तेरे हुस्न पे जो इक सादगी देखी
कहीं और न ऐसी ताज़गी देखी
एक रात तेरी छत पे तुम्हें देखा था
फिर हर रास्ते में रौशनी देखी
तेरी आँखों में रहता इक समंदर है
तेरे होंठों पे सुर्ख़ इक नदी देखी
मुझे चाँद फीका लगने लगा है अब
जब से तेरे चेहरे पे चाँदनी देखी
हसीन ख़्वाब आ रहे हैं तुम्हें देख कर
मैंने ऐसी कहाँ पहले ज़िंदगी देखी
तुम्हें देख कर हर किसी से ये कहता हूँ
कि इन आँखों ने है इक परी देखी
✍️प्रकाश कुमार