Poem section:
बड़ा खराब लगता है ये जून का मौसम
सुबह तो जैसे होती ही नहीं, धूप चुभती है
हू... बजे ही दोपहर हो जाती है
गर्म हवाएं तन को झुलाएं
मन को झकझोर भी जो आए
एक अजीब सी बेचैनी मोहे दिन रात
कहीं आना-जाना सब बंद
बस घर में ही रहो बंद
पेड़-पौधे भी उदास रहे
बारिश को नैना तरस रहे
बंद कमरों में कैद बच्चे चिल्लाएं
माँ को भी गुस्सा आए
ये जून का मौसम ना मुझको भाए
क्या करूँ, क्या रखाऊँ कुछ समझ न आए
चुभती गरमी, आए पसीना, गर्म हवाएं
ऐसे में ऐसी भी कोई कब तक चलाए
हाय गर्मी हाय गर्मी हाय हाय हाय।