Mout ki Dastak - 3 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 3

Featured Books
Categories
Share

मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 3

देवगढ़ का आखिरी हॉल्ट
समीर को पुरानी जगहों और अनसुलझे रहस्यों का शौक था। वह एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर था, जिसका मानना था कि 'भूत' जैसी कोई चीज नहीं होती, बस हमारे दिमाग का वहम और रोशनी का खेल होता है। इसी वहम को चुनौती देने के लिए वह पहुँचा 'देवगढ़'—एक छोटा सा रेलवे स्टेशन जो करीब 40 सालों से बंद पड़ा था।
इलाके के लोग कहते थे कि रात के 12 बजकर 12 मिनट पर वहाँ एक 'काली ट्रेन' रुकती है, जो किसी समय सारिणी (Timetable) में नहीं है। समीर ने अपना कैमरा, ट्राइपॉड और टॉर्च उठाई और निकल पड़ा उस वीरान स्टेशन की ओर।
सन्नाटे की आहट
स्टेशन के नाम की पट्टी आधी टूटी हुई थी। पटरी पर घास उग आई थी और चारों तरफ घने पेड़ों का घेरा था। समीर ने अपना कैमरा सेट किया और बोलना शुरू किया, "दोस्तों, आज मैं देवगढ़ के उस स्टेशन पर हूँ, जिसे दुनिया 'मौत का स्टेशन' कहती है। यहाँ का तापमान सामान्य से काफी कम है, और चारों तरफ एक भारी सन्नाटा है।"
तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी— खुर्र... खुर्र... समीर ने टॉर्च घुमाई। वहां एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जिसने रेलवे की पुरानी खाकी वर्दी पहनी हुई थी। उसके हाथ में एक लाल लालटेन थी, जो बुझ चुकी थी।
"अरे बाबा! आप यहाँ क्या कर रहे हैं?" समीर ने राहत की सांस लेते हुए पूछा।
बूढ़ा धीरे से हंसा। उसकी हंसी सूखी पत्तियों के चरमराने जैसी थी। "मैं यहाँ ड्यूटी पर हूँ बेटा। सिग्नल देना पड़ता है।"
समीर मुस्कुराया, "बाबा, यह स्टेशन तो बरसों पहले बंद हो चुका है। अब यहाँ कौन सी ट्रेन आती है?"
बूढ़े ने अपनी धुंधली आँखों से पटरियों की ओर देखा और बोला, "ट्रेनें कभी बंद नहीं होतीं, बस मुसाफिर बदल जाते हैं। तुम भी तो मुसाफिर ही हो।"
वो रहस्यमयी समय
समीर ने अपनी घड़ी देखी—11:55 PM। उसने सोचा कि शायद यह बूढ़ा कोई पागल है जो अब भी यहाँ रह रहा है। उसने बूढ़े का इंटरव्यू लेने की सोची।
"बाबा, लोग कहते हैं यहाँ 12:12 पर कुछ होता है?"
बूढ़ा अचानक गंभीर हो गया। "जो देखना चाहते हो, वो देखोगे। पर याद रखना, जो ट्रेन यहाँ से जाती है, उसका कोई अगला स्टेशन नहीं होता।"
इतना कहकर बूढ़ा उठा और अंधेरे में ओझल हो गया। समीर को अजीब सी सिहरन महसूस हुई। उसने कैमरे के लेंस को साफ किया और इंतज़ार करने लगा। अचानक, वातावरण में बदलाव महसूस हुआ। हवा रुक गई। पक्षियों की चहचहाहट जो दूर कहीं सुनाई दे रही थी, वह पूरी तरह बंद हो गई।
जैसे ही उसकी डिजिटल घड़ी पर 12:12 बजा, उसे दूर से एक सीटी सुनाई दी।
काली ट्रेन का आगमन
समीर की धड़कनें तेज हो गईं। यह नामुमकिन था। इन पटरियों पर ट्रेन कैसे चल सकती थी? लेकिन आवाज़ साफ थी। पटरियों में कंपन होने लगा। दूर से एक धुंधली रोशनी दिखाई दी—फीकी और नीली।
एक विशाल, काला इंजन स्टेशन पर आकर रुका। वह भाप वाला इंजन था, जो दशकों पहले चलन से बाहर हो चुका था। ताज्जुब की बात यह थी कि उस भारी-भरकम इंजन के चलने की आवाज़ तो थी, पर उससे कोई धुआं नहीं निकल रहा था।
ट्रेन के डिब्बे पुराने और लकड़ी के बने थे। खिड़कियों से धुंधली रोशनी बाहर आ रही थी। समीर ने अपना कैमरा उठाया और करीब जाने लगा। उसने देखा कि खिड़कियों के पीछे चेहरे थे—पीले, बेजान और स्थिर। वे सब समीर की तरफ देख रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में कोई चमक नहीं थी।
खौफनाक खुलासा
तभी उसे वही बूढ़ा आदमी फिर दिखा। वह हाथ में लाल झंडी लिए खड़ा था। उसने समीर की तरफ देखा और बोला, "एक सीट खाली है, बेटा। तुम्हारे लिए।"
समीर का तर्क और साहस अब जवाब देने लगा था। उसने ज़ूम करके इंजन के पास खड़े गार्ड को देखा। गार्ड का चेहरा देखकर समीर के हाथ से कैमरा छूट गया। वह चेहरा बिल्कुल 'समीर' जैसा था! वही दाढ़ी, वही चश्मा, वही जैकेट।
उसे याद आया कि रास्ते में उसकी गाड़ी का एक छोटा सा एक्सीडेंट हुआ था। उसने सोचा था कि वह बच गया है, लेकिन क्या वह सच था?
उसने कांपते हाथों से अपनी जेब से अपना फोन निकाला। नेटवर्क नहीं था, लेकिन गैलरी में वही आखिरी वीडियो चल रहा था जो वह रिकॉर्ड कर रहा था। वीडियो में समीर स्टेशन की तरफ नहीं जा रहा था, बल्कि उसकी गाड़ी खाई में गिरती हुई दिख रही थी।
अनंत यात्रा
समीर को अब सब समझ आने लगा। वह बूढ़ा आदमी, वह रुकी हुई घड़ी, और वह ट्रेन... वह सब उसकी अपनी हकीकत का अक्स थे।
ट्रेन की सीटी फिर से गूंजी। बूढ़े ने लालटेन जलाई, जो अब नीली रोशनी से जल रही थी।
"चलो बेटा, वक्त हो गया है," बूढ़े ने कहा।
समीर ने अपनी बेजान देह की तरफ देखा जो पटरी के पास गिरी हुई थी। वह अब डर नहीं रहा था, बस एक अजीब सी शून्यता में था। वह धीरे-धीरे ट्रेन के डिब्बे की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने पैर पायदान पर रखा, पूरी ट्रेन धुएं की तरह हवा में विलीन होने लगी।
उपसंहार
अगली सुबह, कुछ गाँव वाले उस स्टेशन के पास से गुज़रे। वहाँ उन्हें एक महंगा कैमरा और एक ट्राइपॉड मिला। कैमरे में रिकॉर्डिंग चालू थी, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ सफेद शोर (Static) और भारी सन्नाटा था।
आज भी देवगढ़ के लोग कहते हैं कि अगर रात को उस स्टेशन पर कोई जाए, तो उसे एक नौजवान हाथ में कैमरा लिए घूमता हुआ दिखता है, जो आज भी अपना 'परफेक्ट शॉट' ढूंढ रहा है।
सीख: कुछ सफर ऐसे होते हैं जहाँ हम अपनी मंज़िल नहीं चुनते, बल्कि मंज़िल हमें चुन लेती है।