मुश्किलों से जूझने की कोशिशें लिख दूँ जरा,
और चलने की पुरानी आदतें लिख दूँ जरा ।।
धूप ओढ़े रेत जैसी चमचमाती जिन्दगी,
धूल सी यायावरी पर बारिशें लिख दूँ जरा ।।
आसमाँ पे रंग मन माफिक लगाने में मिली,
पाँव के पोरों की सारी दिक्कतें लिख दूँ जरा ।।
ज़िन्दगी की राह में काँटे मिलें ना फिर कभी,
नर्म सी तासीर की कुछ कोपलें लिख दूँ जरा ।।
सामने जब हो चुनौती बस "विजय" की बात हो,
हारते कदमों के हिस्से हिम्मतें लिख दूँ जरा ।।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही