ओह नील गगन"
ओह नील गगन, तेरी बरखा आई
लहराके इतराके सावन लाई।
मैं एक बंजर धरती हूं,
रूखी हूं, प्यासी हूं,
तुझ बिन जैसे अधूरी हूं,
हां मैं बंजर धरती हूं।
तुम बरसें कहीं किसी वन के ऊपर,
कभी शहरों में, कभी गलियारों में।
कभी यूं ही बह जाती हों,
नदियों में मिल जाती हों।
कभी ठहरें तो झीलों में,
वरना सागर में मिल जाती हों।
एक मेहरबानी करना,
बरस जाना कभी मुझ पर इतना।
न वन जितना,
पर उग जाए थोड़े पौधें कि मैं बंजर ना कहलाऊ,
हरियाली मुझ पर छाएं,
मैं लताओं के जैसे लहराऊं।
ओह नील गगन, हैं फ़रियाद तुमसे,
आओ भी कभी मिलने हमसे।
मेरा दामन हरियाली से भर दो,
लेकर अपने बरखा को साथ।
ताकि मुझे भी लगें इस बार,
हां आई है बरसात।
By- Radhika