पढ़ना है शायर को तो पढ़ो,
किसी शायर की डायरी का फटा हुआ पन्ना।
रूह से जिस्म को अलग करता हुआ है जो फ़ना, फाड़कर फेंक देता है जिस्म को रूह से,
लहू के रंग से रंग देता है शायर हर सपना।
मोहब्बत करता है वो हर पन्ने से, रूह से रूह तक पहुँचने में जिस्म छील देता है वो अपना।
जिस्म की भूख होती गर अनंत किसी शायर को, फटे हुए पन्ने को गले से लगाकर रखता वो दीवाना।
रूह से जिस्म को अलग करता हुआ है जो फ़ना, शक की गुंजाइश को भी शायद करता वो मना।
- Anant Dhish Aman