पता है, कभी-कभी मुझे लगता है कि हम आस्था और अंधविश्वास के बीच का जो बारीक सा धागा है, उसे अक्सर भूल जाते हैं। सोचो अगर हमारे सामने कोई छोटा बच्चा हो और वह मासूमियत से हमसे पूछे कि इन दोनों में क्या फर्क है, तो हम उसे कैसे समझाएंगे? हम उसे बस यही कहेंगे कि देखो बेटा, आस्था वह है जो तुम्हारे मन में एक सुंदर सा दीया जलाती है, जो तुम्हें किसी मुश्किल घड़ी में चुपके से आकर हिम्मत दे जाती है कि सब ठीक हो जाएगा। यह एक भरोसा है जो तुम्हें बेहतर इंसान बनाता है, तुम्हें अंदर से मजबूत करता है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ, अंधविश्वास किसी अंधेरे कमरे जैसा है, जहाँ हम बस डर के मारे कांपते रहते हैं, बिना ये जाने कि वहां है क्या। आस्था तुम्हें उड़ना सिखाती है, जबकि अंधविश्वास तुम्हें डराकर एक जगह थम जाने को कहता है। तो बस इतना याद रखना, अगर कोई बात तुम्हारे मन को शांति दे और तुम्हें निडर बनाए, तो समझ लेना वो तुम्हारी आस्था है, लेकिन अगर वही बात तुम्हारे दिल में डर भर दे और तुम्हें अपनी छोटी-छोटी खुशियों के लिए भी सोचने पर मजबूर कर दे, तो समझ लेना कि वो बस एक अंधविश्वास है, जिससे दूर रहना ही बेहतर है। जीवन में उस रोशनी को चुनना जो तुम्हें रास्ता दिखाए, न कि उस साये को जो तुम्हारे कदमों को रोक दे।