अपूर्व ने खिड़की की ओर देखा—जहाँ से वह छाया उसे घूर रही थी।
धड़कनों की रफ़्तार तेज़ होती जा रही थी।
वह धीरे-धीरे खिड़की के पास पहुँचा। पर वहाँ अब कुछ नहीं था। सिर्फ़ सन्नाटा... और हवाओं में बसी एक सिसकी।
“तुम्हारा वक्त खत्म हो चुका है...” ये शब्द उसके कानों में गूंजते रहे।
“पर क्यों?” वो बुदबुदाया ।
“मैंने क्या किया है?”
इसी बीच हवेली के भीतर एक और दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
दरवाज़े के पार एक कमरा था, जिसमें दीवार पर एक पुराना चित्र टंगा था—
रुख़साना और आगाज़ खान का।
अपूर्व ने देखा—चित्र के नीचे एक ताज़ा लिखा हुआ नाम उभर आया था...
“अन्वेषा”
और उसके नीचे—
“वो इश्क जो अधूरा था, अब पूरा होगा ।”
अपूर्व की सांस रुक गई।
हवेली में अब भी सन्नाटा छाया हुआ था । दरवाज़ों के पीछे अब दीवारें साँस लेने लगी थीं, और छतों से बूँदें नहीं, यादें टपक रही थीं।
अन्वेषा कई घंटों से कमरे में थी, लेकिन उसे लग रहा था जैसे समय ठहर गया है। उसके हाथ में में रुख़साना की डायरी थी, लेकिन उसके मन में किसी और का नाम घूम रहा था—फ़रज़ाना।
“वो कौन थी?” वो धीरे से बुदबुदाई ।
“क्यों हर बार उसका नाम डर की तरह उभर आता है?”
वहीं दूसरी तरफ अपूर्व छत से लगी एक पुरानी अलमारी खींच रहा था। एक कोना उसे खींचता जा रहा था, जैसे वहां कोई हलचल हो। अचानक उस कोने की दीवार ढुलक गई—पीछे एक पुराना आईना था।
आईने पर जमी धूल को अपूर्व ने पोंछा—और वो सिहर गया।
आईने में खुद को नहीं, अन्वेषा को देखा, जो उसके पीछे खड़ी नहीं थी।
“अन्वेषा?”
वो पलटा—कोई नहीं था।
आईने में आकृति अब धुंधली होकर बदल रही थी—एक औरत, काले कपड़े, आँखों में आँसुओं की लकीर और होठों पर वो नाम—“आगाज़...”
अपने कमरे में बैठी अन्वेषा अब रुख़साना की डायरी के अंतिम पन्नों तक पहुँच चुकी थी।
“उन्नतीस जुलाई, उन्नीस सौ चौवीस
फ़रज़ाना ने मुझसे कहा था—‘रुख़साना, अगर तुम आगाज़ से निकाह नहीं करोगी तो तो वो मुझे मार डालेगा।’
मैं जानती हूँ कि वो मुझे भी मिटा देगा, क्योंकि मैं उसके प्यार को इंकार कर चुकी हूँ।
पर फ़रज़ाना... वो तो सिर्फ़ मेरे लिए खड़ी हुई थी।
और अब वो ग़ायब है।
क्या वो अब भी ज़िंदा है?
या हवेली के किसी तहख़ाने में कैद उसकी आत्मा चीख़ रही है?”*
अन्वेषा की आँखें नम हो गईं।
“क्या मैं भी वही दोहरा रही हूँ?”
उसके होंठों से निकला, पर आवाज़ जैसे किसी और की थी।
दूसरी तरफ अचानक हवेली के एक कोने से तेज हवा उठी।
किसी के कदमों की आहट।
किसी के ज़ोर से दरवाज़ा पीटने की आवाज़।
अपूर्व दौड़कर उसी तरफ़ गया।
वहां एक दरवाज़ा था, जो सदियों से बंद था ।
आज वो धीरे-धीरे खुल रहा था।
अंधेरे में एक आवाज़ गूँजी—
“तुम लोग मेरे नाम से डरते हो, पर मैंने तो बस सच को ज़िंदा रखने की कोशिश की थी...”
“मैं फ़रज़ाना हूँ।”
तहख़ाने में उतरते ही हवा भारी हो गई। दीवारों पर नाखूनों के निशान थे।
कोने में एक पुराना संदूक था—जिसमें से सड़ती हुई किताबों की बदबू और किसी के आँसुओं की नमी आ रही थी।
अपूर्व ने उसे खोला।
भीतर एक पत्र था—“फ़रज़ाना का पत्र ”
“अगर ये चिट्ठी किसी ज़िंदा इंसान के हाथ लगे
तो जान लो,
रुख़साना की मौत एक इत्तेफ़ाक़ नहीं थी।
आगाज़ ने उसे पाने के लिए नासिर को मरवाया,
पर रुख़साना आत्महत्या नहीं करना चाहती थी।
मैंने उसे छुपा लिया था।
जब आगाज़ को पता चला, तो उसने मुझे बंद कर दिया—
और तबसे मैं यहाँ हूँ।
ज़िंदा, लेकिन नज़रबंद।
अगर मेरी हड्डियाँ कभी किसी को दिखें,
तो समझ लेना—सच आज भी हवेली में दफन है।”*
तभी वहां किसी के कदमों की आहत सुनाई दी । अपूर्व ने पीछे मुड़कर देखा, वो अन्वेषा थी । अन्वेषा ने डरते हुए अपूर्व का हाथ थामा।
उसकी आँखों में आँसू थे, उसने घबराई हुई आवाज में कहा —“क्या हमने उसकी रूह को मुक्त किया?”
और तभी...
आईने में एक हल्की मुस्कान उभरी।
फ़रज़ाना का चेहरा।
कभी ना बोले गए शब्द—अब आईने की दरारों में उभर आए थे।
लेकिन जैसे ही अपूर्व ने मुड़ने की कोशिश की—
एक और चेहरा आईने में उभरा।
आगाज़।
ख़ामोश, पर जलते हुए नेत्रों के साथ।
और तभी एक आवाज गूंजी -
“अब ये कहानी सिर्फ़ तुम्हारी नहीं रही, अपूर्व। अब तुम भी हिसाब दोगे...”
“तुम बहुत देर से आए, अपूर्व…”
ये शब्द जैसे दीवारों में गूंजते हुए आए हों।
हवेली की हवा अचानक भारी हो गई थी। अपूर्व ने चौक कर देखा—कोई नहीं।
“अपूर्व?” अन्वेषा ने उसका हाथ दबाया। “क्या हुआ?”
“तुमने सुना… किसी ने मेरा नाम लिया।”
अन्वेषा ने सिर हिलाया। “नहीं, लेकिन... कुछ अजीब तो है यहाँ।”
अचानक, हवेली की दीवार पर एक अजीब उभार दिखने लगा। जैसे किसी अदृश्य हाथ ने दीवार की परतें खुरचकर एक चेहरा उकेर दिया हो।
चेहरा — आगाज़ ख़ान का — कठोर रेखाओं वाला, क्रूर आँखों वाला, सख्त लेकिन धुआँ-सा।
अन्वेषा ने उसे देखा और काँप उठी—“मैंने इसे पहले भी देखा है… पर कहाँ?”
“सपने में?” अपूर्व ने पूछा।
“नहीं… मेरे भीतर... जैसे कोई टूटी हुई याद।”
दीवारों में से अचानक एक पुराना संगीत गूंजने लगा—सारंगी की धीमी तान। साथ ही किसी औरत की सिसकियाँ।
“ये जगह हमसे कुछ कह रही है।” अपूर्व बुदबुदाया ।
तभी हवेली की सबसे पुरानी खिड़की खुल गई — बिना हवा के। और वहाँ एक छाया खड़ी दिखी—
लम्बी, स्थिर, घूरती हुई।
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन शब्द सीधे दिल में गूंजे—
“तुम्हारा वक्त खत्म हो चुका है... लेकिन फैसला अभी बाकी है...”
अन्वेषा ने अपूर्व की बाजू थाम ली। उसकी हथेली बर्फ-सी ठंडी हो चुकी थी।
“अपूर्व… ये छाया… ये कोई और नहीं… ये मैं हूँ।”
अपूर्व हक्का-बक्का अन्वेषा को देखने लगा ।
“क्या कह रही हो तुम?”
“मुझे नहीं पता कैसे समझाऊँ… पर जब से इस हवेली में आई हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं कोई और बन गई हूँ। जैसे मेरे भीतर कोई और साँस ले रहा हो... कोई जो तुम्हें जानता है… बहुत पहले से।”
तभी हवेली का एक पुराना दरवाज़ा चरमराता हुआ खुल गया।
भीतर से हल्की लाल रौशनी झलक रही थी। दीवारों पर उर्दू में कुछ लिखा था:
“जिसने इश्क़ में खून बहाया, उसे फिर चैन कहाँ…”
और तभी अन्वेषा की नज़र एक पुराने संदूक पर पड़ी।
“मैंने इसे सपने में देखा है,” वो बोली।
संदूक से मिट्टी और इत्र की मिली-जुली गंध आ रही थी। अपूर्व ने संदूक खोला।
भीतर एक पुरानी मखमली डायरी थी। जब अन्वेषा ने उसे खोला, तो एक हवा का झोंका कमरे में फैल गया। जैसे कुछ जाग गया हो।
डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।
हर पन्ने पर नाम थे—
“रुखसाना”
“नासिर”
“आगाज़ ख़ान”
…और आखिरी पन्ने पर—
“अन्वेषा और अपूर्व”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
“हमारे नाम... यहाँ क्यों हैं?” अन्वेषा की आवाज़ कांपी।
“शायद इसलिए कि ये कहानी अभी खत्म नहीं हुई…” अपूर्व बुदबुदाया।
और तभी, कमरे की लाइट झपककर बंद हो गई।