संजना ने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसकी पलकों पर कुछ बूंदें ठहर गई थीं, जो बारिश की थीं या उसके मन की उलझनों की, वो खुद नहीं जानती थी।
हर्षवर्धन ने धीरे-धीरे उसे अपनी बाहों में समेट लिया। संजना ने कोई विरोध नहीं किया, बस अपनी उंगलियां उसकी शर्ट में भींच लीं। उसके गर्म सांसों की तपिश हर्षवर्धन के गीले सीने से मिल रही थी। हवाएं अब भी तेज़ थीं, मगर दोनों के बीच एक सुकून भरी खामोशी थी।"मैंने बहुत इंतज़ार किया है इस पल का, संजना…" हर्षवर्धन ने फुसफुसाया।संजना ने अपनी आंखें खोलीं और हर्षवर्धन के चेहरे पर अपनी उंगलियां फेरने लगी। "कभी सोचा नहीं था कि तुम्हारी बाहों में आकर मुझे सुकून मिलेगा…"
हर्षवर्धन मुस्कुराया। "क्योंकि अब मैं वही हर्षवर्धन नहीं हूँ जो तुमसे दूर भागता था। अब मैं तुम्हें थामना चाहता हूँ, ज़िन्दगी भर के लिए।"
बारिश अब धीमी हो गई थी, मगर हवाएं अब भी चल रही थीं। हर्षवर्धन ने धीरे-धीरे अपने होंठ संजना के माथे से नीचे लाए, उसकी गीली पलकों पर एक हल्का सा चुंबन दिया, फिर उसके गालों को छूते हुए उसके कांपते होंठों के करीब आ गया।
संजना की धड़कन तेज़ हो गई। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और खुद को हर्षवर्धन के करीब महसूस किया। और फिर… वो पल आ गया, जब उनकी सांसें एक-दूसरे में घुलने लगीं, जब हर्षवर्धन ने हल्के से उसके होंठों को अपने होंठों में समेट लिया।संजना ने खुद को उसके प्यार में डूबने दिया। हर्षवर्धन की उंगलियां उसकी कमर के चारों ओर कसती चली गईं, और संजना ने अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं। यह पहली बार था जब दोनों ने खुद को एक-दूसरे के सामने पूरी तरह खोल दिया था।
झील के पानी में चाँद की रोशनी झिलमिला रही थी, और उसके किनारे पर खड़े दो दिल अपनी तकलीफों से परे, एक नई मोहब्बत में खुद को डूबो रहे थे। यह बारिश सिर्फ़ मौसम की नहीं थी, यह वो बारिश थी, जिसने उनके रिश्ते के पुराने दर्द को धो दिया और एक नए, खूबसूरत एहसास को जन्म दिया।
अब उनकी मोहब्बत की यह बारिश कभी नहीं थमेगी...
जैसे ही हर्षवर्धन के फोन की घंटी बजी, दोनों अपनी कल्पनाओं की दुनिया से बाहर आ गए। उन्हें एहसास हुआ कि वे क्या-क्या सोचने लगे थे। माहौल में अचानक एक अजीब-सी गंभीरता आ गई। वही दूसरी तरफ उसी समय, संजना के बगल में खड़ा शख्स, जो अब तक चुपचाप सब देख रहा था, ध्यान खींचने लगा। वह लंबा, गठीला और आत्मविश्वास से भरा हुआ था। उसकी आंखों में गहरी समझदारी झलक रही थी। उसकी प्रभावशाली पर्सनैलिटी देखकर संजना की तीनों सहेलियां एकदम चौकन्नी हो गईं और झटके से सोफे से उठ खड़ी हुईं।
लवली, जो उसकी पर्सनैलिटी से सबसे ज्यादा प्रभावित दिख रही थी, कुछ संकोच और हैरानी के साथ बोली, "ये... कौन हैं?"
उस व्यक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ अपना परिचय दिया, "हाय, मैं डिटेक्टिव विशाल। मुझे यहां संजना के डैड ने भेजा है। मैं यहीं रहकर संजना का पता लगाऊंगा।"
यह सुनकर सुषमा मासी थोड़ा परेशान हो गईं। उन्होंने संदेह भरी नजरों से विशाल को देखा और सवाल किया, "अगर संजना के डैड को चिंता थी, तो वे खुद क्यों नहीं आए?"
विशाल ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उनकी तरफ देखा और शांत स्वर में कहा, "क्योंकि अब मैं यहां हूं... और जब मैं हूं, तो किसी और की जरूरत नहीं है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। विशाल की बातों में इतना यकीन था कि कोई भी कुछ कह नहीं पाया। अब सबकी नजरें बस उसी पर टिकी थीं... "लवली विशाल को ही देख रही थी | मन ही मन उसका नाम लेकर आंहे भर रही थी सोच रही थी कि विशाल कितना हंडसम है |