VISHAILA ISHQ - 15 in Hindi Women Focused by NEELOMA books and stories PDF | विषैला इश्क - 15

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विषैला इश्क - 15

(सनी, निशा और आद्या जंगल से लौटते हैं, जहाँ आद्या के हाथ पर नाग और निशा के हाथ पर मानव चिह्न उभरता है। घर पहुँचते ही निशा डरते हुए आद्या को सुरक्षित करती है। सनी आद्या की मासूमियत और निशान देखकर आश्चर्यचकित है। आद्या की नीली आँखें और उसके चारों ओर घूमते नाग दिखाते हैं कि वह नागरक्षिका है। नागों को आद्या के आदेश पर मानव रूप में बदलते देख सनी और निशा स्तब्ध रह जाते हैं। निशा कुछ छुपा रही है, लेकिन सनी उसे मजबूर नहीं करता। आद्या की शक्ति ने परिवार के बीच नया विश्वास और गहरा जुड़ाव पैदा कर दिया। अब आगे)

फूत्कारों की आहट

सुबह की हल्की रोशनी धीरे-धीरे होस्टेल के कमरे में घुस रही थी। सभी लड़कियां एक उत्सुक और घबराहट भरे अंदाज़ में उठकर तैयार हो रही थीं। लेकिन आद्या बेपरवाह बिस्तर पर पड़ी हुई थी, जैसे उसे किसी नियम, समय या डांट का कोई डर ही न हो।

तभी, पास की पलंग पर बैठी 17-18 साल की लड़की ने उसे डाँटते हुए कहा, "अद्दु! उठ जा, रोज लेट होती है और रोज डांट पड़ती है। जल्दी उठ!"

आद्या ने करवट बदलकर आंखें बंद कर ली। उसका बेफिक्र अंदाज़ वही था, जो हर रोज़ देख-देखकर सबको थका देता था।

"सुरभि! यह तो रोज की बात है," स्नेहा ने झुककर उसकी तरफ देखा। "चल, वरना इसके चक्कर में हम भी डांट खाएंगे।"

सुरभि की बातें सुनकर आद्या ने धीमे से मुंह बनाया और सोने का इशारा किया। तभी सुरभि ने कहा, "यह एक पुलिस अफ़सर की बेटी है। अंकल जितने एक्टिव और डेडिकेटेड हैं, यह मैडम उतनी ही आलसी और कामचोर!"

सुरभि और स्नेहा बाहर की ओर भागे। आद्या ने उबासी लेते हुए कहा, "अब मैं आराम से सोऊंगी," और बिस्तर पर आराम से लेट गई।

कुछ ही देर में स्नेहा और सुरभि प्रार्थना सभा पहुंच गईं। लेकिन उनकी नज़रें अचानक वहीं ठहर गईं। आद्या पहले से ही लाइन में खड़ी थी। स्नेहा ने हैरानी से कहा, "तू यहाँ कैसे?" आद्या ने आंख मारी और सीधे अपनी जगह में खड़ी हो गई।

प्रार्थना शुरू हुई। सब मौन में थे। लेकिन आद्या को बीच-बीच में कुछ अजीब आवाजें सुनाई दे रही थीं—जैसे नागों की फुसफुसाहट। हवा में एक अलग सी गंध थी, जिसे आद्या पहचानती थी, पर कोई भी और नहीं समझ रहा था। वह थोड़ी घबराई, लेकिन यह नई बात नहीं थी। यह उसकी रोज़मर्रा की रहस्यमयी दुनिया का हिस्सा थी।

प्रार्थना के बाद स्नेहा ने आद्या की ओर देखकर पूछा, "अबे! इतनी जल्दी यहाँ कैसे पहुँच गई?"

आद्या ने बाल झटकते हुए मुस्कुराई, "भूल गई? मैं एक एक्टिव और डेडिकेटेड फॉरेस्ट अफ़सर की बेटी हूँ!"

सुरभि झल्लाकर बोली, "चल हट! एक्टिव तू नहीं, तेरे पापा हैं। तू तो गधे के कान पर बैंड बजा दे, तब भी न उठे!"

इस पर आद्या और स्नेहा ठहाका मारकर हंस पड़ीं।

क्लासरूम में जैसे ही आद्या घुसी, उसकी हँसी गायब हो गई। सामने मिस सक्सेना खड़ी थीं। होंठों पर हल्की मुस्कान थी, पर आँखों में चेतावनी का बोर्ड चमक रहा था।

"गुड मॉर्निंग, मैम!" सबने जल्दी से सीट पकड़ी।

मिस सक्सेना ने बोर्ड पर लिखा और बेहद नपी-तुली आवाज़ में पढ़ाने लगीं। हर शब्द नींद का जहर था। कुछ ही मिनटों में पूरी क्लास चुप हो गई, और आद्या धीरे-धीरे अपनी किताब पर सिर रखकर सो गई।

जब मिस सक्सेना क्लास से बाहर गईं, तो सबने राहत की साँस ली। सुरभि झुककर आद्या को हिलाती हुई बोली, "उठ जा महारानी! परीक्षा सिर पर खड़ी है और तू सपनों में घूम रही है।"

आद्या ने आँखें मसलते हुए कहा, "तो पढ़ लें। मैं किताबों पर थोड़ी न सो रही हूं।"

पूरी क्लास हँसी में फट गई।

....

शाम का समय था। सड़क किनारे स्नेहा और सुरभि मस्ती में बातें करते हुए घर लौट रही थीं। हवा ठंडी थी, और आसमान सुनहरी छाया में डूबा हुआ।

तभी अचानक एक तेज़ बाइक की आवाज़—"ब्रर्र्रर्र…!"—उनके कानों में गूंज उठी।

एक लड़का तेजी से आया और स्नेहा के दुपट्टे को खींचकर उसे अपनी बाइक पर घसीटने लगा। "स्नेहा!" सुरभि चीख पड़ी, डर और चिंता उसकी आवाज़ में स्पष्ट थी।

सुरभि दौड़ी, लेकिन दूरी पर रुक गई। तभी सीन बदल गया।

आद्या सामने खड़ी थी—बिल्कुल निडर। उसकी आँखें नीली चमक रही थीं और चेहरा गुस्से से तना हुआ था।

बाइक झटका खाई—क्योंकि आद्या ने उसे एक हाथ से रोक रखा था। उसकी आवाज़ भारी और गूंजती हुई थी—"छोड़ उसे!"

लड़का कांपने लगा। डर के मारे उसने स्नेहा को छोड़ दिया। आद्या फिर बोली, "उतर बाइक से!"

लड़का हकबका कर वहीं रुक गया। आद्या ने बाइक को दोनों हाथों से उठाकर ज़ोर से पटक दिया। बाइक ज़मीन से टकराकर बिखर गई। आद्या को देख लग रहा था कि उसने एक तकिया उठाकर फेंका है।

उसने लड़के को एक नज़र देखी—ऐसी चेतावनी, कि लड़का बिना पीछे देखे भाग खड़ा हुआ।

सुरभि भागकर स्नेहा के पास आई। "स्नेहा! तू ठीक है न?"

स्नेहा हल्का सा सिर हिलाते हुए जवाब दी। उसका हाथ छिल गया था और कपड़े फटे हुए थे।

आद्या थोड़ा पीछे हट गई। डर था कि कहीं उनकी दोस्ती में डर न पैदा हो जाए।

लेकिन सुरभि मुस्कुराई, "Don't worry… हम किसी को कुछ नहीं बताएंगे।"

आद्या की आँखों में राहत की चमक आई। वह स्नेहा के पास गई, हाथ पकड़कर बोली, "थैंक्स, स्नेहा! चल… मरहम पट्टी करवाते हैं।"

तीनों सहेलियां आगे बढ़ीं। एक के हाथ में दोस्ती थी, एक के पास जख्म, और एक के भीतर छिपी हुई शक्ति—जो अब और ज्यादा उजागर होने वाली थी।

कमरे में हल्का अंधेरा था। खिड़की से छनकर आती स्ट्रीट लाइट की रोशनी आद्या के चेहरे पर पड़ रही थी। वह चुपचाप बैठी थी—आंखें खोई हुईं, उंगलियां आपस में उलझी हुईं। माथे पर गहरी सोच की लकीरें थीं।

तभी दरवाज़ा चरमराया। स्नेहा धीरे से आई। "क्या हुआ? इतनी चुप क्यों है?"

आद्या ने गहरी सांस ली। "यही सोच रही हूं कि… यहाँ लड़कियों के साथ जो हो रहा है, वह अब बढ़ता जा रहा है। आज जो हुआ… अगर मैं वहाँ नहीं होती तो…"

वह बात अधूरी छोड़ दी।

स्नेहा पास आकर बिस्तर के कोने पर बैठ गई। "तो चल, वार्डन को बताते हैं।"

आद्या ने सिर हल्के से हिलाया—न हां, न ना। "बताना तो चाहिए… लेकिन होगा क्या? वही घिसे-पिटे सवाल… CCTV देखा? टाइम क्या था? कपड़े कैसे थे? और फिर वही सलाह—'शाम के बाद बाहर मत निकलो।' लड़कियों की आज़ादी की नहीं, पाबंदियों की बात होती है यहां।"

दोनों चुप रहीं। फिर स्नेहा मुस्कुराई, "पर तू… तू अलग है, आद्या। आज जो तूने किया… कोई और नहीं कर सकता था। तू कोई आम लड़की नहीं है, है ना?"

आद्या की आंखें चमकीं। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं हूं ही इतनी स्पेशल।"

स्नेहा हंसते हुए उसे गले लगाई। तभी हवा में अजीब-सी सरसराहट गूँजी। जैसे कोई पुरानी चेतावनी भीतर घुस आई हो।

आद्या का चेहरा सख्त हो गया। कानों में वही सर्प जैसी फुसफुसाहट गूँजने लगी। इस बार आवाज़ बाहर से थी।

खिड़की की ओर झटके से देखा—अंधेरे में कई नागमानव खड़े थे। लंबे, सर्प-जैसे चेहरे… गहरी नीली आँखें… चमकती देहें।

आद्या डरी नहीं। यह दृश्य उसके लिए नया नहीं था। बचपन से यही होता आया था।

उसने अपने हाथ की ओर देखा। नागचिह्न चमक रहा था—चमकीली हरी रोशनी में नाच रहा था, जैसे किसी पुकार का जवाब दे रहा हो।

"आद्या?" स्नेहा ने कंधे पर हाथ रखा। आद्या ने झटके से खुद को सामान्य किया, चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाई—"कुछ नहीं… नींद शायद पूरी नहीं हुई है।"

फिर खिड़की की ओर देखा—अब वहां कोई नहीं था। पर फुसफुसाहट अभी भी कानों में गूंज रही थी। यह बुलावा बन चुकी थी।

आद्या नहीं  जानती थी कि कुछ बड़ा शुरू होने वाला है।

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1. आद्या के हाथ पर चमकता नागचिह्न—क्या यह सिर्फ उसकी बचपन की यादों की झलक है, या अब उसकी छिपी हुई शक्तियों का असली इशारा?

2. खिड़की के बाहर खड़े नागमानव—क्या वे आद्या को किसी खतरनाक मिशन के लिए बुला रहे हैं, या उनके इरादे कुछ और हैं?

3. आद्या की नीली आँखों और डर न मानने वाले स्वभाव—क्या यही उसकी असली पहचान का रहस्य खोलने वाली कुंजी है, या आगे कोई बड़ा झटका आने वाला है?

आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए "विषैला इश्क"