“चाँद से मेरा रिश्ता”
मुझे आवारा कहते हैं सब
कि मैं रात भर
चाँद की चौखट पर सिर टिकाए बैठी रहती हूँ
उन्हें क्या पता
कि ख़ामोशी जब सीने से लगती है
तो कैसा मरहम बन जाती है
जब रात अपना सारा शोर समेट लेती है।
सारा आलम ख़्वाब में डूब जाता है,
मगर मेरे अंदर कोई दिया टिमटिमा उठता है
उस सिमटी हुई चाँदनी के साए तले…
जैसे मैं और चाँद
एक ही साँस में सदियों का सन्नाटा जीते हों,
एक ही ज़ख़्म पर उँगली फिराते हों,
एक ही भूल चुकी दुआएँ दोहराते हों।
उन्हें बावरा कह लेने दो
उन्हें क्या इल्म
कि कायनात कितनी रहमदिल हो जाती है
जब तुम्हारे टूटे हुए दिल की
तन्हा गवाही
सिर्फ़ एक चाँद देता है।
प्राची तंवर …..