कहते हैं, ज़िंदगी समर्पण का नाम है,
थोड़ा समझौता, थोड़ा सामंजस्य,
और बहुत सारी समझदारी का नाम है… 🌿
मगर एक सवाल है—
इन सारी समझदारियों की उम्मीद
हर बार औरत से ही क्यों की जाती है? 🤔
बड़ी बहन हो—
“तुम बड़ी हो, तुम समझ जाओ।”
छोटी बहन हो—
“तुम छोटी हो, तुम संभल जाओ।”
बेटी हो—
“घर की इज़्ज़त हो, थोड़ा समझदारी से चलो।” 🏠
बहू हो—
“नया घर है, तुम समझदारी दिखाओ।”
बीवी हो—
“रिश्ता निभाना है, तुम समझो।” 💍
माँ हो—
“बच्चों के लिए तुम्हें संभलना होगा।”
और सास हो—
“अब तुम घर की बड़ी हो, तुम्हें ही समझदारी रखनी होगी।”
भूमिकाएँ बदलती रहती हैं,
उम्र बदलती रहती है,
मगर अपेक्षा अक्सर वही रहती है—
“तुम औरत हो… तुम समझ जाओ।” 🌸
मगर कभी ये क्यों नहीं कहा जाता—
“तुम आदमी हो… तुम भी समझो।”
“तुम भी संभलकर चलो।”
“तुम भी अपने हिस्से की समझदारी निभाओ।” ⚖️
क्योंकि समझदारी का कोई लिंग नहीं होता,
समझौता किसी एक की जिम्मेदारी नहीं होता,
और रिश्तों को निभाने की समझ
सिर्फ़ औरतों की विरासत नहीं है।
अगर समझदारी ज़रूरी है,
तो वह दोनों से अपेक्षित होनी चाहिए।
हर बार औरत ही क्यों समझे?
कभी आदमी से भी तो कहा जाए—
“तुम समझो।” 🌿
~अनामिका✍️