कविता - श्राद्ध पक्ष
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा
आता है हर वर्ष क्वार में,
पूर्वजों के तर्पण के लिए श्राद्ध पक्ष,
महिमा बड़ी है इन 16 दिनों की,
सोलह तिथियाँ सभी पूजी जातीं।
सबका सम्मान करें, सब है समान,
सनातन धर्म यही सिखलाता,
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
सबका अपना महत्व,
सबको पूजा जाता,
यह हमारे सनातन की परंपरा है,
नदी, पर्वत, अग्नि या हो धरा,
सबके प्रति कृतज्ञता, धन्यवाद करो।
शायद इसीलिए ऋषि मुनियों ने,
सोलह तिथियों के निमित्त,
बनाए दान-तर्पण के पर्व।
बिना श्रद्धा के किया तो सब व्यर्थ,
करने से पहले जानो इनका अर्थ,
कुछ मूर्ख अभिमानी करते हैं दिखावा,
जीवित माँ-बाप को पूछते नहीं,
मरने के बाद दान कर छुपाए कर्म,
पाप कर्म जो कभी छिपता नहीं,
सत्य कभी झुकता नहीं।
समय रहते कर लो,
सेवा अपने मां-बाप की,
ले लो दुआएं मां-बाप की,
इहलोक भी सुधरेगा,
और परलोक भी।
है सार्थक तभी दान-तर्पण,
जब मां-बाप खुश हैं इस धरा पर,
करो पूर्वजों का आभार,
जिनके वंशज हो तुम,
मिलेगी मुक्ति उनको,
और सुख शांति तुमको भी।
उड़ो चाहे कितना भी,
छू लो तुम सारा आकाश,
पर मत भूलो जड़ों को अपनी,
यही है जीवन का आधार।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com