प्यार: एक बंधन या मुक्ति?
जिसे तुम प्यार कहते हो, वह बस एक भूख है,
अधूरेपन को भरने की, एक तरसती हूक है।
तुम चाहते हो कोई आए, और तुम्हारी तन्हाई हर ले,
तुम जिसे 'महबूब' कहते हो, वह बस तुम्हारी ज़रूरतों का घर है।
सच्चा प्रेम तो वह है, जहाँ 'मैं' का अंत होता है,
वहाँ दो शरीर नहीं मिलते, वहाँ अहंकार शांत होता है
अगर तुम्हारा प्रेम उसे, उसके डर से न छुड़ा सका,
तो वह प्रेम नहीं, बस एक खेल था जो तुमको लुभा सका।
प्यार का अर्थ साथ चलना नहीं, साथ 'जागना' है,
संसार की इन झूटियों खुशियों के पीछे, अब न भागना है।
वह प्रेम महान है, जो तुम्हें 'सत्य' के पास ले जाए,
जो तुम्हें खुद से ही आज़ाद कर, खुदा से मिलाए।
आचार्य कहते हैं—प्रेम कोई कोमल अहसास नहीं,
यह तो वह आग है, जो जला दे उसे, जिसका कोई पास नहीं।
वहाँ कोई दूसरा नहीं बचता, बस एक 'शून्य' रह जाता है,
वही शून्य, जो अनंत है, वही प्रेम कहलाता है।
( आचार्य प्रशांत से प्रेरित ) - Shivraj Bhokare..✍️