पता है ना तुम्हें…
इस जगत में बहुत कुछ मायावी हो सकता है—
अधरों पर ठहरी मुस्कानें,
शब्दों में घुली आत्मीयता,
यहाँ तक कि प्रेम के नाम पर किए गए अनगिनत आश्वासन भी…
किन्तु रात्रि के उस नीरव एकांत में
नयनों से अविरल बहते अश्रु
कभी असत्य नहीं होते।
वे हृदय के उस मौन आर्तनाद का स्वर होते हैं,
जिसे केवल पीड़ा ही सुन पाती है।
अब मैं स्वयं को विरक्त करना सीख रही हूँ…
मन की अनियंत्रित व्याकुलताओं पर
संयम का आवरण ओढ़ना सीख रही हूँ।
तुम्हें स्मरण करके भी
तुम्हारा नाम अधरों तक न आने देना,
तुमसे कहने को असंख्य भाव होते हुए भी
उन्हें भीतर ही भीतर विसर्जित कर देना—
यह सब अब मेरी नियति-सा हो चला है।
क्योंकि अब यह सत्य
अत्यंत स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि—
तुम्हारा अहंकार
मेरी समस्त पीड़ाओं से कहीं अधिक विराट हो चुका है,
और मेरा धैर्य…
मेरे प्रेम से भी अधिक अथाह।
यह जो शनैः-शनैः थम रही है
तुमसे संवाद करने की आदत,
इसे मेरी निष्ठुरता का नाम मत देना।
विश्वास करना…
इसके पीछे अनगिनत सिसकियों का वह अथाह सागर है,
जिसकी प्रत्येक लहर
प्रतिरात्रि मेरी आत्मा के निर्जन तटों को भिगो जाती है।
मैंने तो चाहा था—
तुम मेरे अंतर्मन का विश्राम बनो,
मेरे अस्तित्व की शांति बनो…
किन्तु तुम तो वह मौन वेदना बन गए,
जिसे छुपाते-छुपाते
मैं स्वयं से ही अपरिचित होने लगी।
कभी-कभी प्रेम समाप्त नहीं होता…
वह बस शब्दहीन हो जाता है।
क्योंकि निरंतर उपेक्षित होता हृदय
एक समय के पश्चात
चीखना नहीं,
मौन हो जाना चुन लेता है।
और तब—
अश्रु बहते रहते हैं,
स्पंदन जीवित रहते हैं,
प्रेम भी कहीं भीतर शेष रहता है…
किन्तु संवाद मर जाता है।
सत्य तो यह है—
कुछ रिश्ते टूटते नहीं,
वे धीरे-धीरे
आत्मा की निस्तब्ध गहराइयों में
विलीन हो जाते हैं…।