Shrapit ek Prem Kahaani - 29 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 29

Featured Books
Categories
Share

श्रापित एक प्रेम कहानी - 29

सोनाली खुश होती हैं और कहती हैं----



>" ये तो बहुत अच्छी बात है। पर बहन क्या एकांश को भी वृंदा पसंद है..? 


मीरा कहती है---

>"वो सब आप हमें छोड़ दिजिये। आप बस शादी की 
तैयारी सूरु किजिये। और हां वृंदा को अभी कुछ दिन यहीं रहने दिजिए। 


सोनाली कहती है---

>" ये खुश खबरी मैं अभी वृंदा के पापा को सुनाती हूं। ठीक है बहन अब रखती हूं। 


इतना बोलकर दोनो फोन कट कर देता है। 
एकांश हवेली पहूँच जाता है और अपने जूटे उतारने लगता है इंद्रजीत एकांश से पुछता है।---


>" अरे बेटा आ गए तुम आज दिन भर कहा रह गए? आज कुछ लोग आए थे तुमसे मिलने अगर तुम रह जाते तो अच्छा होता और तुम्हारा फोन भी पहुंच से बाहर था ।



 एकांश अपने फोन निकाल कर देखता है की उसमें बहुत सारे मैसेज थे जो कॉल ना लगने के कारण से आए हुए थे। एकांश इंद्रजीत से कहता है----


>" वो पापा आज में अपने दोस्तों के साथ बाहर गया था। इसिलिये...! 


एकांश के इतना कहते ही इंद्रजीत कहता है----


>" अरे बेटा ठीक है। मैैने बस तुमसे यूही पूछा और तुमने कह दिया बस काफी है। 



इतना बोलकर इंद्रजीत वहां से जाने लगता है। एकांश एक हल्की मुस्कान से साथ कहता हैं--


>" थैंक्स पापा..! 



तभी वहां पर मीरा आ जाती है और कहती है।
--

>" आपको नहीं जानना पर मुझे जानना है भईया। 


मीरा एकांश की कान को पकड़ कर कहती है---

>" जब से आया है दिन भर गायब रहता है पता नहीं 
कहा रहता है। खाना भी खाया था के नहीं पता नहीं। एक फोन तक नहीं किया सुबह से और ऊपर से तेरा फोन बंद।


 एकांश कहता है-----

>" आह्ह्...आह्ह् छोटी मां लग रहा है। 


मीरा एकांश का काम पकड़कर अंदर ले जाती है और कहती है----


>" आज मैं इसका पूरा खबर लेती हूँ। 


इंद्रजीत हंसकर कहता है----

>" हाँ...बिलकुल खबर लो इसकी। 



एकांश के कान में दर्द हो रहा था तो एकांश अपने चाची से कहता है---

>" आह ... चाची लग रहा है छोडि़ये ना।


 तभी मीना कहती है----


>" ठीक कर रही है तू मीना इसका कान और जोर से मरोड़ ताकि इसे पता चले के घर में बिना खबर किए पूरा दिन बाहर रहने का क्या सजा है। एक तो तु इतने सालों बाद अपने घर वापस आया और आते ही पुरा दिन गायब। 


एकांश दर्द के मारे कहता है---


>" अच्छा चाची, माँ मुझे माफ़ कर दो। पर मेरा वहां जाना जरुरी था काम ही ऐसा था इसिलिए गया था। पर अब वादा करता हूं कहीं जाने से पहले आपलोगो को बता के जाउंगा।



 एकांश के इतना बोले पर मीना एकांश का कान छोड़ देती है। तभी वहां पर संपूर्णा आ जाती है और एकांश से कहती है----


>" पर भैया आप कहा गए थे। क्योंकी गुना और चतुर दौ बार यहाँ आकार गया है और आपका फोन भी नहीं 
लग रहा था। 


-
एकांश कहता है-----


>" वो मैं और आलोक एक काम से बाहर से गया था। बस इसी वजह से दैर हो गई।


 संपूर्णा फिर कहती है---


>" पर भैया आपलोग ऐसी कोनसी जगह गए थे जहां पर आपका मोबाइल का नेटवर्क नहीं था। 


संपूर्णा की बात सुनकर एकांश घबरा जाता है क्योंकी सुंदरवन के बारे में किसी को बता नहीं सकता। एकांश सौच में पड़ जाता है। तभी मीरा कहती है---


>" छोड़ो ना ये सब बातें, एकांश बेटा वृंदा सूबह से तेरा इंतजार कर रही है बेचारी। जाओ जा के मिल लो उसे। 


मीरा की बात सुनकर एकांश कहता है--

>" क्या...? वृंदा यही है। मुझे लगा के सायद अब तक वो अपनी हवेली चली गई होगी।


 एकांश फिर पूछता है--- 


>" पर वो मेरा इंतजार क्यों कर रही है..?


 संपूर्णा गुस्सा से कहती है---

>" क्यूं का क्या मतलब। एक तो बेचारी इतना सालों से बाद यहां आयी है उसे बाहर घुमने का मन था और तुम हो के बकवास किये जा रहे हो। 


तभी मीना कहती है---

>" हां बेटा बेचारी सूबह से तेरा इंतजार कर रही है जा... जा के कहीं से घुमा के लेकर आ।


 एकांश कहता है---


>" पर चाची अभी मैं कहां लेकर जाऊं।


 मीना कहती है---


>" कहीं भी लेकर जा। रेस्टोरेंट लेकर जा। सिनेमा लेकर जा।


 तभी मीरा कहती है----

>" हां बेटा उसे घुमा के लेकर आ। बेचारी सूबह से उदास बैठी है। उसका मन बहल जाएगा। 


इतना बोलकर मीना एकांश को वृंदा के पास भेज देती है। एकांश वृंदा के कमरे मे चला जाता है जहां पर वृंदा लाल रंग के सूट पहनकर उल्टा तरफ मुह किए हुए बैठी थी। वृंदा की सूट बहोत तंग थी जिस वजह से उसकी सूट उसके भरे बदन से चिपक गई थी। एकांश वृंदा के पास आकर कहता है----


>" वृंदा। 


वृंदा बिना कुछ बोले चुप चाप बैठी थी। एकांश फिर से कहता है---


>" वो... वृंदा मुझे थोड़ा काम था इसिलिए आने मैं दैर हो गई। 

वृंदा अब भी चुप बैठी थी। एकांश अपनी बात जारी रखते हुए कहता हैं----

>" वृंदा मुझे पता नहीं था के तुम यहाम रुकी हुई हो 
मुझे लगा के तुम सायद अपने घर चली गई होगी। 



एकांश समझ जाता है के वृंदा काफी ज्यादा नारज है। इसिलिए एकांश वृंदा को मनाते हुए कहता हैं---


>" अगर मुझे पता होता के तुम यही हो तो मैं आज 
कहीं जाता ही नहीं। वृंदा इस बार के लिए सॉरी। वो माँ और चाची कह रही थी के तुम्हें बाहर घुमाने ले जाउ ।


 एकांश में इतना बोलने पर वृंदा एकांश की और मूड जाती है। वृंदा की टाइट सलवार सूट वृंदा को और भी खूबसूरत बना रही थी। एकांश वृंदा को ऊपर से निचे एक तक देखे जा रहा था। वृंदा एकांश की नजर को पढ़ लेती है और नारज होकर कहती है---


>" मुझे कहीं नहीं जाना तुम्हारे साथ। सुबह से एक 
लड़की तैयार होकर बैठी है और तुम्हारा इंतजार कर रही पर तुम्हें उससे क्या तुम जाओ अपना काम करो। तुम्हें तो यही लगा था ना के वृंदा तो घर चली गई होगी। चलो पिछा छुटा । 


एकांश कहता है---


>" अच्छा बाबा इस बार के लिए माफ कर दो। मुझे सच में नहीं पता था के तुम यहां हो वर्ना में आज तुम्हारे लिए जरुर यही रहता।


 एकांश से इतना सुनकर वृंदा खुश हो जाती है। तब एकांश वृंदा से कहती है----


>" वृंदा फिल्म देखने चलें ?


 वृंदा ये सुनकर खुश हो जाती है और कहती है--- 

>" क्या....फिल्म ... सच में ।

 वृंदा झट से एकांश का हाथ पकड़ लेती है और पुछती है---


>" कौन सी फिल्म एकांश? 


एकांश फिल्म का नाम बताता है और फिर दोनो तैयार हो जाता है और फिल्म देखने चला जाता है। एकांश और वृंदा बाइक से जा रहा था। वृंदा एकांश के पिछे बैठी थी। वृंदा का एक हाथ एकांश के कंधे पर था। 


वृंदा अपना हाथ को धीरे-धीरे एकांश के बदन में फिराने लगती है। जिससे एकांश धीरे धीरे बेताबी होने लगता है। वृंदा अपना हाथ एकांश के छत्ती को सहलाने लगता है और एकांश चुप चाप बाइक चलाने लगता है। 


" रास्ता थोड़ा उबड़ खाबड़ था जिस कारण से वृंदा का वक्ष बार बार एकांश के पीठ पर सट रहा था। जिसे दोनो के बदन में हलचल होने लगती है। एकांश को वृंदा का सटना अच्छा लग रहा था इसिलिए एकांश जान बुझकर बाइक को खराब रास्ते पर चला रहा था। ये बात वृंदा को पता चल जाता है। "


और वृंदा को भी एकांश से सटना अच्छा लग रहा था इसिलिए वृंदा जान बुझकर एकांश से अपने वक्ष सटना लगती है और फिर एकांश से चिपक जाती है जिससे दोनो के बदन पर अब जरा सी भी दूरी नहीं थी। 


दोनो उबड़ खाबड़ रास्ते का भरपुर मजा लेटे हुए सिनेमा थियेटर पर पँहुच जाता है और दौनो ही हॉल में कॉर्नर सीट पर जाकर बैठ जाता है। दोनो फिल्म देखने लग जाता है।


 पर तभी एकांश को वर्शाली की याद आती है। वो सौच रहा होता है---

" कास में यह वर्षाली को ला पता तो चल जाता के 
चलचित्र क्या होता है। एकांश इतना सौच ही रहा था कि तभी उसे वहां अपनी राइट साइड की सीट पर जो खाली थी वहां पर किसी लड़की के होने का एहसास होता है।

To be continue....432