ना शिकवा था लबों पर, ना कोई दिखावा था,
हाथों में जलती लौ थी, कलाई पर लाल कलावा था।
वो चुपचाप नदी के तट पर, जाने क्या लिख रही थी,
एक नन्हे से दीपक में, शायद पूरी दुनिया रख रही थी।
नदी की बहती लहरें भी, पल भर को ठहर-सी गईं,
जब उसकी हथेली से कुछ सुनहरी किरणें उतर सी गईं।
वो दीप नहीं था केवल, कोई ख़्वाब बह रहा था,
अँधेरी रात के सीने में, कोई जवाब बह रहा था।
कलाई पर बँधा वो धागा, अटूट विश्वास की निशानी था,
हथेली से छूटा वो दीपक, किसी मासूम मन्नत की कहानी था।
लहरों ने भी बड़े अदब से, उसे अपने आगोश में लिया था,
जैसे उस नन्हे चिराग़ से, सदियों पुराना कोई रिश्ता रहा था ।
झुकी पलकों के साये में, अटूट यक़ीन समाया था,
शीतल जल के दर्पण पर, उसका चेहरा नूर बन आया था।
दूर तलक वो दीपक फिर, लहरों के संग बहता गया,
रात के गहरे सन्नाटे में, उम्मीद का रंग भरता गया।
जो बात लबों तक आकर भी, कभी न जा सकी कही,
वो बात उस जलते दीये ने, सीधे नदी से जाकर ही कही ।
कुछ ख़्वाब थे जिन्हें उसने, उस रोशनी के साथ बहाया,
कुछ नाम थे जिन्हें उसने, अपनी दुआओं में छुपाया।
और जब वो दीपक आँखों से, दूर कहीं खो गया,
न जाने क्यों लगा मुझे—
जैसे उसका अपना कोई,
उसके दिल के और क़रीब हो गया।
दृश्य: घाट के दूसरी तरफ़ से 🌊🪔
Credit : किसी की तस्वीर 😊