यूँ ही आप हमसे बात नहीं करते,
कुछ तो हमारा भी शरूर होगा,
वरना इस भीड़ भरे सन्नाटे में
आपकी नज़र का यूँ ठहरना।
हर बार मिलते ही मुस्कुरा देना,
फिर बातों को अधूरा छोड़ जाना,
ये आदतें यूँ ही नहीं बनतीं,
इसके पीछे कोई तो कसूर होगा।
हमने तो बस सादगी ओढ़ रखी है,
ना इरादा, ना कोई चाल चली,
पर दिल के आईने में झाँकें अगर,
तो तस्वीर कहीं आपकी भी मिली।
ख़ामोशी में जो बातें उग आती हैं,
वो शब्दों की मोहताज नहीं होतीं,
कभी आँखों से जो कह दी जाएँ,
वो बातें फिर राज़ नहीं होतीं।
आप कहते हैं “बस यूँ ही”,
पर यूँ ही में भी बहुत कुछ होता है,
दिल अगर बेपरवाह होता,
तो ये एहसास क्यों रोता है?
हमने तो हर हद को संभाल कर रखा,
हर कदम नाप-तौल कर उठाया,
फिर भी अगर बात दिल तक पहुँची,
तो क्या ये सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ कहलाया?
शरारत अगर है, तो दोनों तरफ़ है,
खामोशी की भी अपनी ज़ुबान होती है,
जो समझ जाए बिना कहे सब कुछ,
असल में वही सबसे बड़ी पहचान होती है।
यूँ ही आप हमसे बात नहीं करते,
ये बात अब हम मान चुके हैं,
कुछ तो है जो लफ़्ज़ों से परे है,
जिसे हम भी अब पहचान चुके हैं।