Ishq aur Ashq - 54 in Hindi Love Stories by Aradhana books and stories PDF | इश्क और अश्क - 54

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इश्क और अश्क - 54



अब रात्रि बाजार से होकर दूसरी ओर अपनी सवारी मंगवाती है, और बैठकर आगे बढ़ने लगती है।

सवारी अभी कुछ ही दूर पहुँची थी कि अचानक एक शख्स सामने आकर खड़ा हो गया, और पालकी के आगे सिर झुका कर बैठ गया।

आगे खड़े रक्षक ने पूछा —
"ए! कौन है तू? दिख नहीं रहा, शाही सवारी है? हट जा यहाँ से!"

शख्स ने सिर झुकाए कहा:
"मैं एक फरियादी हूँ जनाब… राजकुमारी से गुज़ारिश करने आया हूँ, और मदद की उम्मीद रखता हूँ।"

रक्षक ने तलवार निकालते हुए कहा —
"ऐसे छलावे तो हमने बहुत देखे हैं शाही सवारियों में..."

वो शख्स अब भी विनती कर रहा था —
"बस एक बार... एक बार राजकुमारी से मिलने की दरख्वास्त है।"

राजकुमारी प्रणाली ने बाहर का शोर सुना और पालकी को ज़मीन पर रुकवाकर बाहर आई।

"ये सब क्या हो रहा है?" उसने तेज़ आवाज़ में पूछा।

रक्षक: "राजकुमारी, आपको खतरा हो सकता है। ये कोई बहुरूपिया भी हो सकता है।"

शख्स (गिड़गिड़ाते हुए): "नहीं राजकुमारी... मैं बस एक फरियादी हूँ, और आपसे मदद की उम्मीद है।"

प्रणाली धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी।

रक्षक: "राजकुमारी...!"
प्रणाली ने हाथ उठाकर उसे चुप करा दिया।

वो उसके पास जाकर, आवाज़ में नरमी लाते हुए बोली —
"बोलो... क्या फरियाद है तुम्हारी?"

शख्स:
"मेरी एक दोस्त थी… जिससे मैं बिछड़ गया। और जब हालात सँभालकर वापस लौटा, तो उसने मुझे पहचानने से ही इंकार कर दिया।
या तो आप मेरी दोस्ती लौटा दीजिए, या फिर उसे सज़ा दिलवा दीजिए।"

प्रणाली कुछ सोचती है और कहती है —
"उसकी कोई पहचान बताओ... हम बात करेंगे।"

शख्स:
"वो फूल बेचती है... बात-बात पर रो देती है... खंजर रखती है, लेकिन लड़ाई में कच्ची है।"

ये सुनकर प्रणाली के चेहरे का रंग बदल गया। ये बातें उसे जानी-पहचानी लगीं।
उसने तुरंत एक सिपाही की तलवार निकाली और उस शख्स की गर्दन पर रख दी।

"कौन हो तुम...? चेहरा दिखाओ!"

शख्स धीरे-धीरे गर्दन उठाता है...

जैसे ही चेहरा सामने आता है, प्रणाली के हाथ से तलवार छूट जाती है।
उसकी आँखों में चमक आ जाती है।

"वर्धांन....!"

वो आगे बढ़ने ही वाली थी, लेकिन सिपाहियों को देखकर ठिठक गई।

वर्धांन तलवार उठाकर उसे देने लगा। दोनों झुकते हैं एक साथ।

वर्धांन: "बात करना चाहती हो मुझसे?"

प्रणाली: "हम्मम..."

वर्धांन (धीरे से): "तो भरोसा रखना... कुछ गलत नहीं करूंगा।"

अगले ही पल, वर्धांन ने प्रणाली को पकड़ कर घुमाया और उसकी गर्दन पर तलवार रख दी।

सारे सिपाही तुरंत तलवारें निकाल लेते हैं।

वर्धांन:
"अगर अपनी राजकुमारी की सलामती चाहते हो तो... ये तलवारें नीचे कर दो।"

सिपाही झिझकते हुए तलवारें नीचे कर देते हैं।

वर्धांन:
"और हाँ, इसमें से एक घोड़ा मुझे चाहिए।"

प्रणाली (अचंभित): "ये... ये क्या कर रहे हो? छोड़ो मुझे!"

वर्धांन (मुस्कुराते हुए): "घबराइए मत। आज से... बल्कि अभी से, आप मेरी ज़िम्मेदारी हैं।"

वो घोड़े पर बैठता है और हाथ आगे बढ़ाता है।

"अगर मन में संकोच है तो हाथ छुड़ाकर भाग जाइए... वरना अगर मैंने खींचा, तो फिर मेरे साथ बैठना पड़ेगा।"

प्रणाली सिपाहियों और वर्धांन के बीच देखती है… कुछ समझ नहीं आ रहा।

"मैं राज्य की होने वाली रानी हूँ... मैं ये नहीं कर सकती," वो मन में सोच रही थी।

लेकिन जैसे ही वर्धांन ने हाथ खींचा... प्रणाली बिना कुछ सोचे-समझे उसके साथ बैठ गई।

घोड़े की लगाम खींचते ही वो हवा से बातें करने लगे।

प्रणाली उसे देखती ही जा रही है —
"मैं कैसे उसके साथ आ गई? मैं तो उसे ठीक से जानती भी नहीं..."

लेकिन न जाने क्यों...
वर्धांन का पास होना, उसके इतने करीब होना, उसे सुकून दे रहा था।
जैसे कुछ भी गलत नहीं होगा।

घोड़े की रफ्तार थमती है... वर्धांन एक सुनसान जगह पर उतरता है।
राजकुमारी को उतारने के लिए एक हाथ आगे बढ़ाता है, और घुटने मोड़कर नीचे बैठ जाता है।

प्रणाली उसके इस अंदाज़ पर मोहित हो जाती है।
वो उसका हाथ थामती है और नीचे उतरती है... लेकिन गुस्सा भी दिखाना था।

नीचे उतरते ही वो उसका हाथ झटक देती है।

प्रणाली (गुस्से में): "तुम पागल हो क्या? ऐसे कैसे अगवा कर सकते हो मुझे?"

वर्धांन (हल्की मुस्कान के साथ): "मैंने तो आपको मौका दिया था, राजकुमारी!"

प्रणाली कुछ पल चुप रही।

अब वर्धांन गुस्से में बोला —
"गुस्सा और नाराज़ मैं होना चाहिए! तुम कैसे भूल गई मुझे?"

प्रणाली (तेज़ी से):
"मैं भूली या तुम भाग गए थे?
क्या कहा था तुमने? ‘कल यहीं मिलूंगा... सही सलामत’।
और फिर वो ख़त...?”

वर्धांन:
"हो सकता है... मैं फँस गया होऊं! ये सोचा तुमने कभी?"

प्रणाली अचानक कुछ याद करती है —
"अरे हाँ... तुम्हें तो चोट लगी थी ना..."