एपिसोड 4 — “मुंबई की नई ज़मीन”
साल 1904। भीमराव अब 13 साल के हो चुके थे। सतारा में उनकी पढ़ाई शानदार रही, लेकिन पिता रामजी मालोजी चाहते थे कि बेटा बड़े शहर में पढ़े, जहाँ शिक्षा के बेहतर अवसर हों।
एक दिन पिता ने कहा—
“बेटा, हम बंबई (मुंबई) चल रहे हैं। वहाँ बड़ा स्कूल है, अच्छे मास्टर हैं। तेरा भविष्य वहीं बनेगा।”
भीमराव ने मुंबई का नाम तो सुना था, लेकिन कभी देखा नहीं था। उनके मन में उत्साह और थोड़ी घबराहट, दोनों थे।
मुंबई की पहली झलक
जब ट्रेन ने मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस पर कदम रखा, तो भीमराव की आँखें चौंधिया गईं—चारों तरफ भीड़, गाड़ियाँ, बड़े-बड़े मकान, और हर तरफ अलग-अलग भाषाएँ बोलते लोग।
“ये शहर तो पूरा अलग ही दुनिया है…” उन्होंने मन ही मन कहा।
वे बाईगाँव (Byculla) इलाके में किराए के एक छोटे से घर में रहने लगे।
अगले ही दिन पिता उन्हें एल्फिंस्टन हाई स्कूल में दाखिला दिलाने ले गए। स्कूल अंग्रेजी माध्यम का था, और वहाँ के बच्चे साफ-सुथरी वर्दी में, चमकते जूतों के साथ आते थे। भीमराव के पास सिर्फ एक पुरानी धोती और कुर्ता था, लेकिन उनकी आँखों में आत्मविश्वास था।
पहला दिन, पहला सबक
कक्षा में मास्टर ने पूछा—
“Who is new here?”
भीमराव ने हाथ उठाया—“Me, Sir. My name is Bhimrao Ramji Sakpal.”
मास्टर ने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया, लेकिन कक्षा में कई बच्चे फुसफुसाने लगे—
“अरे, ये महार है…”
कुछ बच्चों ने उनकी डेस्क के पास बैठने से मना कर दिया। मास्टर ने जबरन बिठा तो दिया, लेकिन माहौल ठंडा ही रहा।
बीच में पीने का पानी रखने का समय आया। सब बच्चे लाइन में लग गए, लेकिन जब भीमराव की बारी आई, पानी पिलाने वाले चपरासी ने कहा—
“तुम्हारा लोटा कहाँ है? हमारे गिलास को मत छूना।”
भीमराव ने गहरी सांस ली, अपना पुराना पीतल का लोटा निकाला, और पानी भरकर पी लिया।
उन्होंने मन ही मन कहा—ये नया शहर है, पर पुरानी सोच यहाँ भी है।
नई चुनौतियाँ
मुंबई में पढ़ाई का स्तर सतारा से कहीं कठिन था—अंग्रेजी साहित्य, गणित, भूगोल सब गहराई से पढ़ाया जाता था।
भीमराव को शुरुआत में कठिनाई हुई, लेकिन उनकी मेहनत रंग लाई। वे रोज़ लाइब्रेरी में घंटों बिताते, पुरानी किताबों को पढ़ते।
उन्हें एक अंग्रेजी वाक्य बहुत पसंद आया—
“Knowledge is the power which can break all chains.”
(“ज्ञान वह शक्ति है, जो सारी जंजीरें तोड़ सकता है।”)
अदृश्य ज़ख्म
एक दिन स्कूल में वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता हुई। भीमराव ने दौड़ में भाग लिया और दूसरा स्थान पाया।
जब इनाम बाँटे गए, तो सब बच्चों को मिठाई एक साथ दी गई, लेकिन भीमराव को अलग से, कागज में लपेटकर।
उन्हें लगा जैसे उनकी मेहनत को भी जात का रंग दे दिया गया हो।
रात को उन्होंने पिता से कहा—
“बाबा, मैं कब तक ऐसे अलग रहूँगा?”
पिता ने गंभीर स्वर में कहा—
“जब तक तू इतना बड़ा न बन जाए कि कोई तेरे आगे जात का नाम लेने से भी डरे।”
सपनों की दिशा
1907 में, जब भीमराव 16 साल के हुए, उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में सफलता पाई—अपने स्कूल में ही नहीं, पूरे इलाके में सबसे अच्छे अंकों में से एक। यह उपलब्धि उनके समुदाय के लिए बड़ी बात थी।
उनके सम्मान में एक छोटा-सा समारोह रखा गया, जहाँ पहली बार उन्हें मंच पर बुलाया गया।
उन्होंने छोटा-सा भाषण दिया—
“अगर हम पढ़ेंगे नहीं, तो हम पीछे ही रहेंगे। शिक्षा ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।”
पहला बड़ा मौका
भीमराव की इस सफलता की खबर बंबई के मशहूर व्यापारी और समाजसेवी सयाजीराव गायकवाड़ (बरौडा के महाराजा) तक पहुँची। महाराजा ने तय किया—वे इस होनहार लड़के को उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति देंगे।
पिता ने जब यह खबर दी, तो भीमराव की आँखें भर आईं।
“बेटा, तेरी मेहनत रंग ला रही है। अब तुझे सिर्फ बंबई नहीं, दुनिया देखनी है।”