आऊंगी..., सजल विधा
प्रातःकाल कोयल की कुकू सूनकर ,
तुम्हें पुराने कूप पर मिलने आऊंगी |
जंगली पुष्पों को श्वासों में भरकर ,
तुम्हें शूल, कंकर पर ढूढंने आऊंगी |
बहते झरनों का मीठा जल पी कर ,
तुम्हें नदी संग स्पर्श करने आऊंगी |
ठोस गड़रिए मन में नर्म स्नेह लेकर ,
तुम्हें दुपहरी धूप में छांव देने आऊंगी |
हरे मैदानों में भेड़-बकरियां चरा कर ,
तुम्हें आभ तले चाय पिलाने आऊंगी |
गरमा-गरम बाजरे की रोटी बनाकर ,
तुम्हें घी, गुड़ के साथ खिलाने आऊंगी |
देहाती डगर, बाट पर निरंतर चलकर ,
तुम्हें पहाड़ी गीत सुनाने शीघ्र आऊंगी |
हां.., एक दिन हृदय प्रेयसी बनकर ,
तुम पर पूर्ण न्यौछावर करने आऊंगी ||
-© शेखर खराड़ी
तिथि-१०/७/२०२६