"खो जाऊं अगर मैं"…..
अगर कभी मैं खो जाऊं, क्या मुझे कोई ढूंढने आएगा?
लाखों की भीड़ में, घबराती हुई आवाज़ से,
नम आंखों से, मेरा नाम लेकर, कोई मुझे बुलाएगा?
या मैं यूं ही भटकती रहूंगी अनजान गलियों में,
जहाँ न कोई रास्ता अपना हो, न कोई दीवार पहचानी।
जहाँ हर मोड़ पर मैं खुद से ही पूछूं
“क्या मैं यहीं तक थी? या अभी और भटकना बाकी है?”
क्या कोई मेरी खामोशी की ज़मीन पर
पैरों के निशान पढ़ पाएगा?
क्या कोई मेरी थकी हुई सांसों की गर्द
हवा से बटोर कर, मुझे पहचान पाएगा?
क्या कोई इतना ठहरा हुआ होगा,
जो मेरे न होने को भी महसूस कर ले?
जो भीड़ के शोर में भी
सिर्फ मेरी एक कमी को सुन ले?
या मैं बस एक भूली हुई दुआ की तरह
किसी ना-खुली किताब के पन्ने में
दबी रह जाऊंगी... बिना पढ़े, बिना मिले?
अगर कभी मैं खो जाऊं...
क्या कोई मेरे कदमों की आहट से
मुझ तक पहुंच पाएगा?
प्राची तंवर….