मैं ऐसी क्यूँ हूँ
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
नहीं पसंद है मॉल मुझे
ना ही ऊँची इमारतें
मुझे पसंद है खुला सा आसमां
फूलों की बगिया, चाँद और तारे
हो नदिया का किनारा,
जहाँ झूमे मन आवारा
मैं ऐसी क्यूँ हूँ,
मैं ऐसी क्यूँ हूं
भीड़ से मुझको डर लगता
अकेलापन अच्छा लगता
कभी चहकती चिड़िया सी
कभी शांत जल नदिया का
ना सजना पसंद ना सँवरना पसंद
मुझे मेरे ख्वाबों में बिखरना पसंद
जैसी भी हूँ, खास हूँ
लाजवाब हूँ, अलग हूँ सबसे
सब मेरे अपने हैं और
मैं तन्हा हूँ अपनों में सबसे
किसी का दुःख भी बहुत रुलाए
कोई मीठी याद भी बहुत हँसाए
खोई रहती हूँ यादों में
सुहाने सपने बुनती हूँ
मैं अलग मेरी दुनिया अलग
क्यूँ ऐसा क्यूँ
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
कोई तो बताए, मुझको समझाए
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
-dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi