लिहाफ़ के पीछे
ढँके हुए लिहाफ़ में पुरुष जब कहीं जाता है,
किसी की रूह को रौंदकर आता है।
बड़े नाम वाला है,
अपना नाम तो आराम से बचा जाता है,
किंतु एक रूह का नाम तक मिट जाता है।
सफ़ेदपोश हैं हम,
दाग हम पर कहाँ कोई आता है।
पैसों की दुनिया में मेरा नाम खूब है,
हाँ, सौ रुपये में रूह तक नोंच आते हैं।
हम लिहाफ़ हटाते ही
पति, पिता, बेटे, भाई बन जाते हैं,
जिसकी रूह को हम नोंच आते हैं,
वही तो समाज में वेश्या कहलाती है।
- Anant Dhish Aman