(भाग 7)
आज मैं क्षमा के यहीं से फ्रेश होकर आया था इसलिए आकर सीधा पैकेट बनाने बैठ गया और 9-10 बजे तक आज का सारा डिस्पैच तैयार कर लिया। क्योंकि 20 पत्रिकाओं से अधिक के पैकेट बनाना फिजूल था। इस शाखा में उस पर काम की अधिकता थी। एकल खिड़की थी- इसी पर किस्तें जमा होतीं, बिल जमा होते, आसपास के दो-तीन दफ्तरों की डाक-डिस्पैच और यहीं पर डाक सामग्री की खरीद भी।
उसके सहयोग के लिए सिर्फ एक प्यून था...! तो इसी बात का ख्याल रखना था कि 20 से अधिक पैकेट न हों, नहीं तो उस पर भार बढ़ जाएगा। सोचेगी, पत्रिका में सहयोगी संपादक बना लिया तो ये बेगार कराने लगे। खाना तो खा ही रहा हूँ, ऊपर से वर्क ओवरलोड और।
यों जल्दी तैयारी हो गई तो आज समय से पहुंच भी गया। मगर किस्मत ने साथ नहीं दिया। आज तो वह इतनी व्यस्त थी कि सर उठाने की फुर्सत न मिल रही थी। और मैं चाहता था कि उसकी मदद करूँ पर कर नहीं सकता था। क्योंकि उसके बाजू में चेयर डालने तक की जगह न थी। एक तरफ तराजू, दूसरी तरफ कम्प्यूटर। आगे डेस्क जिसमें डाक-सामग्री। पीछे अलमारी में कैश, बचत-पत्र, बॉन्ड आदि।
सामने बैठ देख सकता था, सो देखता रहा। जब लंच-ब्रेक हुआ तब वह मुस्कुराई, आइये!' और मैं उस दूसरी वाली टेबिल पर पहुंच गया।
क्षमा ने प्याज के परांठे बनाये थे, जिन्हें हमने अचार के साथ बड़े स्वाद से खाया। पानी पिया और लम्बी डकार ली। उसके बाद काउंटर पर पहुंच उसने कहा, अब लाइये, दीजिए।' और मैंने बढ़कर बंडल काउंटर पर रख दिया तो बारकोड का एक स्ट्रिप दराज से निकाल कर दे दिया, जिसे मैंने मुस्करा कर ले लिया और प्रत्येक पैकेट पर लगा-लगा उसे देने लगा।
बुकिंग हो गई तो रसीदें ले, पेमेंट दे मैं फिर से कुर्सी पर आ बैठा। आज मैंने नहीं पूछा कि, चलूँ?' कामकाजी मां के पास स्कूल से लौटे बच्चे की तरह बैठा रहा।
जब छह बज गए, उसने कल की तरह अपना कंप्यूटर बंद किया और बैग उठा कर चल दी। स्कूटी निकाल स्टार्ट की और उसके बिना कहे आज मैं शुभ की तरह पीछे बैठ गया।
रास्ते में अच्छा लग रहा था। छोटे बच्चे की तरह ही मैं उत्सुकता पूर्वक इधर-उधर ताक-झांक करता सोच रहा था, अगले जनम में इसी की कोख से जनम लूं तो कितना अच्छा रहे! और इन्हीं ख्यालात में घर कब आ गया, पता नहीं चला।
घर आकर उसने ताला खोल स्कूटी अंदर रखी और बिना कुछ कहे-सुने वॉशरूम के अंदर चली गई, क्योंकि वहां शायद सुविधा न थी और वह गोया देर से वेग रोके हुए थी। मैं सोफे पर आकर बैठ गया। वॉशरूम जब खाली हो गया, मैं भी अंदर गया, फ्रेश होकर आया, हाथ मुंह धोया और इत्मीनान से फिर उसी सोफे पर आकर बैठ गया।
अब तक वह सब्जी की टोकरी लेकर सब्जी चुनने बैठ गई थी। आज नहीं पूछा, क्या खाना पसंद करोगे' जैसे मनोभाव पढ़ लिए हों, कल ही। आलू-टमाटर काट लिए। मैंने देखा तो मुस्कुराई, शुभ को बड़े पसंद थे। बिना नागा रोजाना खिलाये जाओ; कभी टमाटर-आलू, कभी मठा के आलू, कभी बैंगन-आलू, बड़ी-आलू... कुछ भी बनाओ, आलू जरूर मिलाओ! कढ़ी में भी आलू डलवा लेता था। और दोपहर में रोजाना दाल-चावल...'
और आज मैंने कह दिया, ऐसी तो कुछ मेरी आदत है!'
'हाँ, जानती हूँ...' वह फिर मुस्कुराई।
और मैं खयालों में गुम हो गया, कि अगले जन्म में या तो तुम पक्के में मेरी बेटी बनोगी या फिर मैं तुम्हारा बेटा।
सब्जी काट वह कब किचन में चली गई, आज मुझे पता भी नहीं चला! जब कुकर की सीटी सुनाई पड़ी, मैं चौंका। और तब पीछे आया। अब तक तो उसने आटा भी लगा लिया था।
उसके बाद जल्दी-जल्दी रोटियां सेंक लीं।
लौटकर मैंने टेबल बिछा दी। पानी का जग रख दिया। वह दोनों थालियां लगाकर कमरे में ले आई।
कल की तरह ही साथ-साथ बैठकर खाने के बाद उसने रसोई समेटी और उसके बाद पूछा, चाय पियेंगे?'
'पी लूंगा, थोड़ी देर बाद...' मैंने कहा।
तब थोड़ी देर वह कमरे में चहलकदमी करती रही। उसके बाद किचन में गई, चाय बनाकर ले आई।
यह सब करते आज फिर ग्यारह बजे गए। पर आज मैंने नहीं कहा कि, अब चलूंगा।'
चाय पीने के बाद आज वह भी चुपचाप शुभ के स्टडीरूम में चली गई। नहीं कहा, नींद को सुरखाब के पर लग गए हैं!'
पर मैं तो यह अच्छी तरह जानता था कि आज वो खुद को, या मुझे धोखा देने कोशिश कर रही है... एक घण्टे बाद भी कमरे की बत्ती नहीं बुझी, झांकने चला गया; टॉप से टिकी, आंखें खोले बैठी वह जाग रही थी।
निकट पहुंच, यकायक हाथ उसके सर पर रख डांट-सी पिलादी मैंने, चलो सोओ तो अब...!'
सुनकर आंखों में झांकने लगी, कैसे?' जैसे पूछती हो!
'चलो, सो-ओ' बेड पर चढ़ घुटनों के बल झुक एक हाथ गर्दन के पीछे और दूसरा घुटनों के नीचे डाल मैंने उसे नीचे खिसकाते हुए कहा। जैसे, अब समझ में मुझे आ गया था कि- करना क्या है!
'तुम बच्ची की तरह पिट कर ही सोओगी!' मैंने अपनत्व भरे गुस्से में कहा और उसके सर पर हाथ रखकर लेट गया। जैसे, बच्ची को सुलाता था...।
और यों उसके बालों में अपनी उंगलियों से कंघी करते-करते मैं खुद कब सो गया, पता नहीं चला। जबकि वह तो मुझसे पहले ही सो चुकी थी...गोया इस तरह सोना-सुलाना अब हमारे लिए कोई संकोच की बात नहीं रह गई थी। पर नींद की मदहोशी में कब उसने अपनी टांग उठाकर मेरी कमर में डाल ली और मैंने कब उसके सीने पर हाथ डाल दिया, पता नहीं चला।
बरसों से स्त्री देह के संपर्क में न था, उसका स्पर्श भूल गया था तो देह अंगड़ाई लेना भूल गई थी। मगर आज उससे चिपट कर सोने से इरेक्शन मजबूत हो गया। और यह तब होता है जब यौनिक उत्तेजना से पुरुषांग में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है।
सोते-सोते सांसें तेज-तर-तेज होती चली गईं। स्वप्न भी आने लगा सहवास का। ओठ ओठों से जुड़ गए और मैं उन्हें चूसता हुआ उसके ऊपर भी आ गया!
फिर स्वप्न भंग गया और नींद भी। मगर मैं अपने आप को उसके ऊपर से हटा नहीं पा रहा था। जैसे, होश के आंख-कान मुँद गए थे जिससे अब मुझे उसमें अपनी बेटी नहीं, महज एक औरत दिख रही थी। पुरुषांग का उवाल दूध-सा बढ़ता ही जा रहा था...और आवेग में मैं उसे बेपर्दा कर भोगने ही वाला था कि चूहे ने किचन में कुछ जोर से गिरा दिया और मैं काँपकर भाग खड़ा हुआ।
लाज बच गई, जो वह जागी नहीं। मुख्य कक्ष में आ, बेड पर सिकुड़ गया। नींद तो नहीं आई पर सुबह तक सोने का बहाना किये पड़ा रहा। जब वह चाय लेकर आई और जगाया, तब मैंने कहा, आज तो बहुत देर हो गई।' क्षमा बोली, कोई बात नहीं, डेढ़ बजे आ जाना। लंच ब्रेक के बाद काम कर लेंगे।'
●●