--

एकांश क्या हुआ वर्शाली तुम किस सोच मै पड़ गयी। 


वर्शाली कुछ नही कहती और एकांश को अपने बाहों मे भर लेती है। वर्शाली के ऐसे अचानक गले लगने से एकांश हैरान हो जाता है। कुछ दैर ऐसे ही वर्शाली एकांश के बाहों मे रहती फिर कुछ दैर बाद वर्शाली एकांश से अलग हो जाती है। वर्शाली के चेहरे मे एक उदासी थी जिसे देखकर एकांश वर्शाली से पूछता है --

एकांश :- क्या हुआ वर्शाली तुम ठीक तो हो ? 


वर्शाली कहती है--

वर्शाली :- क्यो एकांश जी आपको बूरा लगा क्या ? 

एकांश :- नही वर्षाली मेरा वो मतलब नही था। 

एकाश बात को बदलते हुए कहता है--

एकांश :- वर्शाली मान गया तुम्हारे इस मणी को ये तो सच मे मनोकामना पुरा करती है। वर्शाली इस मणी का नाम क्या है ? 

वर्शाली :- इसे सांतक मणी कहते है एकांश जी।

 एकांश फीर वर्शाली से पूछता है--

एकांश :- वर्शाली क्या ये सांतक मणी तुम परीयों को जन्म से ही मिल जाता है ? 

वर्शाली हंसते हुए कहती है--

वर्शाली: - नही एकांश जी ये मणी हमे यहीं पृथ्वी से 
प्राप्त होता है इसी प्रकृति से। 

एकांश हैरानी से मणी को देखता है और कहता है--

एकांश :- क्या सच मे ये मणी हमारी पृथ्वी पर है ? 

वर्शाली :- हां एकांश जी। 

एकांश :- इस मणी के बारे मे आज तक ना कभी दैखा है और ना कभी सुना है। पर इस प्रकृति ने सबको कुछ ना दिया ही है। और हम मानव इस प्रकृति का बस गलत उपयोग ही करते आ रहें हैं। कभी इस प्रकृति के बारे मे नही सौचा बस सिर्फ अपने मतलब के लिए इस प्रकृति से खिलवाड़ किया है। पर वर्शाली अगर ये मणी यही है पृथ्वी पर है तो तांत्रीक फिर इसे पाने के लिए परी साधना क्यो करता है ? उसे तो यही से यह मणी प्राप्त हो जाती । 

वर्शाली : - वो इसिलिए साधना करते है क्योकी वे इस मणी को प्रकृति से प्राप्त नही कर सकता । इसका ज्ञान किसीको नही है हमे भी नही । ये प्रकृति हमे स्वयं प्रदान करती है और अगर ये मणी किसी मानव को प्राप्त हो जाती है तो भी वो इससे कुछ नही कर सकते ।

 एकांश हैरानी से पूछता है--
.
एकांश :- पर क्यो वर्शाली ? 

 वर्शाली: - वो इसिलिए क्योंकी इस मणी को प्राप्त करने के पश्चात हमे इसे शिध्द करना पड़ता है। उसके बाद ये मणी शक्तीशाली बनती है। ये साधना मनुष्य को नही पता। इसिलिए जबतक ये मणी शिध्द नही हो जाती ये किसी काम का नही है।

 एकांश फीर वर्षाली से पूछता है--

एकांश :- वर्शाली । क्या हमारे इस पृथ्वी पर कोई और मणी भी है ? जिसका ज्ञान हम इंसानो को नही है। 

वर्शाली :- हां एकांश जी वैसे तो कई मणि इस पृथ्वी 
पर छिपी है पर कुछ ही मणी ऐसे है जो दीव्य है। जैसा सांतक मणी इसका शक्ति तो आपने दैखा ही ये मणी केवल हम परीयों के पास होती है और इसी मणी के शक्ति से मैने उस कुंभन को भी उस मेला से मार भगाया था।


 एकांश झट से वर्शाली से पूछता है--

एकांश :- वर्शाली क्या इस मणी से तुमने उस कुंभन को मार दिया है। 


वर्शाली :- नहीं एकांश जी जिवन और मृत्यु सब ईश्वर के हाथ मे है। हम परियां इसमे हस्तक्षेप नही करते। पर एक और शक्तिशाली मणी इस पृथ्वी पर है जो है मैघ मणी। अगर किसीके पास ये दौनो मणियां हो तब वो कुछ भी कर सकता है जीवन ले भी सकता है और जीवन दे भी सकता है। 

एकांश :- और ये मेघ मणि कहां मिलती है? 

वर्शाली :- ये मणी देत्यों के पास है। इसमे भी असीम शक्तियाँ होती है। ये मणी भी सांतक मणि जैसे ही शक्तिशाली है। परंतु ये दौनो मणियां तभी किसी मृतक को जीवित कर सकता है जब दौनो मणी को इस झरने के जल से डूबोया जाए तो वह जल अंमृत बन जाता है और जीवन दायी बन जाता है। 








एपिसोड 25. रक्षा कलस 

एकांश इतना कुछ सुनकर हैरान रह जाता है और अपने सर पर हाथ रखकर कहता है--

एकांश :- बाप रे । ये मणियां इतनी शक्तिशाली है और , ना जाने क्या क्या राज छूपे हूए है हमारे पृथ्वी मे और हम इंसान इन सबसे कितना अनजान है। 


वर्शाली: - हां एकांश जी पर ये मेघ मणि को प्राप्त करना असंभव है। क्यूंकी ये देत्य के पास होती है और अनके पास अपार शक्तियां होती है। अगर देत्य से मेघ मणि ले लिया जाए तो वो शक्तिहीन हो जाएगा।


 एकांश :- अच्छा तो क्या कुम्भन इसिलिए इस पृथ्वी पर इतने वर्षो से है।

 वर्शाली: - हां एकांश जी कुम्भन मेघ मणी की खोज कर रहा है। जो कीसी मनुष्य ने उसके पुत्री कुम्भनी से 
छीन लिया है। कुम्भन उस मणि से अपनी पुत्री कुम्भनी को पुनः जिवन दान देना चाहता है।

 एकांश वर्शाली से फिर पुछता है।

एकांश :- पर वर्षाली तुमने अभी कहा के मेघ और 
सांतक मणी मे से कौई भी मणी जीवन नही दे सकता ? पर अभी तुम कुछ और कह रही हो।

 वर्शाली : - सांतक मणी सात्विक है और मेघ मणी नही उसकी विध्या सात्विक नही है राक्षसी है। वो अपनी साधना से मेघ मणी से भी कुम्भनी को पुनः जीवित कर सकता है। पर इसके लिए उसे एक ऐसी मनुष्य की खोज करनी होगी जो पूर्णिमा तिथि के रोहिणी नक्षत्र के बरियान योग मे जन्म लिया हो। और ऐसे मनुष्य की रक्त से उस मणी का अभीषेक करके उसे शुध्द कर सके और उस मृत सरीर को पुनः जीवित कर सके। और कुम्भन इसी की तलास मे वर्षो से इस पृथ्वी पर घुम रहा है। 


वर्शाली की बात सुनकर एकांश कहता है--

एकांश :- वर्शाली मेरा जन्म भी इसी योग मे हुआ है। तो क्या कुम्भन मुझे ही ढुंढ रहा है ? 


एकांश कुछ सौचता है और कहता है--

एकांश :- इसका मतलब वो साधु बाबा इसी की बात 
कर रहे थे के आने वाले तीन महिना के अंदर मेरा मृत्यु योग है। 


इतना बोलकर एकांश चुप हो जाता है। एकांश को चुप देखकर वर्शाली कहती है--

वर्शाली :- एकांश जी अकेले आप ही थोड़ी ना हो जो इस योग मे जन्मे है। और भी ऐसे मनुष्य है जो इस योग मे जन्मा है।

 एकांश :- पर वर्शाली यहां तो सिर्फ़ मे हूँ ना।

 इस बार वर्शाली कोइ जवाब नही देती है। एकांश कहता है ---

एकांश :- क्या हुआ वर्षाली तुम चुप क्यों हो गई। 

वर्शाली :- आपको क्या लगता है एकांश जी के मैं यहां ऐसे ही इतमे वर्षो से यहां इस जंगल मे रहती हूँ। 


एकांश वर्शाली से पूछता है--

एकांश :- तुम कहना क्या चाहती हो वर्शाली ? 

वर्शाली :- मुझे ये सब पहले से ज्ञात है के आपके उपर संकट आने वाला है इसिलिए मै यहां केवल आपके लिए रूकी हूँ ताकि कोई भी शक्ति आपको हानी नही पहूँचा पाऐं। और कुम्भन के पास केवल इसी पूर्णिमा तक का ही समय शेष है। कुम्भन अगर इस पूर्णिमा तक उस मणि को ना ढुंढ पाया तो वह कुम्भनी को फिर कभी जीवित नही कर पाएगा। और तब वह क्या करेगा ये तो आने वाला समय ही बताएगा जो मनुष्य के लिए अच्छा नही होगा।


 एकांश :- ये तुम क्या कह रही हो वर्शाली ? तुम यहां मेरे लिए रुकी हुई हो ? पर क्यो वर्शाली ? 


वर्शाली :- क्योकी आपका मेरे उपर बहुत उपकार है एकांश जी। अगर उस दिन अगर आप नही होते तो वो लोग मुझे उस रात .....।

 इतना बोलकर वर्शाली चुप हो जाती है। एकांश वर्शाली के पास जाकर कहता है--

इतनी सी बात के लिए तुम मेरे लिए इतने वर्षो से यहां हो। अपने लोक को छोड़कर।

 एकांश वर्शाली का हाथ पकड़ कर कहता है। 

एकांश :- वर्शाली उस रात मैने जो किया वो मेरा कर्तव्य था। पर वर्शाली तुम जो मेरे लिए कर रही हो वो पागलपन है। इसिलिए तुम अपने लोक लौट जाओ। मैरे वजह से तुम अपने आपको खतरे मे मत डालो और यहां से अपने लोक चले जाओ।

To be continue.....655