उस वक्त… मेरा साथ देने वाला कोई नहीं था।
जब मेरा शरीर दिन-ब-दिन कमजोर हो रहा था…
वजन गिरता जा रहा था…
हड्डियाँ दिखने लगी थीं…
तब भी… मैं मुस्कुराती रही।
हँसती रही…
ताकि मेरे बच्चों को महसूस न हो कि उनकी माँ अंदर से कितनी टूट रही है।
घर संभालना…
बच्चों को संभालना…
और ऊपर से ताने सुनना…
"नाटक कर रही है…"
"कुछ नहीं हुआ इसे…"
यहाँ तक कि… मेरी अपनी सास ने भी कभी समझने की कोशिश नहीं की।
बस एक ही शब्द—
"नाटक"
दिल तब टूटता है…
जब दर्द शरीर में नहीं…
रिश्तों में होने लगे।
मैं सोचती थी…
आखिर कोई इंसान ऐसा नाटक क्यों करेगा…
जिसमें उसका शरीर ही जवाब दे रहा हो?
सबसे ज्यादा चुभी वो बात…
जो मैंने अपने ही कानों से सुनी—
"मर भी जाएगी… तो क्या फर्क पड़ेगा…"
उस दिन समझ आ गया…
सच में… यहाँ कोई किसी का नहीं होता।
मेरा बीपी इतना बढ़ जाता था कि
200… 220… कभी 240 तक पहुँच जाता था…
सोचो उस हालत में भी मैं
घर, बच्चे… सब संभाल रही थी।
मैं पिछले 5–6 सालों से बीमार थी…
शायद इसलिए…
उन्हें मैं एक बोझ लगने लगी थी।
लेकिन फिर…
शायद किस्मत मुझे यहाँ ले आई—
लिखने के लिए।
मैंने लिखना शुरू किया…
और धीरे-धीरे… मेरा मन शांत होने लगा।
अगर मैं यहाँ नहीं आती…
तो शायद आज मैं टूटकर बिखर चुकी होती।
शायद… जी भी रही होती या नहीं…
ताने ऐसे मिलते थे…
जैसे मैं कोई इंसान नहीं…
एक बोझ हूँ।
लेकिन आज…
मैं खड़ी हूँ।
टूटी नहीं हूँ
"मैं नाटक नहीं कर रही थी…
मैं हर दिन खुद को बचा रही थी।"
"बीमार शरीर से ज्यादा…
लोगों की सोच ने मुझे तोड़ा था।"