"सपनों की लौ"
आंखों में एक स्वप्न लिए,
रोज प्रखर निखरता हु।
सूरज सा चमक पाने के खातिर,
सूरज सा रोज मै जलता हु।
सूरज जैसा ना सही पर,
रौशनी मैं लाऊँगा।
सूरज सा चमक नहीं होगी पर,
अंधियारा को मिलाऊंगा।
सूरज जैसा गुण हो मेरा,
सूरज सा ही धर्म हो।
सूरज सा दानी बनू और,
सूरज जैसा कर्म हो।
सूरज सा प्रखर निखरकर मैं,
सूरज का मान बढ़ाऊंगा।
सूरज का अंश मात्र भी हो तो,
जग को रौशन कर जाऊंगा।
जग को रौशन कर जाऊंगा।।
~ Poet :- Sp Singh